Friday, February 29, 2008

केत्‍ता मज़ा, केत्‍ता मज़ा..



खड़े, गिरे, ओहो, अरे, बड़ा मज़ा
अब किसको लगा? सूप, चम्‍मच,
कुदाल, खुरपी आगे-आगे,
ऊपर-ऊपर. कोड़ो, गोड़ो,
हल्‍के मोड़ो, तीन का तिरसठ जोड़ो.
अच्‍छा लगा, मीठा लगा?
इन्‍हें खट्टा, उन्‍हें तीता लगा?
जल्‍दी-जल्‍दी, हल्‍दी-हल्‍दी, चूना-चूना.
घेला, दुअन्‍नी और अठन्‍नी
बीना-बीना, लूटे, लिये
इसको मार, उसको पछाड़,
आंगन होंड़, दुमाले से छलंगी मार.
हाय-हाय, हांव-हांव, हुर्र-हुर्र, दुर्र-दुर्र.
अच्‍छा है, अच्‍छा है, गोड़ पे झाड़ा
मुरझाइल आंख में कत्‍था है.
बिलिंग-बिलिंग, टिलिंग-टिलिंग,
घंटी पुरानी है, सबकी सुहानी है.
होय-होय मचल रहे, सब कादो में चल रहे.
कहां चले, होजुर, दोबार नै आइएगा?
मारकिन का बुशर्ट कहीं अऊर बनवाइएगा?
देखिये न, माल केतना चोखा है,
माले नहीं आजू-बाजू सबै अनोखा है.
हें हें हें हो हो हो, पें पें पें पों पों पों.

आबादी और अकाल..

दुनिया की प्रकट, दबी सच्‍चाइयों के बारे में हम अपनी धारणा कैसे बनाते हैं? अपने पढ़े, सुने-गुने गये अंदाज़, अनुमानों से; अख़बार, मीडिया में सर्कुलेटेड दो कौड़ि‍या सामान्‍यीकरणों से?.. क्‍या स्‍त्रोत होता है हमारी समझ, ऑपिनियन बनाने का? या बाहर का कुछ नहीं, हमारा आंतरिक ज्ञान का आलोक ही हमारी समझ दीप्‍त करता चलता है? मुझे स्‍वयं भी नहीं मालूम. बहुत सारे मसले हैं जिन्‍हें लेकर असमंजस में रहता हूं, काफी बार एक धुरी से दूसरी धुरी तक का चक्‍कर मार लेता हूं.. फिर भी लगता है बात ठीक से पल्‍ले नहीं पड़ी.. मसले पर एक राय है लेकिन वह ठीक-ठीक क्‍या है, अभी वर्कआउट नहीं हुआ..

अब जैसे आबादी का ही मसला लीजिए. बड़ा मसला है. अपने यहां भी अभी एक-डेढ़ जेनरेशन पहले तक घर में छह और सात बच्‍चों का पैदा होना आम बात थी, अब किसी घर में तीन भी पैदा हो जायें तो उस परिवार को देखकर खौफ़ होता है. एक एंगल उसमें है ही कि बच्‍चों की जिम्‍मेदारियों के साथ इतनी पेचिदगियां जुड़ गईं हैं, पूरा सब्‍जेक्‍ट आफ़त की रेल लगती है.. मगर बच्‍चों से अलग आबादी से आमतौर पर हमारी समझ का असोसियेशन भूख, अकाल व बदहाली है. इस विषय पर मुंह खोलते ही समझदार लोग इस नज़रिये से काफी कंविंसिंग लॉजिक ठेलते हैं.. कि आबादी की बहुलता की वजह से भूख का विकराल जिन्‍न समूची दुनिया को कैसे अपनी गिरफ़्त में ले लेगा.. ले लेगा? भूख और अकाल आबादी से जुड़े हैं या उनके पीछे दूसरे फैक्‍टर्स काम करते हैं.. यह ऐसा विषय है जिस पर सुसन जॉर्ज पिछले कई दशकों से काम कर रही हैं, ढेरों किताबें लिखी हैं.. क्‍या कहती हैं सुसन? आइए, आज उन्‍हीं अवधारणाओं से ज़रा दो-चार होवें..

सुसन का एक मासूम-सा सवाल है आखिर कितनी आबादी ज़्यादा-आबादी है? ज़्यादा किसके कांटेक्‍स्‍ट में? किसी उस आदर्श स्‍तर के कांटेक्‍स्‍ट में जहां भूखी रह रही आबादी और खाद्य समेत उपलब्‍ध स्‍त्रोतों के बीच एक ‘वाजिब संतुलन’ हो? अहा, ऐसा?.. लेकिन वे कौन लोग हैं जो उपलब्‍ध स्‍त्रोतों को सचमुच ‘खा’ रहे हैं? संयुक्‍त राष्‍ट्र अमरीका जो दुनिया की आबादी का 6% है, लेकिन उपलब्‍ध स्‍त्रोतों का 39% लील रहा है. जितना अमरीका इस्‍तेमाल करता है, दुनिया के सबसे ज़्यादा गरीब देश उस ऊर्जा का महज 1% इस्‍तेमाल करते हैं. अमीर मुल्‍कों की मिली-जुली आबादी (दुनिया का 25%) दुनिया के खाद्य पैदावार की दो-तिहाई सीधे-सीधे खुद हड़प करती है. समूची दुनिया के अनाज का एक तिहाई अकेले इन मुल्‍कों के जानवरों के पेट में जाता है.

थोड़े और दिलचस्‍प तथ्‍य. 1949 के पहले चीन की आबादी लगभग 50 करोड़ थी और संसाधन चंद परिवारों तक सीमित था. अकाल लगभग हर वर्ष की घटना थी. जनवादी क्रांति के उपरांत वह आबादी नाटकीय तरीके से बढ़ी है. खा-खाकर लोग चौड़े भले न हुए हों, भूखों नहीं मर रहे. एक और दिलचस्‍प बात है. जितनी भारत में है, चीन में महज उसका आधा ही कृषियोग्‍य भूमि है; कुछ इसी तरह दक्षिणी कोरिया और ताइवान के पास भी इंडोनेशिया या बांग्‍लादेश की तुलना में आधी ही कृषियोग्‍य ज़मीन है. तो बांग्‍लादेश की भूखमरी की और जो भी वजह हो, अधिक आबादी तो कतई नहीं है.

आबादी और भूख के अंतर्संबंध का एक छोटा उदाहरण यह भी: प्रति स्‍क्‍वॉयर माइल इंगलैण्‍ड में आबादी का घनत्‍व 583 लोग हैं, भारत में 516, हॉलैण्‍ड में 1117, ब्राजील में 38, बोलीविया में 12, फ्रांस में 251 और चीन में 271.. सोचनेवाली बात है इनमें कौन बहुल और कौन कम आबादी वाले देश हैं.. और क्‍या वजहें हैं कि बावजूद आबादी की बहुलता के इन ज़्यादा घनत्‍व वाले मुल्‍कों में लोग भूखों नहीं मर रहे..

(साभार: फुड फॉर बिगिनर्स, सुसन जार्ज, ऑरियेंट लॉंगमैन प्राइवेट लिमिटेड, 1982)

लें कि तजें.. जो उगला गया है?..

इरफ़ान ने अपने ब्‍लॉग पर भड़ास को बंद करवाने का पोस्‍टर चिपका रखा है. बंद क्‍यों करवाना चाहते हैं, भाई? और बंद करवाने वाले आप कौन हुए? ऐसी कोई शिकायत हुई, और शिकायत पर फ़ैसला लेना हुआ तो वह गूगल और ब्‍लॉगर लेगा.. इस देश में वैसे ही बात-बात पर लोग इसको और उसको बंद करवाने पर तुले रहते हैं, उसी ताप में हम क्‍यों तुलें.. मुंह में कड़वाहट बहुत सारे स्‍वादों से होता रहता है, आप घूम-घूम कर रेस्‍तरां बंद करवायेंगे? और क्‍यों करवायेंगे.. स्‍वाद आपको अच्‍छा नहीं लग रहा इसका यह मतलब नहीं कि बहुत उसके आनंद में उछल नहीं रहे? प्‍लीज़, आप सुबह-सुबह यह उल्‍टा-सीधा मत बकिये कि इसे (जिसे भी) बंद कराओ! वह तो शुरू ही इतने महत्‍तम उद्देश्‍य से हुआ- भड़ास.. अब इससे आगे जानने को बचता क्‍या है? कितने सारे बच्‍चे हैं (अच्‍छे भी होंगे), गले में बात अटकी रहती है, जाके उगल आते हैं.. अच्‍छा है.. पता नहीं जहां नौकरियां बजाते हैं उसे भी उगालदान के बतौर ही यूज़ करते हैं या वहां कुछ कंस्ट्रक्टिव ऐड करने को रहता है.. मालूम नहीं, मित्र, हिंदी पत्रकारिता के सिरजनहारों का कृत्‍य हमें तो हर जगह उगालदान की ही याद दिलाता है..

