Wednesday, January 30, 2008

मालगुडी की तर्ज़ पर बकलोल डेज़..

“मी लॉर्ड, महामहोपाध्‍याय! तमाम गवाहियों के आधार पर आज मैं यह साबित कर देना चाहता हूं!” (क्‍या साबित कर देंगे.. और शिवमणि उपाध्‍याय कौन कहां के लॉर्ड?.. और हम ससुर, अलल-बलल बकते स्‍वयं पर मुग्‍ध होते बकलोल प्रसाद?).. जेब में पैसे नहीं, नहीं तो ताज्‍जुब की बात न होती कि हम ‘दामिनी’ के सनी देओल टाइप वकील वाला काला झगबग कोट सिलवा लाये होते.. और आत्‍ममुग्धि की मुस्‍की में नहाये का एक फ़ोटो उतारकर अपने ब्‍लॉग पर चिपका दिया होता! कितना स्‍वस्‍थ्‍यकारी, संतोषदायी होता है किसी वाजिब बात के लिए जोर से हुंकारी भरना.. दुनिया के उलझे, जटिल महामशीन में अपने होने की सार्थकता का एक क्षणिक ही सही, तरल-निर्मल एहसास! लेकिन थोड़ी देर के लिए हमें ग़लतफ़हमी भले बन जाये, इससे यह नहीं साबित हो जाता कि दुनिया- माने शिवमणि उपाध्‍याय की छतरी के नीचे का तुरई बराबर संसार- गरदन तक कीच में धंसी है और हम धवल-नवल कमलरत्‍न लाइफ़बॉय के अवतार हैं! कीच में रहनेवाला जितना कीच को प्रभावित करता है उतना ही कीच से प्रभावित भी तो होता है.. मनुष्‍य (अपने को मनुष्‍यत्‍व की हाई कैंडीडेसी दे सकता हूं? स्‍वास्‍थ्‍यकर होगा?) अपने समय और समाज की ही तो पैदावार होता है.. तो मैं अपने समय से तो नहीं ही उठ पा रहा हूं, समाज से उठकर कहां जाऊंगा? जा पाऊंगा? और चला ही जाऊंगा तो रघुराज फ़ोन पर पिनपिनायेंगे नहीं कि सब ठकुरैती धोके पी गए, ससुर, बस छांटने को अब यही शेक्‍सपीयरी बची है?

ख़ैर, तरल-निर्मल एहसासों के क्षण बड़े क्षणिक होते हैं. बकिया के नॉर्मल काटनेवाले क्षण नहीं घंटों में रुना लैला चीख-चीखकर याद दिलाती ही रहती है कटे नहीं दिन-रैन किसना तेरे बिना (बंशीधर फटिक कि किशन घई?)..

और फिर वह नानी वाली कहानी है ही (पता नहीं किसकी नानी थी).. कि एक गांव था गोल. कुछ गोल मानुस थे कुछ पोल (पौलेण्‍ड वाले नहीं). कुछ उल्‍टे थे, कुछ और ज़्यादा उल्‍टे थे.. कुछ पूरी उल्‍टी ही थे.. मगर औसत बकलोलों का ही था. सारे नीति-नियम बकलोली के थे.. बकलोली में सुबह खिड़की से परदा उठता, बकलोली में रात लालटेन की बत्‍ती बुझाई जाती.. थोड़ी शांति नहीं छाती कि फिर कहीं बकलोली का हल्‍ला होने लगता.. कबहुंओ चैन नहीं था, बच्‍चा.. ओह, व्‍हॉट अ नैस्‍टी बकलोल विलेज़ इट वॉज़!

5 comments:

  1. बकलोल डेज तो मजेदार अनुभव है. इसकी अनलिमिटिड किस्तें जारी रहने हेतु अर्जी पेश है... :)

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  2. बकलोली समझ में आई. बोलो बकलोली की जय...............:-)

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  3. बकलोली में बूड़ने का आप बंधुओं का शुक्रिया..

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  4. बकलोलिज़्म पर आपने अतिउत्त्म लिखा है...समझ में भी आ रहा है...गुज़ारिश है इसको आप वाकई धारावाहिक में चलायें...

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  5. बकलोली पर कुछ नहीं....

    फिलहाल नई तस्वीर पर नज़र पड़ी और हम मर गए
    खुदावंद करीम,रामरहीम,
    हजरत ऊंचेवाले टाईप लग रहे हैं आप...
    जग के प्रति करुणा का भाव चेहरे पर...
    कुछ न कर पाने की तड़प, आह...
    कितना सहते हैं आप ?
    ketna jhelte hain aap?

    हैं और भी वजहें वहशत की, इन्सान को रखतीं दुखियारा
    ये बातें झूठी बातें हैं, ये लोगों ने फैलाई हैं
    तुम इंशा जी का नाम न लो, क्या इंशा जी सौदाई हैं?

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