कुछ लोग हैं, मतलब काकेश ही हैं, जिन्हें एजुकेट किये जाने की ज़रूरत है. मतलब यह क्या बात हुई कि बड़ा निपोरे-निपोरे लिख डालेंगे ‘वैसे मेरे पास भी कई ऑफर आये अमरीका जाने के लेकिन ना जाने क्यों अभी तक खुद को तैयार नहीं कर पाया..’ ऐसे ही लोग हैं जो कभी किसी भी चीज़ के लिए खुद को तैयार नहीं कर पाते. अमरीका जाने के लिए न किसी मॉल प्रांगण में दिल लुटाने के लिए (मॉली-बॉली में चप्पल खाने की घटना जो घटी थी वह क वाले काकेश के साथ नहीं अ वाले किन्हीं अन्य विमानुष के संग घटी थी. उसका ज़िक्र फिर करूंगा, यह उसका मंच नहीं है). हमेशा दिल और जेब सम्हाले रहते हैं. यही काकेश टाइप. हद है मर्चेंट ऑव वेनिस का क्या वो कैरेक्टर था टाइप व्यवहार की? नहीं है? ज़रा नमूना देखिये पैसा बचाने की लॉजिस्टिक का: ‘अभी पिछ्ले दिनों आपकी बतायी हुई ओरहान पामुक की स्नो देखी एक स्टाल में सोचा खरीद लूँ पर दाम 400 रुपया देख कर सोचा शायद इसकी इतनी वर्थ नहीं है इतनी..’ अरे! वर्थ? ओरहान का नहीं है? गोड़ के जूता और बरिस्ता की कॉफ़ी का? पेट्रोल, पत्नी की साड़ी? वह 400 से कम में मिलती है? मगर ऐसों को समझाने का क्या फ़ायदा? आईटीयन और काकेश को समझाने का तो नहीं ही है. यही वजह रही होगी कि आईआईटीयन अरविंद गुप्ता हारकर मुफ़्तिया किताबों, और मुफ़्तिया ये और वो का वेबसाइट बनाने पर मजबूर हुए होंगे.. कि बचाये रहो 400.. स्नो नहीं तो कम से कम साइंस तो पढ़ लो! हद है. हद है स्क्वायर इन फैक्ट..
Jan 21, 2008
काकेश के वर्थ का अर्थ?..
उर्फ़ अरविंद गुप्ता के मुफ़्तिया वेबसाइट की लूट
कुछ लोग हैं, मतलब काकेश ही हैं, जिन्हें एजुकेट किये जाने की ज़रूरत है. मतलब यह क्या बात हुई कि बड़ा निपोरे-निपोरे लिख डालेंगे ‘वैसे मेरे पास भी कई ऑफर आये अमरीका जाने के लेकिन ना जाने क्यों अभी तक खुद को तैयार नहीं कर पाया..’ ऐसे ही लोग हैं जो कभी किसी भी चीज़ के लिए खुद को तैयार नहीं कर पाते. अमरीका जाने के लिए न किसी मॉल प्रांगण में दिल लुटाने के लिए (मॉली-बॉली में चप्पल खाने की घटना जो घटी थी वह क वाले काकेश के साथ नहीं अ वाले किन्हीं अन्य विमानुष के संग घटी थी. उसका ज़िक्र फिर करूंगा, यह उसका मंच नहीं है). हमेशा दिल और जेब सम्हाले रहते हैं. यही काकेश टाइप. हद है मर्चेंट ऑव वेनिस का क्या वो कैरेक्टर था टाइप व्यवहार की? नहीं है? ज़रा नमूना देखिये पैसा बचाने की लॉजिस्टिक का: ‘अभी पिछ्ले दिनों आपकी बतायी हुई ओरहान पामुक की स्नो देखी एक स्टाल में सोचा खरीद लूँ पर दाम 400 रुपया देख कर सोचा शायद इसकी इतनी वर्थ नहीं है इतनी..’ अरे! वर्थ? ओरहान का नहीं है? गोड़ के जूता और बरिस्ता की कॉफ़ी का? पेट्रोल, पत्नी की साड़ी? वह 400 से कम में मिलती है? मगर ऐसों को समझाने का क्या फ़ायदा? आईटीयन और काकेश को समझाने का तो नहीं ही है. यही वजह रही होगी कि आईआईटीयन अरविंद गुप्ता हारकर मुफ़्तिया किताबों, और मुफ़्तिया ये और वो का वेबसाइट बनाने पर मजबूर हुए होंगे.. कि बचाये रहो 400.. स्नो नहीं तो कम से कम साइंस तो पढ़ लो! हद है. हद है स्क्वायर इन फैक्ट..