खैर, कौन मुझे क्‍या याद दिलाता है, प्रसंग इसका नहीं है.. भड़ास के उन अच्‍छे बच्‍चों के उगलने का है जो वे सार्थक रूप से कर भी रहे हैं. अब इसमें यह सवाल ज़रूर उठता है कि खूब उगलें, मन भर उगलें, बस हमारी-आपकी थाली में न उगलें. चूंकि पोस्‍टों का देखना ज़्यादातर ब्‍लॉग एग्रीगेटर्स की मार्फत होता है, तो ब्‍लॉग एग्रीगेटर के कर्ता-धर्ताओं का सोचना फ़र्ज बनता है कि ऐसे उगालदानों के पोस्‍ट्स को- जिससे व्‍यक्तिगत स्‍तर पर कुछ लोगों को मानसिक क्‍लेश हो रहा हो- अपने यहां दिखाना बंद करे.. या न करे. मैं चाहता हूं बंद कर दे. इरफ़ान मियां भी यही आग्रह कर रहे हैं, लेकिन हो सकता है कुछ लोग अपनी थाली में ऐसी उगल रिसीव करना चाहें? फिर?.. भई, जैसे उगाल रिसीव न करने की आपकी इच्‍छा सम्‍माननीय है, उसी तरह किसी का उगल से वंचित होना उसके लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन भी है. ऐसी सूरत में वे सारे लोग जो भड़ास की उगल से जीवन में पूर्णत्‍व प्राप्‍त कर रहे हों, वे ब्‍लॉग एग्रीगेटर्स तक उसकी प्रविष्टियों के दिखने को रोकने के खिलाफ़ चिट्ठी भेजकर विरोध कर सकते हैं..

तो यह सचमुच दिलचस्‍प है.. हिंदी के क्षेत्र में प्रगतिशील आंदोलनों से और पता नहीं कहां-कहां से आये बच्‍चे ज़रा-सी ज़मीन भर की नौकरी पाने के बाद एक से एक कंस्‍ट्रक्टिव कामों का गोबर और लेंड़ी जो यहां से लेकर वहां तक हर जगह सजा-सजाकर पर्यावरण सुगंधमान कर रहे हैं, और जब तक चारों ओर गंद फैला नहीं लेते, जीवन सार्थक नहीं लगतां. आज के दौर में ‘जीवन क्‍या जिया..’ वाले मुक्तिबोध के सच्‍चे वारिस यही होनहार उगलदानियां ही तो हैं.. कम से कम कुछ और नहीं कर रहे, ढंग से उगल तो रहे हैं? थोड़ी सजावट और नक़्क़ाशी के साथ हो या विशुद्ध नंगई की नहलाहट में नवल-धवल बलल-बलल बह रही है या नहीं?.. देखकर गर्व से आपकी छाती चौड़ी नहीं होती.. आप कृतार्थ नहीं हो रहे? मैं पता नहीं क्‍यों भावुक होकर हाथ में चप्‍पल निकाल लेना चाहता हूं.. फिर यह सोचकर कि चप्‍पल पुरानी है, खामख्‍वाह टूट जायेगी, अपने को रोक भी ले रहा हूं.. मगर पता नहीं आपको कौन सी नैतिकता या चिरकुट शराफ़ती तकाज़ा रोके हुए है!

वैसे यह भी मज़ेदार है कि हिंदी ब्‍लॉगों में इतने सारे पत्रकार सक्रिय हैं, कुछ हर तीसरे मुट्ठी बांधनेवाले क्रांतिकुमार और सोशल एस्‍सेंडेंसी का डैटा कलेक्‍ट कर रहे आंकड़ाकुमार हैं, मगर उस बिरादरी की मोरल डिस्‍सेंडेंसी चिन्हित करने की- उगलदान दायें-बायें हटाने की बात आई, तो उसका ठीकरा रेडियो वाले बेचारे कमज़ोर इरफ़ान के सिर टूटा! मगर अच्‍छा टूटा, मियां.. और लोग न कहें, मैं शुक्रिया कहता हूं.

Thursday, February 28, 2008

तारे पता नहीं कहां पर..

पता नहीं रोज़ पोस्‍ट लिखने की ऐसी हड़बड़ क्‍यों लगी रहती है? जबकि टिप्‍पणियों की मत पूछिये, किसी एक लड़की ने अभी तक लव लेटर तक के लिए नहीं पूछा है. लड़की की मां या मौसी ने भी नहीं पूछा! फिर भी रोज़ पोस्‍ट ठेलते रहने का जाने यह कैसा ज़ुनून चढ़ा रहता है. जैसे पोस्‍ट लिखकर हम कुछ उखाड़ लेंगे. जबकि सच्‍चाई है अच्‍छे पोस्‍टों पर चढ़े भी कुछ नहीं उखाड़ पा रहे. ज़्यादा से ज़्यादा हमारा-आपका बिगाड़ रहे हैं. तो उतना तो हम-आप भी कविता और जाने क्‍या-क्‍या सुनाके एक-दूसरे की (ज़्यादा मेरे) नाक में दम किये रहते हैं. लेकिन यही मज़ा है कि बावजूद बेदम होने के रोज़ पोस्‍ट न ठेलो तो मन अकुलाने लगता है. ठिला न जाये तो दोपहर तक आत्‍मा गिड़गिड़ाने लगती है. मानो एलआईसी का इंस्‍टालमेंट देने से रह गया. या बस में चढ़ते ही खिड़की से थूकना. या सिनेमा हॉल में अंधेरा होते ही नाक में उंगली डाल लेने का आह्लादकारी सुख..

नाक में उंगली डाले मन पता नहीं आज कैसा-कैसा तो हो रहा है. माने वही जैसे राहुल गांधी यूपी की सोचके कुछ कांस्टिपेटेड फ़ील करता होगा, मैं हिंदी फ़ि‍ल्‍मों के नामों की सोचकर कर रहा हूं. माने यह ठीक है कि हिंदी फ़ि‍ल्‍मों का कोई तुक नहीं (वैसे भी अपने देश में किस चीज़ का है?) मगर कम से कम फ़ि‍ल्‍मों के नाम का तो हो सकता था? है? अब यही इसी नाम को लीजिए- ‘तारे ज़मीन पर’.. भई, जेनुइनली, क्‍या मतलब है इसका? ज़मीन पर यहां आदमी को रहने, चलने, रेलवे लाइन पर ठीक से बैठकर फारिग होने की जगह नहीं है, आप ऊपर से तारों को डिस्‍प्‍लेस करके ज़मीन पर ठेल रहे हो. अच्‍छा नहीं था तारे वहीं आसमान के स्‍टेटस-को में ठिले-पटाये रहते? कल को आसमान तारों को वापस लेने से मुकर गया तब ससुर, तारे ज़मीन पर, तारे ज़मीन पर करके लड़ि‍या रहे आपके मुंह से हवा छूटेगी? या कहीं और से?.. पता नहीं क्‍या सोचके (या नहीं सोचके) ये हिंदी फ़ि‍ल्‍म वाले रोते-गाते किसी तरह घिसट रहे सिस्‍टम को अपने हाल पर छोड़ते नहीं, उसकी ऐसी-तैसी करते रहते हैं? एक वह फ़ि‍ल्‍म आई थी (आती ही रहती है) क्‍या नाम था- हां, ‘कल हो न हो’! सोचिये ज़रा, कितना प्रोवोकेटिव, स‍वर्सिव शीर्षक है! माने पड़ोस की डिंपल आंटी का रेप करना हो तो पप्‍पू (या मुन्‍ना) आज ही अंजाम दे लें.. कल का कौन जानता है, कल हो न हो?..

या ‘चोर मचाये शोर’!.. अरे, आज तक आपने सुना है कभी कि शोर चोर मचा रहा है? यह सही है कि बाद में सीपीएम बहुत मचाती रही मगर पहले तो नंदीग्राम के दलिद्दर किसान ही थे जो हल्‍ला मचा-मचाके नाम में दम किये हुए थे? या फिर ‘दिलवाले दुल्‍हनिया ले जायेंगे’! व्‍हाट नॉनसेंस? व्‍हाट अ ब्लिस्‍टरिंग बार्नाकल्‍स नॉनसेंस ऑफ अ कैप्‍टेन हैडोकियन प्रोपोर्शन? दिलवाले दुल्‍हनिया लिये जायेंगे तो उंगली भर के कलेजावाले सुधीर भैया या मन्‍नू दादा का व्‍याह घंटा कौन वाली दुलहिन से होगा? बेहद इडियॉटिक और ह्यूजली एंटी सोशल एंड प्रोन टू क्राइम हैं ये फ़ि‍ल्‍मी नाम!

