Thursday, January 31, 2008

पतितकुमार की डायरी का एक अप्रतिम अंतरंग पृष्‍ठ..

ऐसा नहीं है कि मेरी चमड़ी या मैं मोटा नहीं. सिर पर कुछ बाल ही नहीं बचे थोड़ी बुद्धि भी बची है- आई स्‍वेयर- मगर फिर भी मैं पैरानॉयड हो रहा हूं (मगर कहां हो रहा हूं?) व्‍हाई? कैन एनीवन टैकल दीज़ फीमेल पताकाज़? एंड पतिंगाज़?.. ओह, गो अवे यू नैस्‍टी डिमविट पैरा एंड नॉया.. सी, दे आर नॉट गोईंग? दे आर नॉट इवन मूविंग! मेरे डायरेक्‍शन में देख रही हैं.. और उस नज़र से नहीं देख रहीं, बद्तमीज़, कि मैं भी हिलगकर नज़र मिलाऊं.. रस लूं, रम जाऊं! हिलगने की जगह हिल जा रहा हूं.. जबकि वह जमी हुई हैं.. गिविंग मी दोज़ लुक्‍स (यू नो व्‍हॉट लुक्‍स, मैन!).. मगर ऐसा क्‍या अलल-बलल किया मैंने कि ये इतना फैल रही हैं? फूल रही हैं? इनकी फेंस पर खड़े होकर सीटी बजायी? इनके बैकयार्ड से नींबू तोड़े? दैन, व्‍हाई दे आर पेंटिंग द टाउन रेड.. एंड मी ब्‍लैक? इनको मालूम नहीं कि आप कितना भी ब्‍लैक-ब्‍लैक चीखो मैं ब्‍लू ही देखूंगा? बिकॉज़ दैट्स माई एजुकेशन. एंड आई अम अ मैन ट्रू टू माई ट्रेडिशन. ढाई हज़ार साल से उसी ट्रेडिशन की मज़बूत ज़मीन पर खड़ा हूं और आनेवाले ढाई हज़ार साल तक वहीं खड़ा रहूंगा. पनामा के पायलट कॉंफ्रेंस में पहुंचकर भी मुस्‍कराते हुए अपना पुष्पित पुष्‍पक यान-ज्ञान ठेल दूंगा. विल ऑलवेज़ रिमेन लाइक दिज़. अनमुवेबल. अनमूव्‍ड. मगर तुम औरतें हो कि समझती नहीं हो. मुझको तो नहीं ही समझतीं. मगर मैंने भी इतना सीख ही लिया है कि औरतों को समझना हंसी-मज़ाक नहीं. हंसी तो नहीं ही है. मज़ाक.. लेट्स फॉरगेट अबाउट इट..

लेकिन यह सब मेरी समझ से बाहर है. रियली. आई मीन ऐसा कभी हुआ कि किसी लेडी ब्‍लॉगर के कमेंटबॉक्‍स में कमेंट की जगह मैंने अपने शिमरिंग इमोशंस रखे हों? और रखे भी हों तो मुझे तो ऐसा याद नहीं पड़ता.. और उस लेडी को भी याद पड़ भी जाये तो इससे पहले तो उसने या किसी और ने प्‍याले में या कहीं भी तूफ़ान खड़ा नहीं किया? देन व्‍हाई नाऊ दिज़ डिमविट पैरा एंड नॉया? बिकॉज़ दे थिंक दे आर समथिंग? समवन स्‍पेशल? कमॉन, गर्ल्‍स, डोंट गो ऑन गिविंग मी दोज़ लुक्‍स.. मैं अच्‍छा बच्‍चा हूं, रियली? गो एंड आस्‍क माई मदर.. ऑर सिस्‍टर (घरवाली, हास्पिटल वाली नहीं.. प्‍लीज़, डोंट आस्‍क हर एनीथिंग.. द बिच विल टेल यू ऑल फेब्रिकेटेड स्‍टोरिज़!).. औरतों, लड़कियों, बच्चियों सबके प्रति मेरे मन में अतिशय (अननेसेसरी, आई वुड से) सम्‍मान है! हैव यू सीन माई कमेंट्स ऑन बेटियों का ब्‍लॉग? हाथ से ही नहीं मैंने वहां सिर झुका-झुकाके कमेंट किया है. खुद को गिराके किया है सच्‍ची कह रहा हूं. एक और काम की बात बताऊं? लिसन.. औरतों का तो है ही, जल्‍दी ही मैं एक लड़कियों का ब्‍लॉग शुरू करने जा रहा हूं.. लड़कियां वहां चाहें जो करें (खाना बनायें, रेसिपी लिखें, मेरे चरण धो-धोके पियें.. और जब चरण धो-धोके पीते हुए धन्‍य न हो रही हों तो जितना चाहें मधु मुस्‍कान और मणिमुकुंद मार्तण्‍ड या माता मछिंदरी देवी का पाठो करती रहें) एंड वी विल क्‍लैप फॉर देम. दूसरे न भी करें, मैं करुंगा, पैरा, दैट्स अ प्रॉमिस!..