कुछ लोग हैं, मतलब काकेश ही हैं, जिन्हें एजुकेट किये जाने की ज़रूरत है. मतलब यह क्या बात हुई कि बड़ा निपोरे-निपोरे लिख डालेंगे ‘वैसे मेरे पास भी कई ऑफर आये अमरीका जाने के लेकिन ना जाने क्यों अभी तक खुद को तैयार नहीं कर पाया..’ ऐसे ही लोग हैं जो कभी किसी भी चीज़ के लिए खुद को तैयार नहीं कर पाते. अमरीका जाने के लिए न किसी मॉल प्रांगण में दिल लुटाने के लिए (मॉली-बॉली में चप्पल खाने की घटना जो घटी थी वह क वाले काकेश के साथ नहीं अ वाले किन्हीं अन्य विमानुष के संग घटी थी. उसका ज़िक्र फिर करूंगा, यह उसका मंच नहीं है). हमेशा दिल और जेब सम्हाले रहते हैं. यही काकेश टाइप. हद है मर्चेंट ऑव वेनिस का क्या वो कैरेक्टर था टाइप व्यवहार की? नहीं है? ज़रा नमूना देखिये पैसा बचाने की लॉजिस्टिक का: ‘अभी पिछ्ले दिनों आपकी बतायी हुई ओरहान पामुक की स्नो देखी एक स्टाल में सोचा खरीद लूँ पर दाम 400 रुपया देख कर सोचा शायद इसकी इतनी वर्थ नहीं है इतनी..’ अरे! वर्थ? ओरहान का नहीं है? गोड़ के जूता और बरिस्ता की कॉफ़ी का? पेट्रोल, पत्नी की साड़ी? वह 400 से कम में मिलती है? मगर ऐसों को समझाने का क्या फ़ायदा? आईटीयन और काकेश को समझाने का तो नहीं ही है. यही वजह रही होगी कि आईआईटीयन अरविंद गुप्ता हारकर मुफ़्तिया किताबों, और मुफ़्तिया ये और वो का वेबसाइट बनाने पर मजबूर हुए होंगे.. कि बचाये रहो 400.. स्नो नहीं तो कम से कम साइंस तो पढ़ लो! हद है. हद है स्क्वायर इन फैक्ट..
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2 कमेंट:
जी भेजे में बात समझ में आ गयी जी.अब समझ आया कि आपकी दाढ़ी और आपकी बदलती हुई हैडर की तसवीरें सब डराने के लिये ही हैं. हम तो सचमुच ही डर गये जी. जल्दी ही "स्नो" खरीदके पढ़ते हैं जी...और भी कुछ खरीदना है तो बताइयेगा. वैसे बरिस्ता कॉफी हम सिर्फ बाहर से आने वालों स्पेशल लोगों को पिलाते हैं खुद नहीं पीते जी :-)
बाबा रे बाबा । आपकी डांट पड़ी काकेश जी को और असर हम पर हुआ । अब कुछ कहेंगे तो आप कहेंगे कि निपुरे निपुरे कह रहा है । फोन करके डांट ही दें । इसलिए सबक लेने और खिसक लेने में ही भलाई है ।
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