Monday, January 7, 2008

आप झूठ बोल रहे हैं..

कह रहे हैं तो आप झूठ बोल रहे हैं. कौन भयमुक्‍त है? जो है स्‍वयं को मनुष्‍य कहलवाने का अधिकारी हो सकता है? मुझे नहीं लगता. आपको भी शायद तभी लगे जब आप मनुष्‍य कहलाने के अधिकारी न रह गए हों. दरअसल मनुष्‍यत्‍व बाद की अवस्‍था है भयग्रस्‍तता पहले चली आती है. कब आती है विशेषज्ञों के बीच अलबत्‍ता हमेशा विवादग्रस्‍त विषय रहा है. पोलिश विद्वान जुबोल्‍व्‍स्‍की शुरू से मानते रहे हैं गर्भावस्‍था से मनुष्‍य शंकाभाव सीने लगता है, मगर ताज्‍जुब की बात नहीं कि उससे भी पहले भयास्‍वादन कर चुका होता है. क्‍यों? क्‍या मतलब क्‍यों? ऐसे फालतू सवालों का अकादमीय संसार में कोई जवाब है? नहीं है. दूसरी ओर मैक्सिकन विद्वान ताबियो हुम्‍बेर्तो बताते हैं व्‍यक्ति पेशाब पर काबू पा सकता है भय पर नहीं. जिस दिन काबू पा ले मनुष्‍यता रसातल में चली जाएगी (मुरैना, आजमगढ़ व बिहार के छोटे शहरों में छोटी उम्र के नौजवानों के भयमुक्‍त दुस्‍साहसी आपराधिक कारनामों में हम मनुष्‍यता के रसातल में जाने का प्रत्‍यक्ष प्रमाण देख ही रहे हैं! नहीं देख्‍ा रहे हैं? तो फिर आप क्‍या खाक़ देखते रहे हैं..).

विद्वानों के पौलेण्‍ड और मैक्सिको में कहने जैसी यह दुरुह बात है भी नहीं. मैं यहां सीधे तरीके से कहूं तो आप सीधे होंगे, आपके सीधे-सीधे समझ में आएगी कि मनुष्‍य जन्‍म से आज़ाद भले न हो, डरा हुआ ज़रूर है. बच्‍चा संवेदनशील हो तो बिस्‍तर गीला होते ही अपराधबोध में डरकर रोने लगता है. यही मानसिकता उसके बड़े होने पर बिना बिस्‍तर गीला करवाये भी उसे रुलाती रहती है. नौकरी न मिलने तक नौकरी न मिलने का भय होता है, मिल जाने के बाद इसका कि कहीं बिना ऊपरी कमाई वाली न मिल जाये. वह मिल जाती है तो फिर इसका भय कि कहीं ऊपरी कमाई लेते हुए विजिलेंस वालों की नज़र में न उतर जायें. नौकरी से बाहर इसका (समाज तो गया तेल लेने) कि हम पत्‍नी की नज़रों में न उतर जायें. याकि कोई दूसरा पत्‍नी की नज़रों में चढ़ न जाये! या पत्‍नी किसी दूसरे की नज़रों.. अंकवार, प्‍यार पता नहीं कहां-कहां.. चढ़.. जाये!

एक बार चले आने के बाद फिर भय जाता नहीं. पीएफ और अन्‍य स्‍कीम्‍स की अवधि चुक जाती है, भय की नहीं. अंतिम अवस्‍था में भी धुकधुकी बनी रहती है कि आसपास कोई आग देनेवाला रहेगा या नहीं. ऐसा न हो गलत जगह दे दे. और हम बिना पाये रह जायें. आग एंड व्‍हाटेवर.

वैसे कुछ क्षुद्र मानसिकता के लोग भी हैं जो मानकर चलते हैं उनका भय भय और दूसरों का हो तो बकरी की बीट. या कबूतर की. जोकि सही नहीं है. यह अक्षम्‍य है कि आप कॉकरोच देखकर उछलने लगें, आपकी जान मुंह में आ जाये (या उन-उन स्‍थानों में- जहां आने में सहूलियत महसूस करे).. और हम मूषकराज देखकर गिर पड़ें तो आप (क्षुद्र मानसिकता वाले चिरकुटाधिराज आप) दांत चियारें (माने अपनी क्षुद्र मुर्खपना उघारें, एक ही बात है). ऐसा करने का आपको हक तब बनता जब आपने मूषक रोवों का मफ़लर धारा होता, या चलिए, कोट ही सिलवाये होते.. या चूहे के साथ बिस्‍तर में रात साथ गुजारी होती. इनमें से सब (या कुछ भी) किये बिना आप हंसने के, या मनुष्‍यत्‍व के अधिकारी कैसे हो सकते हैं? नहीं हो सकते. दरअसल, जैसा ज्‍यॉर्जियन विदुषी रसूलन हम्‍ज़ातोव ने पहले कह ही दिया है- आप डरे नहीं हैं तो खरे नहीं हैं!

(पतनशील पैम्‍पलेट, नववर्षांक, खंड- सात, अंक- तेरह)

5 comments:

  1. पतन तय है लेकिन घबराइये नहीं, आप भय की पकड़ से बाहर हैं.

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  2. आज पहली बार पढ़ा आप बहुत अच्छा लिखते है...सच है कौन ऎसा इंसान है जो भयमुक्त है...

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  3. यह जार्जियन विदुषी जरूर बड़ी डरावनी दिखती होंगी। वैसे इनकी फोटो बिल्कुल मर्द जैसी है। जार्जिया में लोग इनसे इतना डरने लगे हैं कि अपने पुरखों समेत यह देश छोड़कर ये फुलटाइम दागिस्तान में रहने लगी हैं- ओह, दागी डरावनी रसूलन बाई!

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  4. मृत्यु व कुछेक और चीजों को छोड़कर जो चीज रोज देखते हैं उससे डर नहीं लगता । अब यदि शीशा देखने पर मुझे रोज यह फोटो वाला चेहरा दिखता तो मैं इससे डरती थोड़े ही । शायद बार बार देखना पसन्द करती ।
    घुघूती बासूती

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  5. @चंद्रभूषण, प्‍लीज़.. डोंट मिक्‍स रसूल विद् रसूलन.. ओह, हाऊ कैन यू?..
    @घुघूती जी,
    अभी भी आप-सी भयमुक्‍त स्त्रियां बची हुई हैं, और अपने इस चमकते भूमिखंड पर? जिस तस्‍वीर की आप चर्चा कर रही हैं, जिसे लगाते हुए और लगाने के अनंतर मैं लगातार डरता रहा, उससे उतना नहीं जितना आपकी बातों से भय उपजता है? सोचिये, क्‍या स्त्रियों को ज़रा कातर व भयग्रस्‍त न बना रहना चाहिए? खासतौर पर जबकि हम इतने पुरातन व परंपराशंकुल राष्‍ट्र हैं?

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