Thursday, January 31, 2008

और नाला बहता रहा..

प्रेमीयुग्‍म के लिए आज कितना तो सुहाना दिन था. मनोज कुमार जीतकर लौटे थे और मनीषा जी तो रही ही थी, अभिलाषाओं को भी जीतती रही थी.. जीते हुए प्रेमीयुगल, ओहोहो!.. नाले पर बनी पुलिया के उसी लवरपॉंयट पर प्रेमीद्वय मिले जहां पिछले बाईस महीनों से मिलते आ रहे थे. गर्मियों में सूख जाने पर नाला भयानक दुर्गंध छोड़ने लगता था, फ़ि‍लहाल अपने करीयरपने में सजा स्निग्‍ध सुगमता से बहता- प्रेम की प्राकृतिक लालसाओं का उद्दीपन बना- अपने सौंदर्य में ढहा व प्रेमीयुगल को श्रृंगार व मन की उमंगी बहार में ढहाये जा रहा था..

मनोज कुमार इस वैचारिक प्रौढ़ता को साबित कर रहे थे कि मन में काव्‍य की हुमसती कामनाएं हों तो उद्दीपन के लिए वियेना का क्‍लासिकी संगीत व पैरिस की सपनीली सांझ की ज़रा भी ज़रूरत नहीं बचती.. कश्‍मीर की सुरम्‍य वादियां और झूमते झील व्‍यर्थ ही नहीं बकवास हैं.. मन-प्रांगण नाले पर भी रम सकता है.. रम ही नहीं सकता, मीठे ताज़महल खड़े करके मुमताज़ की मम्‍मी और शाहजहां का बाप हो सकता है.. वही हो रहा था- शाह और जहांओं का बाप.. मगर मुमताज़ की मम्‍मी मीनिंग मनीषा कांप-कांप जा रही थी. उसी कोमल कंपन में अकुलाई (इठलाई नहीं) बोली- पता नहीं, प्रिये, सब इतना सुखकर है, आह्लादकारी है फिर भी मन में जाने क्‍या है कि कुछ मुरझाया-मुरझाया सा लगता है..

मनोज कुमार कार्ल गुस्‍ताव युंग और कलहिब्‍नोरब मरक़त बै की तर्ज़ पर नहीं अपनी ही तर्ज़ पर सोच रहे थे.. फिर भी चेहरे पर एक फीक़ी मुस्‍कान लिए सोचने से बाज नहीं आ पाये- हां, कुछ है जो सकुचाया-सकुचाया सा लगता है.. क्‍या है?

बैकग्राउंड में कहीं टी-सीरीज़ के अनुराधा पौडवाल के भजन की जगह अब लता मंगेशकर महबूब की मेंहदी की लीना चंदावरकर को ‘जाने क्‍यों लोग मुहब्‍बत किया करते हैं’ गवा-गवा के रुला रही थी.. नतीजे में प्रेमीयुग्‍म को कातर बना रही थी..
उमठी व उमेठी हुई मनीषा के मुंह से आह फूटी- ओह, मन में क्‍यों यह उलझा-उलझा सा दर्द उमड़ता है, प्रियंवद? क्‍यों उठती हैं ऐसी तप्‍त सिसकारियां.. चिनगारियां?

मनोज कुमार हुमसकर चाहते थे स्‍वयं से छूट जायें. उमड़कर भार्या के होंठ चूम लें, जीवन का जाम पी लें.. मगर पुलिया की सार्वजनिकता में कितनी आंच जीते? जहां बैठे थे वहीं बैठे रहे.. लब नहीं चूमा, नयनों ही नयनों मुस्‍कराये. मनीषा का हाथ अपने हाथों में लेकर हल्‍के से दबा दिया.. मन के श्रृंगारिक कामनाओं पर पुष्‍प अर्पित किया और सोचते रहे काव्‍य के किस नये पथ पर अगला प्रमुदित चरण धरेंगे..

नाला बेशर्मी से अपने करीयरपने में बहती रहा..

3 comments:

  1. नाला भले ही दुर्गंध युक्त हो लेकिन है ना...आप क्या चाहते हैं कि मनोज कुमार इसे साफ करें?

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  2. और ये क्या ...प्रेमी युगल भी और भार्या भी..ऎसा कैसे..??

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  3. काकेश मियां, नवरहस्‍यवाद है.. इस्‍पेशल इंडियन इश्टाइल वाला..!

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