Tuesday, January 22, 2008

एकायामी आदमी.. और उससे आगे?..

साठ के दशक के गिर्द जो वैचारिक उथल-पुथल की तूफ़ानी हवायें चली थीं, उसने ढेरों रोमांचक कृतियों को जन्‍म दिया.. उन्‍हीं में एक बड़ी किताब हरबर्ट मारकूज़ की ‘एकायामी आदमी’ भी थी.. आज जब समाजिक विमर्श में किताब, विचार सबकुछ क्षणिक हुआ पड़ा है, बड़ी किताबें और उनकी बड़ी चिंतायें भी छिटकी पड़ी हैं. उनकी कालजयता का तो क्‍या कहना (फिर कालजयी, और वाजिब मार्क्‍सवादी अर्थों में राजनीतिक रूप से मारकूज़ के विचार कितना सही थे इसके आकलन की अपनी तो सामर्थ्‍य नहीं ही है). बहरहाल, तत्‍कालीन पूंजीवाद और सोवियत ढांचे के वामपंथ की बखिया उधेड़ते ‘एकायामी आदमी’ में किन्‍हीं सज्‍जन की दिलचस्‍पी हो तो यहां उस पर नज़र मार सकते हैं..

किताब से उठाया एक उद्धरण: “The people recognize themselves in their commodities; they find their soul in their automobiles, hi-fi sets, split-level homes, kitchen equipment.”

बात बड़ी वाजिब है. मगर सच्‍चाई का शायद यही एक आयाम नहीं है. कि है? मार्शल बरमन तो इसकी तीखी शब्‍दों में मुखालफ़त कर रहे हैं. उनकी मुखालफ़त व विचारों पर फिर कभी..

1 comment:

  1. इसी तरह का सार्थक काज हमें कुछ दे जाएगा,इस विषय पर बहुत कुछ तो लिखा नहीं गया है,आपकी वजह से हमने लाभ तो ले लिया शुक्रिया

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