Wednesday, January 9, 2008

कोई इस बेवकूफ को समझाये, रास्‍ता दिखाये!..

समय आखिर सीधी रेखा में क्‍यों चलता है? ज़रा उलट जाता कभी? या सुबह के भूले शाम को लौटे की तर्ज़ पर कभी पीछे ही लौट आता? फिर क्‍या-क्‍या देख गुजरने के सुख में हम अमीर हो लेते! जवाहरलाल कौन सा अंडरवीयर यूज़ करते हैं या चरखे पर वाक़ई क्‍या कातकर खादी कमिटी को मन ही मन कितनी गालियां दे रहे हैं के सारे प्रसंग रोचक व जीवंत हो जाते. यह भी भेद साफ़ हो जाता कि बहादुरशाह की जूतियां क्‍वालिटी में गुच्‍ची से हिप हैं या कमतर! मगर अपने अहंकार में नहाये और ह्यूजली प्रेडिक्टिबल रूट पर रूटिनली चल रहा समय ऐसा क्‍योंकर करने लगा कि पीछे लौटकर हमें गुजरे वक़्त का बाईस्‍कोप दिखा दे. उसकी हेठी नहीं चली जायेगी? फिर लोग समय की हाय-हाय कैसे करेंगे? खुद मैं अपनी प्रकृति के खिलाफ़ जाकर चहकने नहीं लगूंगा? आपही को अच्‍छा लगेगा? मुझको? फिर? तो समय को यह सब मंजूर नहीं. वह सीधी लकीर पर आगे ही आगे को पीटता रहेगा. आप कुढ़न में सिर के सारे बाल भले नोचते बैठो. या जो भी.

मगर समय आखिर ज़माने की हदबद से निर्लिप्‍त, आंखें मूंदे ये सीधे-सीधे जा क्‍यों रहा है? जहां जा रहा है वहां क्रेडिट कार्ड्स और नियन रोशनियों में रात-रात भर चमकते फ्लाईओवर्स न हुए तो? घुप्‍प अंधेरा और सन्‍नाटे में नहाया समय हुआ? ऐसे समय का समय साक्षात कर पायेगा? अदबदाकर व पूंछ दाबकर पीछे नहीं भागेगा? ऐसे डरे हुए समय का तब क्‍या मोह पालकर हम स्‍वागत करेंगे? कर पायेंगे? हमीं क्‍यों बांग्‍लादेश या बुरकिना फासो भी कर पायेगी? समय के लिए सोचनेवाली बात है.

दूसरी सोचनेवाली बात है इस बेहया, अकड़वाले बंदे से आजतक किसी ने पूछा नहीं कि इतने वक़्त से इस बेसिर-पैर के सफ़र से वह कभी थका नहीं? कभी तो कंटेप्‍लेशन, रिफ़्लेक्‍शन के लिए ठहरकर रुकता, सोचता? काहिरा और मराकेश के किसी सराय के आगे अपने ऊंटों के काफ़ि‍ले को रोक किसी हूर के हुस्‍न का मुआयना करता, कोई क़सीदा पढ़ता, हमारे-आपकी तरह की कोई चिरकुटई करता? ज़िंदगी निकल जायेगी, ससुर, ये सब उल्‍टे-सीधे अरमान कब पूरे होंगे? कि समय सचमुच नैतिकताओं की बकवास में नहाये हुए है? किसी हूर-टुअर को संपूर्णत: अक्षम? अविश्‍वसनीय है, नहीं?

मगर ओल्‍ड एज, बुढ़ापे का? कोई डर है या नहीं है समय को? यार, किसी की तो परवाह होगी? कोई तो इस दो कौड़ी के अक़लवाले को समझायेगा? या यह किसी की न सुनेगा, आंख की नोक में चुपचाप आगे गड्ढे में ही जायेगा?..

4 comments:

  1. दसियों साल से समय पर कुछ अच्छा सा लिखने की सोच रहा हूं लेकिन समय है कि निकलता चला जा रहा है। आपका आदेश शिरोधार्य है। जल्द ही लिखूंगा समय और सिंगुलरिटी पर एक साथ, या जरूरी हुआ तो साथ जुड़ी दो अलग-अलग पोस्टों में...

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  2. सुतली डर सुतली लच्छे बाँध के टाईम मशीन बड़ी मजेदार चली - आपको पढने की कोशिश थोड़े समय से कर रहा हूँ - "दिन बीतते हैं", "नींद में रात" और "एक मामूली कविता की किताब" बहुत अधिक अच्छे लगे हैं - spellbound (with regards)मनीष

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  3. शुक्रिया, दोस्‍तो!

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