अब इसी नाम को लीजिए- ‘दिल लगाके देखो’. मैं देख रहा था. देख क्‍या रहा था पड़ोस में नर्सरी की टीचर है, देखनेवाली चीज़ है तो उसके साथ बाक़ायदा एक्‍सपेरिमेंट करने लगा था. पहले नर्सरी के बाहर खड़ा होकर सिर्फ़ मुस्‍कराते हुए कर रहा था. एक दो बार गलती से वह भी मुस्‍करा गई तो गरीब का हौसला बढ़ा और मैं नज़दीक पहुंचकर दिल लगाके देखो, दिल लगाके देखो करने लगा! नतीजा वही हुआ जो चिरकुट हिंदी फ़ि‍ल्‍मी नामों के चक्‍कर में पड़कर जीवन खींचने, या फींचने का हो सकता है.. लोकल थाने से एक फ़ोन चला आया. मैंने घबराके पूछा लेकिन बात क्‍या है, सर? तो उधर से जवाब मिला- थाने में आके देखो?

हड़बड़ी में ऐसी ही गड़बड़ी होती है. इसीलिए कहता हूं पोस्‍ट से ज़्यादा कट एंड पेस्‍ट वाले रास्‍ते पर चलो. लेटर्स पर चलना ही है तो मन मारके चलो, मगर लव वाले लेटर पर मत चलो (ये मेरा प्रेमपत्र पढ़के कि तुम नाराज़ न होना, कि तुम मेरी ज़िंदगी हो, कि तुम मेरी बंदगी हो..). अब ये सीधे-सीधे चप्‍पल खानेवाला काम है या नहीं? मैं कहता हूं है.. थाने में पहुंचते ही अभी सब ज़िंदगी और बंदगी पता चल जायेगा! आपमें से कोई आ रहा है मेरे साथ? या आ रही है?..

Wednesday, February 27, 2008

फेसबुक फटीग

पता नहीं ऑरकुट का हमेशा मेरे दिमाग़ में एक चिरकुट सा असोसियेशन क्‍यों रहा है.. इससे ऑरकुट की कमतरी और मेरी समझदारी नहीं ज़ाहिर होती.. मगर उन सभी एंप्‍लॉयर्स के लिए चिरकुटई ज़रूर ज़ाहिर हुई है जिनके यहां काम करनेवाले अपने काम से जुड़ने की जगह, ऑरकुट की नेटवर्किंग में अ जोड़-घटाव करते रहते हैं.. सोशल नेटवर्किंग के ये नये मीडियम- ऑरकुट, फेसबुक- का अच्‍छा इस्‍तेमाल क्‍या है ये तो उसका नियमित उपयोग करनेवाले जानें, मगर आप मोरक्‍को में हैं और आपने फेसबुक के अपने प्रोफाइल में कुछ मस्‍ती की है तो आपके अच्‍छे-खासे नुकसान की गारंटी ज़रूर है!..

फ़ायदे हों, नुकसान हों, आधुनिक जीवन के अब ये ढेरों चोंचले हैं जिनमें हमारे दिन का खासा समय उलझता रहता ही है, वजह चाहे जो हों.. जिज्ञासावश, अनजाने, यूं ही नेट सर्फियाते हुए.. या फिर मेरी तरह कहां की बात में कहां टहलाते हुए.. मालूम नहीं फ्री-सेल या सोलितेयर की तरह कभी इससे लोग थकेंगे या इसीमें धंसे रहेंगे.. इकॉनमिस्‍ट अपने एक सर्वे में बता रही है कि फेसबुक से लोगों के थकने के लक्षण दिख रहे हैं.. जवाब में काफी रोचक किस्‍म की टिप्‍पणियां हैं (ठीक है रोचक हैं मगर आप क्‍यों देखें? इसीलिए कि चिरकुटई की जिज्ञासा में मैं दिखाये बिना, और आप देखे बिना बाज नहीं आयेंगे!).. तंजानिया के फीरोज़अली की टिप्‍पणी पढ़ि‍ये.. वहीं से कट एंड पेस्‍ट कर रहा हूं..
Facebook fatigue
Give me a break
I register
Give my password
Give my address
Tell all those who visit my details
I do not know them
When I post a comment I am told to type two separate words
As is I have a wrist problem
Arthritis my doctors tell me. Bad for the face book and toes and fingers.
Then I get hundreds of friends asking for addresses, donations
That I can do seating down near a theatre drunk I mean giving my address to all
May be some one is stamping my credit card number when the face and the book is open. I am sorry I call this face and book as the word they ask me to type are two
Duo
At times I am told by the FACEBOOK, You have violated our right so we are chopping you off. You no longer have a face.
Fine I say
I go to yahoo etc.
I am still same
I
have face I have friend
I am blogging writing reading advertisement.
So tell me what I have lost
The two words that waste my time the robot avoiding word. I have not seen any robot recently writing any blog. Have you?
I thank you
Firozali A. Mulla MBA PhD
P.O.Box 6044
Dar-Es-Salaam
Tanzania
East Africa

Tuesday, February 26, 2008

ल और द

जिसे नाक तक पानी चला आना कहते हैं इस समय ल की शायद वैसी ही स्थिति है. आईने के बगल से गुज़रते हुए अचानक यक़ीन नहीं होता खुद को ही देख रही है. सिर थामे सोफ़े में निढाल धंस जाती है. इस तरह कब तक चलेगा? उससे नहीं चलेगा! पिछले तीन हफ़्ते से ऑफिस से भाग-भागकर प्रॉपर्टी एजेंट के साथ घर देख रही है. किस उम्‍मीद में देख रही है? किसके लिए देख रही है? वह जो भी करेगी, द उसमें नुक़्स निकालेगा. मगर खुद कुछ नहीं करेगा! घर देखने के लिए उसके पास समय नहीं. जब से नौकरी छुटी है, मुंह लटकाये इस और उस कोने बैठा मिलता है. या गली के बार में पीता. लेकिन घर खोजने के लिए टाइम नहीं है. ल किसी घर को शॉर्टलिस्‍ट करके फ़ैसला लेना चाहे तो उसे रिजेक्‍ट करने के लिए है. दो कमरों के मकान में वे कैसे रहेंगे. मकान जैसा भी हो बिना स्‍टडी वाले घर में द नहीं रह सकता. चिट्ठी-सिट्ठी ही सही, कुछ तो लिखने की आदत बनाये रहे! इस उम्र में अपने लिए एक स्‍टडी मांगना बहुत ज़्यादा मांगना है?..

पिछली दफे ल झल्‍ला के चीख़ी थी- क्‍यों चाहिए स्‍टडी? क्‍या करना है उसे स्‍टडी का? इसलिए कि उसके पिता वाले घर में है? पिता की नकल में उसे ज़िंदगी जीनी है? आखिरी दफे कब उसने कुछ लिखा था? एक चिट्ठी लिखे कितना ज़माना हुआ उसे?..

ऐसे सवालों का द के पास जवाब नहीं होता. नाराज़ होकर फटी आंखों ल को तकता है. या लाल सोफ़े पर पैर पसारे अलबलायी आवाज़ में बुदबुदाता है- क्‍या?..

द के बतख की तरह- क्‍या? क्‍या? क्‍या? सुन-सुनके वह थक गई है. या हर सवाल के जवाब में दारु पीकर घर लौटने की उसकी आदत से. हर चीज़ से, अपने थकने से भी ल इन दिनों थकी हुई है. द के पीने से इतना चिढ़ती है मगर आज अपनी इसी घबराहट की वजह से घर लौटी है- भूख लगी थी कुछ खाया नहीं, लेकिन अकेले बैठे-बैठे रेड वाईन की पूरी बोतल खाली कर दी है.. मन के भीतर बना हुआ मगर गुस्‍सा खाली नहीं हुआ!..

बाहर दरवाज़े पर आवाज़ हुई, फिर द का बेवकूफ़ों सा चेहरा झांकता अंदर दाखिल हुआ- तुम अभी सोयी नहीं? मुझे लगा सो गई होंगी..

ल ने सोचा था आज आग उगलेगी, कुछ बावेला करेगी.. लेकिन तोड़फोड़ का सारा उत्‍साह जाने कहां गायब हो गया.. चुपचाप दीवार तकती रही..

- क्‍या हुआ नींद नहीं आयी?..

- हां, नींद नहीं आयी, द..

- क्‍या?

‘क्‍या?’ सुनते ही ल की इच्‍छा हुई उठकर इस आदमी को तमाचा जड़ दे.. लेकिन तमाचों से अब उनके बीच क्‍या ठीक हो सकता था? माथे पर हाथ फेरते हुए ल ने कहा- सुनो, द.. तुम सुन रहे हो कि एकदम होश नहीं है?