एनीवे, मैं कुछ और कह रहा था; वेरी मीनिंगफुल एंड ट्रू टू माई नारीवादी फीलिंग्स.. वो मदर और सिस्‍टर वाली बात.. मैंने हमेशा सिस्‍टर और मदर के हाथ की चाय पी है.. और हमेशा पी ली है, कभी वापस पलटकर थ्रो-बैक नहीं किया.. किया है तो वह मेड की बनायी चाय को किया है और मेड पर ही किया है मदर पर नहीं! मदर को तो मैंने हमेशा माता समझा है और उनपर कुछ फेंका है तो स्‍वयं को उनकी चरणों पर फेंका है! उनके यह कहने पर- जबसे आई है, हमरे बिटवा को खाय गई, मुंहजार!- ढकेला भी है तो मदर को नहीं अपने बेटर हाफ को ढकेला है.. और उसी शाम छै सौ की साड़ी खरीदकर उस बेवकूफ के साथ मेकअप भी किया है दैट्स आल्‍सो अ फैक्‍ट! हालांकि हर काम के लिए आसरे न रहना होता तो इच्‍छा तो ज़रूर होती है कि बदकार को कभी मनभर कुटूं.. (ओह, इस एक छोटे जीवन में कितनी तो इच्‍छायें यूं भी अव्‍यक्‍त की अव्‍यक्‍त ही बनी रह जाती हैं- तुम कभी नहीं जान पाओगी, पैरानॉया!)..

मैं भी इन लड़कियों के पीछे कहां-कहां तो बहक रहा हूं.. मदर और सिस्‍टर की बता रहा था कहां उस बदकार के भंवर में उलझने लगा.. ओह, सिस्‍टर, व्‍हेयर डू आई प्‍लेस यू? हमेशा तुम्‍हें सिर और आसमान पर बिठाकर नहीं रखा? नहीं, नहीं, आज सबको बता ही दो! इज़ंट इट ट्रू सिस्‍टर कि हमेशा सिस्‍टर को प्रोटेक्‍ट किया है? जब वह अनप्रोटेक्‍ट होना चाहती थी तब भी किया है. कॉलेज में उसके नोटबुक में लेटर रखनेवाले एक जोकर की वो कुटाई की है कि ज़िंदगी भर याद रखेगा. ऐसे-ऐसे पीस और प्रोटेक्‍शंस प्रोवाइड किये हैं कि सिस्‍टर तो लाईफलॉंग याद रखेगी ही.. मैं अच्‍छा बच्‍चा हूं, पैरा. एंड नॉया. कांट यू लीव मी अलोन? दिखता नहीं दूसरी औरतें देख रही हैं और तुम्‍हारी वजह से मेरी इमेज हिल रही है? मैं तो रहा ही हूं. हिल.. बट रियली? इज़ंट माई चमड़ी मोटी एंड माथा छोटा?

(यह शुद्ध और खांटी पतितकुमार की डायरी का ही पृष्‍ठ है. कृपया कोई अन्‍य सज्‍जन या दुर्जन इसे अपनी डायरी का समझकर पढ़ने की धृष्‍टता न करें..)

4 comments:

  1. आपने कहा:....धृष्‍टता न करें..)

    हमने धृष्‍टता नहीं करी..मिलाके पढ़ना तो दूर ..पढ़ा ही नहीं..

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  2. कहां है ई ससुरा पतितकुमरवा . बहुत ढील दे रहा है. मंझा सूंतना आया नहीं अउर चले हैं डायरी लिखने . पतंग कटबे करेगी तब बूझबे करेगा . स्त्री-रक्षा का ड्यूटी ठीक से होता नहीं है,ऊपर से चले हैं डायरी लिखने . अरे लिखो डायरी,पर थोड़ा सावधान होकर लिखो -- भली-भली सुघड़ अउर चिकनी-चुपड़ी बात लिखो . अइसे लिखते हैं डायरी ? तब फिर घर का अंदर का 'पिराइभेट' बात लीक करना का होता है ?

    कुछ नही! बहुत दिन हुआ अब्बे-तब्बे अउर धक्का-घींचा नहीं हुआ . ओही के आसार हैं .

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  3. जब वह अनप्रोटेक्‍ट होना चाहती थी तब भी किया है.
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    यह सही पकडा आपने ।

    ह्म्म ! क्या कमेंट करूँ । बहुत कीचड उलीचा है आपने । बडी षडयंत्री भाषा है। बहुत खूब ! दाद देती हूँ । आदमी के मन का यह अन्धेरा सच जो
    महसूस होता ही है उसे शब्दों में ,कटाक्ष में ढाला है । बीवियो का ,माताओं का, बहनों का ब्ळोग बनवाइए और उसे स्वयम संचालित कीजिये । आप जगह निर्धारित कर दो - यहाँ बीवियाँ लिखें , यहाँँ बेटियाँ यहाँ बहने । बाकी जगह से वे खुद ही निष्कासित हो जाएँगी । आप वहाँ कमेंट कीजिए-'वाह ! या खेद है ! या बडा दुखद है !'
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    वैसे यह भी बडी चालाकी की आपने । खुद ही खुद को गाली दे लो । अब कोई क्या खाक कहेगा :)
    वैसे ये फोटू कहाँ से लाते हैं आप । लाली टिकली में पुता मादा सुअर का चेहरा !!

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  4. बडी पसन्द आयी.

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