- क्‍यों होश नहीं है? पूरा नहीं है.. लेकिन है.. होश है.. अरे, तुम बैठके वाईन पी रही थी?..

इस बात का क्‍या जवाब हो सकता है? इस आदमी का? जिसके साथ इतने वर्ष गुज़ारे.. कैसे गुज़ारे? जो इतनी अच्‍छी चिट्ठि‍यां लिखता था.. और अब सिर्फ़ शराब पीता और बहकी-बहकी बातें करता है? ल की छाती में एक नंगा ख़ंज़र उतर गया.. और वहीं बना रहा- कुछ तो तुम्‍हारी संगत का असर पड़ेगा.. तुम रोज़ पीते हो, मैं एक दिन नहीं पी सकती?

द हाथ में खाली बोतल लेकर खेलता हंसने लगा- हो हो हो, मैं वहां और तुम यहां..

बैठे-बैठे ल की कनपटी में एकदम से ख़ून दौड़ गया.. और आत्‍मा में गहरे पराजय का भाव. फुसफुसाकर बोली- हम कहां जा रहे हैं, भगवान.. हमारा क्‍या हो रहा है, द?

- क्‍या?

- मेरी बात सुनो.. प्‍लीज़.. तुम यहां सामने बैठो, द और मेरी बात सुनो!..

- इतनी जोर से क्‍यों बोल रही हो?.. मैं सब सुन रहा हूं.. मैं होश में हूं, ल, माई लव..

ल ने गला साफ़ किया, हिम्‍मत करके पूरी मजबूती से बोली- आज मैंने कुछ फ़ैसला किया है.. तुम्‍हारे बारे में.. अपने बारे में..

(एलें रेनें की फ़ि‍ल्‍म 'प्राइवेट फीयर्स इन पब्लिक प्‍लेसेस' देखकर)

Sunday, February 24, 2008

बल्‍ली की जाणा मैं कौन..



ना मैं सीधा-सच्‍चा फीता, ना मैं अकल का बीता-रीता
ना मैं अच्‍छे बच्‍चे का कलेंडर, ना रुल्‍ली कक्षा का मौन.

ना जब खाना हो तब खाऊं, ना टैम पे देह गिराऊं
सब छत पर तरबूजा खाएं, तरबूजे के छिलके का
छिलके औ’ बीजे का मैं खाऊं दातौन.

ना पापा की अकड़ को खाऊं, ना मम्‍मी की पकड़ में आऊं
ना दूध का गिलास छुऊं, ना सताया प्‍यासा पानी पियूं
छांह में औंधा गिरके पेड़ की चि‍ड़ि‍या से पूछूं हौं हौंन?

ना मैं पेप्‍सी क्रेकर टेकर, न इनकी उनकी उम्‍मीदों का टेंडर
ना मैं गहरा भीम पलासी, ना मैं चहारदीवारी वासी
सतरंगी तागों का मैं उझराया-उझराता सस्‍ता-सा बाबौन?

बल्‍ली की जाणा मैं कौन..
नीचे कैटी मेलुआ का एक गाना है.. बचकाना ही है..

Saturday, February 23, 2008

बेसुध ब्‍लॉगिंग..



छुटे हुए पटाखों की तरह
घुल रहे बताशों की तरह

टिप-टिप-टिप औंजाया कीबोर्ड
बहका टिपटिपाया चलता है
बिना-ब्रेक की साइकिल-सा
ढुलकता सरसराया चलता हे

आंख खुलती है कभी बेसुध
चौंककर खुद को तकता है
बहुत बार एक अदद ऑपरेशन
की मेज़ होती है, ढेरों दवाईयां
और एक पुराना घिसा इंजेक्‍शन
जिसकी नली का रसायन
धीमे-धीमे ऊपर चढ़ता है.

दोस्‍त कहां है?..

सीट की गदराहट में धंसे गाड़ी की स्‍टीयरिंग में फंसे किसने कहा सुखी नहीं, मगर किसी का हाथ अपने हाथ ले लें, निठल्‍ले खुलके हंस लें- ऐसा दोस्‍त कहां है? तंजौर, तेलहाट घूमा हूं, पहाड़ों पर सूरज के उतरने की ढेरों गुलाबी तस्‍वीरें उतारी हैं, चीड़ के जंगलों के गुनगुने अंधेरों से चुपचाप गुज़रा हूं, भावुक होकर देखी है चमकती त्‍वचा, भौंचक रोंये, मगर अंतरंगता में मेरी नज़रों देखता कोई- ऐसा दोस्‍त कहां है? इस तरह की उस तरह की जिस तरह की महफ़ि‍ल हो सकती है, देखी है जो नहीं देखना था वह तक देखी मगर वह छोटी-सी महफ़ि‍ल जिसके उजाले में ज़रा ताप पाते, आत्‍मा की पदचाप- ऐसा दोस्‍त कहां है? घुमक्‍कड़ी, पियक्‍कड़ी, बुझक्‍कड़ी, गढ़ और जाने क्‍या-क्‍या तो कड़ी के बेल्‍ट धारे, सीधे रास्‍ते उल्‍टे गये, उलटके ढेरों वर्ष गुज़ारे, आईने में हड्डि‍यों को गलता देखा, सूनी रातों में खुद को चलता- हाथ आगे बढ़ाके कभी रोक लेता मगर ऐसा दोस्‍त कहां है? प्‍यारी देखी, बेचारी देखी, बल खायी बलिहारी देखी, वह घर देखा जिसे सपनों में देखा था, वह बाहर जिसे अपना कहता, लेकिन ज़रा अपनापे से अपना कह सकूं- ऐसा दोस्‍त कहां है?

Friday, February 22, 2008

भोजपुरी जैज़ एन्‍साम्‍ब्‍ल..

भाईजी दरबारी..



ऊर्फ वेटिंग फॉर भाईजी (नॉट फॉर गोदो)..

खरे थे खरे थे एंड लॉट मोर.. दिल छोटा न करें, पियार से चरें.. आगे जनाना है..



(बाबू विकास लाल को समर्पित)

जिनसे मैं थकता हूं..

एक-एक के बारे में बताना शुरू करूं तो लिस्‍ट लंबी हो जायेगी. सुनते-सुनते आप भी लहाश हो जायेंगे.. मगर इस लंबी में जो चुनिंदा हैं उनकी भी फेहरिस्‍त कम छोटी नहीं.. गीता प्रैस से छपकर आयी एक स्‍वस्‍थ आकार-प्रकार वाली पुस्‍तक जितनी वॉल्‍युमिनियस तो हो ही लेगी.. चलिये, गीता प्रैस न सही रीता प्रैस! प्रीत की रीत भी रहेगी, और गीत तो रहेगा ही.. इससे कुछ लोग अनुमान लगा सकते हैं (लगायेंगे ही) कि मैं पहले गीता प्रैस का एजेंट था अब रीता का हूं. नहीं हूं. मैं गीता-रीता का भले होऊं (जो अगर सच्‍चाई हुई तो देर-सबेर मुझे इसकी ख़बर हो ही जायेगी), एजेंट किसी का नहीं.. यह दूसरी बात है कि कुछ लोग मुझे डिटर्जेंट बताने पर तुले हुए हैं, जबकि असलियत है कि आज के फ्री-वर्ल्‍ड में मैं कुछ भी बतवाये-बनाये जाने के खिलाफ़ खड़ा हूं.. और इस संतोष के साथ कि कमअज़कम कुछ ऐसा है जिसके मैं खिलाफ़ हूं और अभीतक खड़ा भी हूं (क्‍योंकि मूलत: तो अपनी प्रकृति लेटवइये की है)!

ओह, फुर्र-फुर्र में देखिए, कहां से फुदकता कहां-कहां और उसके बाद फिर कहां निकल गया? सबसे पहले तो एक यह विषयांतर ही है जिससे मैं बहुत थकता हूं.. पकता भी हूं. एक तरह से दोनों एक ही बात है. और दूसरी तरह से एक ही बात नहीं भी है. माने बहुत बार यह होता है कि थके हुए के साथ-साथ पके हुए भी हो जाते हैं. और फिर बहुत बार के बाद बहुत बार यह भी होने लगता है कि थके हुए थे, धीरे-धीरे उसीमें पकने लगते हैं.. या पके हुए पक रहे थे कि उसीके नीचे कहीं थकान का हंड़ि‍या भी सुलगने लगता है.. माने आप समझ ही रहे होंगे? नहीं समझ रहे, ससुर, तो मैं ज़रूर समझ रहा हूं कि जेनुइनली मुझे उकसाकर आप थकाना चाह रहे हैं.. और न भी चाह रहे होंगे तो यह खेल थोड़ी देर चला तो घबराकर मैं खुदै थकना चालू कर दूंगा..

मगर यह सब फालतू की लता-लतवन हैं, चिल्‍ली-बिल्‍ली थकवन है.. थकान के बटवृक्ष की असल डायरेक्‍टरी नहीं.. वह तो (आपका नहीं) मेरा बैंकवाला स्‍टेटमेंट है.. जो कभी-कभी बैंक से आता है, ज़्यादा मेरे सपनों में ही रहता है (फिर हरमख़ोर निकलकर कहीं जाता नहीं!).. उसके बाद फ़ोन, बिजली और जाने किस-किसका बिल है.. नियम से आये बिना मानता नहीं.. और एक बार दिख गया कि झट उसी क्षण आंखों में रतौंधी उतर जाती है.. इससे अलग और दूसरे बिल हैं जिन्‍हें स्‍वयं तो नहीं देखता मगर वहां से अवतरित हुए हर्षोन्‍मादी वासनाकामी मूषकावतारों को देखकर अपनी गुदगुदाहटों पर काबू नहीं रख पाता.. नतीजतन थकने लगता हूं.. भयोन्‍माद में बाज मर्तबे सटकने भी लगता हूं.. मगर वे बेहद निजी प्रसंग हैं और उन्‍हें सार्वजनिक न करने के लिए क्षमा चाहता हूं! और आप सार्वजनिक करवाने की खामख्‍वाह ज़ि‍द पकड़ि‍येगा तो ससुर, खामख्‍वाह मुझे थकवाइयेगा.. खामख्‍वाह यही सब गंडगोल होगा!..

फिर वैसी किताबों से थकता हूं जो मुझे समझने से इंकार कर देती हैं और परिणामस्‍वरूप मेरी समझ में नहीं आतीं. या वे लोग.. जो भूल जाते हैं एक पहुंचे हुए कलाकार की समझ में आये वाली बातें कैसी करें और नतीजे में मैं थकने, और थोड़ी देर बाद पकने पर मजबूर होने लगता हूं! या वह लड़कियां जो प्रगतिशील बनकर अपनी कमाई तो खाती ही हैं, बोनस में मेरा दिल भी चबाना चाहती हैं.. या सुबह जो बेमतलब रोज़ मुंह बाये आकर खड़ा हो जाता है और मिन-मिन रेंकने लगता है- अब? अब? अब?.. या रात.. जो स्‍वयं नहीं रेंकता मगर गली के सब कुत्‍तों को सक्रिय कर देता है कि मुझे पकाने में अपनी जान झोंक दें.. और इस तरह थकाने में.. कहने का मतलब कोई अंत नहीं है.. मेरे थकने.. या आपके पकने का?

Thursday, February 21, 2008

एक मर्डर मिस्‍ट्री..

आलोक के ‘वतन के डाकू’ से इंस्‍पायर्ड होकर इन दिनों मैं भी एक फ़ि‍ल्‍म की लिखाई में लगा हूं. फ़ि‍ल्‍म में ख़ून-खराबा काफी होगा, डाकुओं वाला धूम-धड़ाका नहीं. आइडिया है मर्डर-मिस्‍ट्री लिखूं. सोचता हूं लिख लूं फिर अब्‍बास-मुस्‍तान के पास जाऊंगा. अब्‍बू, मुस्‍तु, ले लो, माई-बाप, रख लो, गुरु! वो सब बाद में. आलोक सेंसरवाले स्‍टेज में रगड़ा खा रहे हैं, मैं पहले स्क्रिप्‍ट वाले रगड़ों से तो निकल लूं.. ओह, मर्डर मिस्‍ट्री सोचकर ही सुबह-सुबह कितना एक्‍साइटिंग फ़ील हो रहा है. मेरी कहानी होगी तो ऐसी-वैसी नहीं होगी. बेसिक डिज़ाईन ऐसा रखूंगा कि टप-टप लाशें टपकती रहें. छह मिनट गुजरे नहीं कि किसी को टपका दिया. मर्डर. मिस्‍ट्री तो रहेगी ही. लड़की शॉवर के नीचे नहाने की तैयारी कर रही है. आप असमंजस में हैं हिरोइन यही लड़की है या सात मिनट पहले जिसे बोरिवली के बार में मुस्‍कराते- अदा दिखाते देखा था. तब तक लड़की कपड़े उतारने लगती है और आप सारा सोचना भूलकर सिर्फ़ देखना याद रखते हैं. तब तक लड़की देखती है कि मालूम नहीं क्‍या प्रॉबलम है शॉवर में पानी नहीं आ रहा (मेरे यहां कभी नहीं आता तो मेरी स्क्रिप्‍ट में ऐसे क्षणों का आना ज़रूरी है). लड़की अभी शॉवर के साथ छेड़छाड़ कर ही रही है कि फ्रेम में उसके जीवन के साथ कोई छेड़छाड़ करने चला आता है (और कौन? द मेनासिंग मर्डरर, डैम यू!). और फिर छेड़छाड़ ही नहीं टोटल रेप मीनिंग राम नाम सत्‍य करके निकल लेता है (या निकल लेती है? वी डोंट नो..); ऑल विदिन सिक्‍स मिनट्स. देन वी जंप टू द नेक्‍स्‍ट सीन. मीनिंग नेक्‍स्‍ट मर्डर..

फ़ि‍ल्‍म में इतने मर्डर हों कि उसे लिम्‍का बुक ऑव रिकॉर्ड्स में जगह मिल जाये. आप भी भूल जायें कि कितने लोग मरे हैं कौन ज़िंदा है अभी. इन्‍वेस्टिगेटिंग ऑफिसर जिंदा है या वो भी गया का कन्‍फ़्यूज़न कहानी में बना रहे. और चूंकि कहानी मेरी होगी तो बीच-बीच में कोई कैरेक्‍टर भोजपुरी में भी बात करेगा. मसलन- का गोंसाई जी, ई मडरवा सब का कवनो इन्डिन होगा कि नय, महाराज? एगो बात बताइये लेकिन.. ई साला सब पर्गतसील मर्डर है कि पातनसील? और चूंकि स्क्रिप्‍ट मैं लिखने जा रहा हूं तो उसमें जीजिविषा, असमंजस, किताबें और दार्शनिक आयं-बायं की भी पर्याप्‍त गुंजाइश रहेगी. न भी रहे तो ठेलके मैं गुंजाइश निकालूंगा. मसलन मरने के एक मिनट पहले कोई कैरेक्‍टर सीढ़ि‍यों से उतरता झींकेगा कि प्रूस्‍त को न पढ़के उसके जीवन का कितना नुकसान हुआ. चिरकुट को इसकी खबर न होगी कि पढ़के भी फ़ायदा नहीं होता क्‍योंकि मिनट भर में उसका कपूतिस्‍की डेस्‍टाइंड है! धुआं व आग (वासना के) में नहायी लड़की सैक्‍सी सीन के ऐन बीच खुद से गुत्‍थमगुत्‍था हो रहे चिरकुट आशिक को ठेलकर उसका कान (और आपका दिमाग) काटते हुए बुदबुदायेगी- मुझे मालूम नहीं मेरे जीवन के ज़्यादा दुलारे नीच तुम हो.. या शॉपेनऑवर!

लड़की ने इतना कहा नहीं और गई! लड़का मीनिंग आशिक भौंचक.. अरे, अभी तो कान और पता नहीं और क्‍या-क्‍या काट रही थी और अभी.. ? तब तक ससुर वो भी गए! म.. र्ड.. र! इतने ख़ून हों कि आपका सांस लेना दूभर हो जाये. नाक पर इस तरह रुमाल थमा रहे कि आप गोद का पॉपकॉर्न खाना भूल जायें! जितने दार्शनिकों, लेखकों के नाम मुझे मालूम हैं सबकी किसी न किसी मर्डर के आगे-पीछे चर्चा हो जाये. राजनीति की भी. एक बूढ़ी औरत की गर्दन रेती गई है. आंखें फट गई हैं, झुर्रीदार होंठों से खून बह रहा है मगर वह हे राम या इन हरामियों की आत्‍मा को शांति देना, प्रभो कहने की जगह कहती है- बांग्‍लादेश से गरीबी कब उठेगी, राम? या रहमान. पूरी फ़ि‍ल्‍म में भारत से गरीबी उठाने की बात कोई कैरेक्‍टर नहीं करेगा. वह अंत तक मिस्‍ट्री बनी रहेगी.

नहीं, नहीं, अभी मिस्‍ट्री खत्‍म नहीं हुई. इसी मिस्‍ट्री को अब आप ससुर (या ससुरानी?) पॉडकास्‍ट पर सुनिये..

Wednesday, February 20, 2008

अमोस का दिल और दुनिया..

एक चीज़ जो हमारे यहां इफरात में थी वह थी किताबें. एक दीवार से दूसरे दीवार तक ठंसी हुईं, गलियारे और रसोई में, एंट्रेंस और खिड़कियों के सिल पर- हर कहीं वे भरी पड़ी थीं. हजारों किताबें, फ्लैट के हर कोने में. मुझे लगता लोग आते-जाते हों, जन्‍म लेते और मरते हों, मगर किताबों की कभी मौत नहीं होती. जब मैं छोटा था मेरी यही हसरत थी कि किताब की शक्‍ल में बड़ा होऊं. किताबें लिखनेवाला लेखक नहीं. लोग मक्खियों की तरह मर सकते हैं. लेखकों का मरना भी ऐसा खास मुश्किल नहीं. लेकिन किताबों का है: आप कितनी ही तरतीब से उन्‍हें खत्‍म करने की कोशिश करो, इसकी हमेशा गुंजाइश रहती है कि कहीं एक प्रति ज़िंदा बच जाये और किसी दूर-दराज, असामान्‍य-सी जगह की लाइब्रेरी के शेल्‍फ पर सुरक्षित पड़ी रहे.

एक या दो मर्तबा जब कभी ऐसा हुआ कि शबात के मौके पर घर में खाने को पैसे न हों तब मां बाबा की तरफ देखतीं, और बाबा समझ जाते कि क़ुरबानी का क्षण आ गया है और किताबों की अलमारी की ओर पलटते. वह नैतिक आदमी थे, और जानते थे रोटी की जगह किताबों से ऊपर है और बच्‍चे की बेहतरी सब चीज़ों से ऊपर है. मुझे दरवाज़े से बाहर निकलती उनकी झुकी हुई पीठ याद पड़ती है, बांह के नीचे दो या तीन अपने प्‍यारे पोथों को दाबे मेयर साहब की सेकेंडहैंड किताब की दुकान के लिए हड़बड़ी में निकलते कि जल्‍दी से जल्‍दी इस पाप से निजात पायें...

मैं उनकी तक़लीफ़ समझ सकता था. मेरे बाबा का अपनी किताबों से एक बेहद सेंसुअल संबंध था. किताबों को सहलाना, थपथपाना, सूंघना उन्‍हें अच्‍छा लगता. किताबों की संगत में उन्‍हें एक जिस्‍मानी खुशी मिलती: भले दूसरों की किताबें हों, खुद को वह रोक नहीं पाते, आगे जाकर उन्‍हें छू-टटोल लेना उन्‍हें ज़रूरी लगता. और आज की बनिस्‍बत तब किताबें ज़्यादा सैक्‍सी भी थीं: सूंघने, सहलाने, दुलराने के लिए ज़्यादा मुफ़ीद हुआ करती थीं. सुनहले लिखावट वाली थोड़ा रफ़ बाइंडिंग की कुछ खुशबूदार किताबें थीं, जिन्‍हें छूते ही मन ऊपर-नीचे करने लगता; मानो पहुंच से परे किसी अगम्‍य व निजी दुनिया में झांक रहे हों, और आपके छूते ही वह रोमांच और थरथराहट में आंखें खोल उठेगी. फिर गत्‍ते व कपड़ों से बंधी किताबें थीं जिनसे सरेश की अद्भुत सेंसुअस महक उठती. हर किताब की अपनी खास निजी, उत्‍तेजक महक होती. बहुत बार- किसी ढीठ फ्रॉक की तरह- गत्‍तों से कपड़ा अलग हो जाता, तब कपड़े व देह की उन अंधेरी जगहों में झांककर देख लेने व नशीले महक को सूंघने की इच्‍छा पर काबू करना असंभव हो जाता.

बाबा अमूमन एक या दो घंटे पर वापस लौटते. किताबों की जगह भूरे कागज़ी बैग में रोटी, अंडे, चीज़, और कभी-कभी डिब्‍बाबंद मांस होता. लेकिन कभी-कभी क़ुरबानी पर निकले वह वापस लौटते तो होंठों पर एक छोर से दूसरे छोर तक मुस्‍कान तनी होती- अपनी दुलारी किताबों को खोकर लौटे होते, मगर साथ में खाने का कुछ सामान भी न होता. अपनी किताबें वह ज़रूर बेच आये होते, मगर उस कमी की भरपायी उन्‍होंने तत्‍काल दूसरी किताबें खरीदकर कर ली होतीं, क्‍योंकि सेकेंडहैंड किताब की दुकान में किसी अनोखे ख़जाने पर उनकी निगाह पड़ी होती, ऐसा मौका जो जीवन में दुबारा नहीं आता, और खुद पर काबू करना उनके लिए नामुमकिन हो गया होता. मां उन्‍हें माफ़ कर देतीं, और उसी तरह मैं भी. वैसे भी मीठी मकई और आइसक्रीम से अलग मुझे कुछ खाना अच्‍छा न लगता. आमलेट और मांस से तो एकदम नफ़रत थी. ईमानदारी से कहूं तो मुझे तो भूखे मर रहे उन हिंदुस्‍तानी बच्‍चों से रश्‍क होता जिन्‍हें अपने प्‍लेट का सबकुछ खत्‍म करने को कोई उनके सिर पर न सवार रहता.

(इज़राइली लेखक अमोस ओज़ की किताब: प्‍यार व अंधेरे का एक क़ि‍स्‍सा से एक टुकड़ा)

Tuesday, February 19, 2008

शायद..

उनके पास गाड़ी है, ये नयी ले रहे हैं. हमने दाढ़ी खरीदी थी अब मूंछ पर जी रहे हैं. इन्‍हीं अदाओं को चहलते हुए खा रहे पी रहे हैं. कड़वाहट होती है तो एक अंधेरे से सरककर दूसरी में चले आते हैं, घबराकर किताब उठाते हैं. माइक डेविस कहते हैं दुनिया की एक तिहाई आबादी झोपड़पट्टि‍यों में रह रही है- आधे जिसमें से बीस से कम की उम्र के हैं- तनी हुई सांसों से इस ख़बर को भी हम अपनी आत्‍मा के दु:ख में सी रहे हैं. लेखक कहता है अच्‍छा होता किताब होता, इतिहास के अंधेरों से पार पा लेता. मैं शब्‍द, भाषा, अभिव्‍यक्तियों के अंधेरों में उलझा झींकता हूं बड़ा दुश्‍वार है, समय-समाज से कहां पार है. क्‍यों उठते हैं एक साथ इतने ख़याल, सब समझ जान लेने की ऐसी जानलेवा मरोड़ती कचोटती भूख और फिर मुंह में कसैला स्‍वाद कि एक जीवन कितनी बड़ी उम्‍मीद है मगर वही जीवन गदहे की लीद भी है. आंख मलते हैं, रोते हुए हंसते हैं कि शायद सब यूं ही व्‍यर्थ नहीं चला जायेगा. शायद ये हाथ ये आंख, खुद का साथ, सस्‍ती मिठाई और सस्‍ता भात अब भी हमें मतलब देगा. समूची सिम्‍फ़नी न सही, एक उखड़े आलाप में हमें उछालेगा. शायद.

वो तेरे प्‍यार का ग़म इक बहाना था सनम..

ये पतनशीलता को लेकर पिछले चार दिनों से जोशो-ख़रोश से जो लड़कियां लड़ि‍याने लगी हैं, और इस जोर से हाथ-पैर चलाने लगी हैं कि बेचारे चंदू को एक हारी हुई सी पोस्‍ट तक लिखनी पड़ी.. सस्‍ता शेर के रहनुमाओं को सस्‍तापन बचाने के डिफ़ेंस में अपना एक घोषणापत्र जारी करना पड़ा!.. और मुझ बेहया का क्‍या.. मैं तो शर्मिंदा हूं ही. जीवन में रोज़ जो आते हैं, हो सकता है वह प्रगतिशीलता लुगदी के मोल के सस्‍ते छापेखाने का पोस्‍टर हो, मगर इसका यह मतलब नहीं हो जाता कि हम छाती पर पतनशीलता का बैज धारकर इतराने लगें! लड़कियां (जिनमें ज़्यादातर बच्‍चों की मां हो गई हैं. कुछ बच्‍चोंवाली बच्चियों की मांएं भी हैं, या होने के रास्‍तों पर हैं!) इतरा ही रही हैं. अपना तो जो आगे करेंगी सो करेंगी, मुझे लजवा रही हैं.. नहीं मालूम था एक ऐसा भी ब्‍लॉगदिन आएगा कि मुझे प्रगति व शील की साज-संभाल में ‘शीलवता’ और प्रगत कुमार बनना होगा! मगर अभी आगे कैसे-कैसे दिन आयेंगे कौन जानता है? मैं तो आज की नहीं जानता कि चप्‍पल किधर लहराकर उड़ेंगे और कल तक और कितने शब्‍दों व अभिव्‍यक्तियों को धोबियापाट मिल चुका होगा! स्‍ट्रेंज टाइम्‍स वी आर लिविंग इन, इज़ंट इट?.. पता नहीं किस अंग्रेज मनीषी ने कब किस समय व संदर्भ में कहा होगा. किसी भी समय व संदर्भ में कहा होता, कहन सही ही ठिल रही होती..

बड़ा ठिला-ठिला सा महसूस हो रहा है. बेमतलब हो रहे शब्‍दों से उखड़कर आदमी कहां जायेगा? (औरतें तो जहां जाना है जा ही रही हैं!) पता नहीं ऐसे में अद्धा पीने आप कहां जाते हैं, मैं तो घबराकर संगीत पीने निकल लेता हूं. कभी-कभी खुद संगीत ठिला हुआ मिलता है तो पीने की जगह उसीको पिला आता हूं! आज भी कुछ वैसे ही ख़तरे पिये-पिघलते दिख (दिख से ज़्यादा सुन) रहे हैं!..

मेरी आवाज़ की मिठास से कयतानो वेलोज़ो को रहा नहीं गया तो पाजी मुझ पर चढ़कर गाने की कोशिश कर रहा है! क्‍या कीजियेगा, ऐसी ही दुष्‍टामियों का बोलबाला है.. दुष्‍ट को मत सुनियेगा. मुझे सुनियेगा. नहीं मैं रुष्‍ट हो जाऊंगा.. और रुष्‍ट हुआ तो घबराहट में सारा परगत कुमारत्‍व भूल फिर पतनशील होऊंगा और बात वहीं चली आयेगी जहां से शुरू हुई थी.. और ऐसा होगा तो अच्‍छा नहीं होगा.. क्‍योंकि बातों को दूर नहीं तो कहीं तक तो जाना ही चाहिए! कम से कम आप ले चलने की कोशिश करें.. बाद में. पहले मुझे सुन लीजिए (दुष्‍ट कयतानो को मत सुनियेगा!)..

Monday, February 18, 2008

बैलों का ब्‍लॉग..

दैनिक जागरणों व भास्‍करों के प्रसार-विस्‍तार से जिस तरह हिंदी का चिरकुट क्षितिज ज्ञानाभा से दिक् व काल को प्रज्‍जवलित कर रहा है, ओह, समय आ गया है कि ब्‍लॉग विविध व वैभव से अंतर्जाल भी सुलग-सुलगकर जल उठे. कम से कम सुलग तो उठे ही. ये हज़ार फूलों के खिलने का समय है. मन में ऐसे भाव-भार से हमें सक्रिय होना होगा कि बारह-बारह मिनट पर बहार-बयार आती रहे (समाज में बहार न आये कम से कम अंतर्जाल पर तो हम ले आयें? और न ला पायें तो- मेरे जीवन को तो हमेशा से रहा ही है- आपके जीवन को धिक्‍कार है!). नहीं, सोचनेवाली बात है भंगार से लेकर व्‍योपार तक, हिंदीछद्म व हिंदीबम सबके लिए हम जगह निकाल रहे हैं. अरे, औरों की छोड़ि‍ये, नैन मटकाने वालियों तक को कहा ठीक है ज़रा अब हाथ की कलम मटकाके भी हमें मस्‍त करो. बेटियों के पीछे उठते-गिरते बाप मस्‍त हो ही रहे हैं. सस्‍ते शेरों तक का भाव बन रहा है.. तो बैलों का न बनेगा? बनना चाहिए. प्‍यास व भड़ास सबके लिए जगह है, बैलों के बिहाग के लिए नहीं? कोई मतलब है? होनी चाहिए!

सोचनेवाली बात है क्‍या बैलों को भी अपने ब्‍लॉग के लिए लड़ाई लड़नी होगी? क्‍या मताधिकार के लिए मैंने और आपने लड़ाई लड़ी थी? वह ऐसे ही खटिया पर लेटे-लेटे कान व नाक खुजाते हुए मिली थी या नहीं? बिना लड़े पाया मताधिकार हो चाहे मतासीन लोकतंत्र- घर बैठे-बैठे उसे दो कौड़ी का होते देखने की सार्थकता हमने सिद्ध की या नहीं? फिर बैलों का ब्‍लॉग, या गिद्ध का- उसे हम सिद्ध नहीं कर सकेंगे? इतना भी न कर सके फिर हम कैसे, कहां के बैल हुए, महाराज? मेरा तो मानना है बैलों का ही नहीं, सांप-बिच्‍छुओं का भी ब्‍लॉग हो! कि सुबह-सुबह मज़े में छाती पर हाथ बांधे हुए आप ब्‍लॉग में टहलते हुए पहुंचे.. गोड़ पर ससुर वो कर्मनाशा डंक पड़ा कि मुंह से मां की गाली छूटी और हाथ से मुस्कियायी टिप्‍पणी कि गुरु, मस्‍त कर दिया! सोचिये, कितना मज़ा आयेगा? आपको नहीं कम से कम सांप को तो आयेगा? हमेशा आप अपना ही सोचियेगा तो सांप की कौन सोचेगा? देश भी आखिर आपकी सोच रहा है कि सांप की और नाग की सोच रहा है? बावजूद उसके तरक़्क़ी कर रहा है कि नहीं? तो फिर ससुर आप जबर्जस्‍ती चिकचिक करके सुबह-सुबह हमारे मुंह से मां की गाली और बुढ़ौती वाला झाग निकलवाने पर क्‍यों आमादा हैं?..

सोचने की बात के बाद अब समझनेवाली बात है. ज़रा जेनुइनली समझिये, महाराज, बैलों के ब्‍लॉग के सचमुच बड़े फायदे हैं! संगठन में बड़ी ताक़त होती है, ये मैं नहीं पंचतंत्र के ज़माने से कहा जा रहा है. और इतनी मर्तबे कहा जा चुका है कि बेमतलब हो गया है और फिर से कहने की ज़रूरत पड़ रही है. दिल्‍ली के, या आगरा के ही पत्रकारों को देख लीजिए, इसी संगठन के बूत ब्‍लॉगजाल पर इन्‍होंने बाकियों की नाक में- व देह के अन्‍य नाज़ुक रंध्रों में- दम किया हुआ है. इन्‍हीं पत्रकारों का करम था कि मुंबई में पिछले दिनों राज बाबू की चौबीस लोगों की टिल्‍ली पलटन के टिल्‍ली करतब राष्‍ट्रीय महत्‍व की न केवल ख़बर बन गए, बल्कि बने भी रहे! सन् साठ के दशक में जिसे ख़बर बनवाने के लिए बाला बाबू को सत्‍तर मदरासियों की जान लेनी-लिवानी पड़ी थी, बिना एक गिरगिट व गदहे तक को ज़ि‍बह किये राज बाबू को इन पत्रकारों ने राष्‍ट्रीय लाल तिलक व मराठी मानुस का दुशाला दिलवा दिया! तो पत्रकारिता की ताक़त आप देख ही नहीं रहे, अभिभूत हो रहे हैं.. मगर बैलों के संगठन से आप आंख मोड़े रहना चाहते हैं!

बोलिये, यह अच्‍छा लगता है कि कोई आंकड़ा कुमार ही यह गिनाता रहे कि जिन दिनों नेहरु के गोड़ के पास बैठे थे, या नटराज के कांधे के पास.. यह दिख रहा था कि समाज की सत्‍तर नालियों में सात नाली दक्षिणाभिमुख हैं, फिर नागराजू कमीशन के आंकड़ों ने भी वही प्रमाण इंगित व चिन्हित किये. हमने सब देखा फिर गौर से देखते हुए एक अच्‍छी नौकरी पकड़ ली. और पकड़े रहे. मगर इंगित, चिन्हित, बिंबित ठेलते भी रहे. क्‍योंकि सारे सामाजिक बुखार तो आंकड़ा कुमार आंकड़ों की कड़ि‍यों में ही पिरो व पेर के दूर होता देख लेना चाहते हैं. और फिर आंकड़ा व मुस्‍की काटते हुए करियर के पायदान पे ज़रा और ऊपर ठिल जाना चाहते हैं.. तो ठिलने-ठेलने का यह सब सुख सिर्फ़ आंकड़ा रत्‍न ही प्राप्‍त करें? बैल सिर्फ़ बिवाय प्राप्‍त करे?..

सोचने, समझनेवाली के बाद अब देखनेवाली बात है कि आज की पसंद में आप सांप व बिल्लियों को ही ऊपर देखना चाहते हैं कि कुछ हक़ बैलों का भी बनता है? आपका बनता है? कुछ भी.. फ़र्ज? फिर आप किस तरह का बैल हैं? या बैला? बेल्‍ला तो नहीं ही हैं (मगर वह तो पहले ही कहा था)..

(ऊपर फ़ोटो: आपकी उपस्थिति से देखिए, देबाशीष छेड़छाड़ कर रहे हैं)

Sunday, February 17, 2008

खैनी खाओगे?



ऐसे ही देर रात की लड़ि‍याहट में एक ट्राई मार रहा हूं. एक पॉडकास्‍ट. ठेल रहा हूं. लहे तो रिसीव कीजिएगा, खामख्‍वाह ठिलियेगा नहीं. पॉडकास्‍ट की शास्‍त्रीयता के स्‍तर का ही खत्‍म होता मैं..

Saturday, February 16, 2008

नाली में गोड़ मत बुड़ाइये..



कहे थे नाली में गोर मत धरो
नीचे नाला है. ब्‍लंट है ज़्यादा स्‍टंट
है, हिरहुरिया में कीना हुआ साढ़े तीन
रुपल्‍ली का कगदी लुगदी भाला है.

गोर बचाने की बात नहीं, गोर से ज़्यादा
मुंह मत धरो. मुंह बरो त् थूकके
आगे बर्हो. मरदे, देखते नहीं, पांकी
का गहीर धंसाला है? हिलिर-हिलिर
हैं कुच्‍छ हिलै-हिलै जिनको मजा
आता है. मुंह का ललछौंका अऊर
कांखी का झिरकुट बसाता है. बिलिर-बिलिर
बिलाक कीजियेगा, जी? हगवन को ढांक
कीजियेगा, जी? कि सूंघके सुबही सकारथ?

अरे, कुकुरहांव को एक लात लगाके आगे
बर्हि‍ये. मुंह में पान का सुगंधि अऊर
ज्ञान-गुन ध्‍यान के आगे चलिये.
चलिये, महाराज!

चिरकुट बिस्‍कुट

ज्ञान व समझ भी सीधे कलकत्‍ते के लड्डू वाला मामला है. खाने की सोचते ही आदमी पछताने लगे (औरत के साथ कोई अलग स्थिति नहीं!), और जिसने नहीं खाया, वह तो रो ही रहा है. नॉलेज, अंडरस्‍टैंडिंग, समझ, शिक्षा- माल, माल और माल खरीदते व सिर्फ़ व सिर्फ़ खुद में लीन रहते अमरीकी लोक मानस में गदहे की लीद हो गई है. वैसे अमरीका को लेकर चिंता करने की ज़रूरत नहीं, दुनिया के बाकी हिस्‍से भी उसी राह चल रहे हैं. हमने तो वैसे भी शिक्षा को हमेशा रोजग़ार पाने का साधन माना है (एक बार वह मिल गई तो सारी शिक्षा हम वहीं घुसा आते हैं जहां से इन द फर्स्‍ट प्‍लेस निकालकर लाये थे! हाथ में उठाकर किताब देखते भी हैं तो महज यह देखने के लिए कि यह हमारा नाम क्‍यों नहीं छाप रही..). हालांकि हमारे यहां अभी यही अपने में बड़ी तक़लीफ़ है कि एक बड़ा तबका अशिक्षित व अनपढ़ छुटा पड़ा है. शिक्षित हो जाये तो शायद समाज में कुछ रोजग़ार पाने लायक हो जाये, समाज में सुधार आ जाएगा उसकी गारंटी नहीं है. क्‍योंकि भ्रष्‍टाचार- जिसके बारे में बात करना व सोचना हमारे सोशल एटिकेट से गायब हो गया है- सबसे ज़्यादा तो इसी शिक्षित तबके में है. किडनी का रैकेट चलानेवाला और निठारी का जल्‍लाद कोई अनपढ़-गंवार लोग नहीं हैं. और इसके साथ यह भी उतना ही सही है कि जो शिक्षित हैं और जल्‍लाद नहीं हैं, वो अपनी हासिल शिक्षा के दोगलई वाले इस्‍तेमाल में बझे हैं. माने उनकी सारी शिक्षा का इकलौता उद्देश्‍य उनके स्‍वयं के करियर को प्रमोट करने में है. तो सवाल ज़रा टेढ़े-मेढ़े हैं. शिक्षा से ज़्यादा समाज किस तरह के मूल्‍य बना रही है (और क्‍यों बना रही है, और उनके बनने से रोकने के तरीके क्‍या होंगे)- सवाल उसके हैं..

ख़ैर, मैं ज़रा बहक गया. वापस अमरीका पर लौटता हूं. खूबसूरत एडोरेबल ‘अमेरिकन आइडल’ ब्‍लोंड केली पिकलर फॉक्‍स के एक गेम शो में भूगोल के अपने बेसिक ‘ज्ञान’ का चिरकुट परिचय दे रही है. वीडियो देखकर अपनी सुबह गुलज़ार करें. ज्ञान के ऐसे परिष्‍कृत संस्‍करणों से अपने यहां के सेलीब्रेटीज़ बहुत अलग होंगे, चिता यह नहीं है. चिंता चिरकुट सेलीब्रेटीज को बिस्‍कुट बनाकर दिन भर कुरकुराते रहने का जो अपने यहां मीडिया में चौबीसों घंटे चलन चला है- असल बिवाय वह है. हम सबके पास कुछ अच्‍छे, स्‍मार्ट शब्‍द हैं. ऑपिनियन और ऑपिनियन देने की अदायें हैं, अपने करियर से परे बा‍त व विचार बनाने की समझ कुछ है? क्‍या और कितनी है अपने अकेले के एकांत में कभी गंभीरता से हम इस पर सोचते हैं? सोचते हुए कोई तस्‍वीर बनती, सामने आती हे? इस लिहाज़ से अमरीकी गंडगोल के गोले से हम बहुत बाहर नहीं हैं. थोड़ा सुज़न जेकॉबी ने सोचा है, थोड़ा आप सोचियेगा.

Friday, February 15, 2008

तिलकुट झारा संवाद



- तिलकुट खा लिये?

- हं.

- तब्‍ब?

- ...

- अरे, तब्‍ब अऊर कोची है?

- (घबराकर) झारा फिरे हैं!

- कंहवा? कंहवा फिरे हैं, रे गोबर?

- हेने..

- हेने?

- अऊर होने.

- मइय्या गे मइय्या.. एही सीखने का लिए इस्‍कूली जाता है, रे?

- (कन्‍फ्यूजियाये हुए) नै.. इस्‍कूली में सी यू टी कट अऊर डी यू डी डड्डो त् सीखे..

- फिर झारा काहे ला फिरे? एकरा के ‘अन डू’ के ला करेगा?

- हमरा शिच्‍छन ऐसई हुआ है..

- कइसई हुआ है, बोल न रे मुंहचोर!

- ...

- अब बोलता काहे नहीं है रे, फर्रबक?

- (मुंह चुराते हुए) बोलें?

- बोल नै तोरा मुंह में चार चइली ठेलवतई!

- (लड़ि‍याते हुए) हम कट्टो करेंगे अऊर झारो फिरेंगे..

व्‍हॉट ए मॉर्निंग..

उठ गया. जम्‍हाई-टम्‍हाई. पैर-वैर पटक लिये. सिर नहीं पटका. बाद में पटकूंगा.. परदे खींच लिए. ब्‍लागवाणी देखा. चिट्ठाजगत. अच्‍छा? हूं. जानेवाले सिपाही से पूछो. क्‍या पूछें? एक खड़ा सिपाही दु:खी हो तो रहा है! फेल होने के फायदे लिख लिये. चरणों में बैठकर जीवन का कैसे उत्‍सव मना लें का महती ज्ञान लिया. झूमते मस्‍त महीने के मौसम से भी लबरेज हुए. उसके बाद? फिर किधर देखूं? उधर जिधर फरवरी की उतरती हवाओं की नहायी धूप है? भई, कोई चाय पिलायेगा? वो दूसरी वाली हवाई चप्‍पल किधर है? और पर्स में इतने ही पैसे थे? फिर कितने थे? पड़े-पड़े ससुर रात में खुदे पैदा हो जायेंगे?.. ठीक है, ठीक है, उखड़ने की बात नहीं है! बात तो बहुत सारी है लेकिन उखड़कर बाबू कुछ उखड़ने वाला नहीं है. चार बेल पत्‍ते और डेढ़ रुपये का बताशा दिन शुरू करो, बया की तरह घोंसले में कर्मलीन रहो. इज़ इट आस्किंग टू मच? नो, इट्स नॉट, सो जस्‍ट बी हैप्‍पी विद् इट, गेट गोइंग, इडियट..

ओके. ऑल राइट. दिन की सक्रिय सजावट का भूगोल क्‍या है? कहां, किधर, कैसे? फ़ोन करने हैं? फट से कहीं भागना है? सेटियाना- सेटियाना किसको है? पटाना? कहीं जी लगाना? कहीं गोड़ धंसाना है कि थॉट मशीन एक्टिवेट करनी है? आगे-पीछे कुछ दिख रहा है, कि अभय की बकलोल भूलकर फिर कविता का कैलेंडर बुनने लगें? कि नहीं, जानेवाले सिपाही से ही पूछें? क्‍या-क्‍या पूछेंगे? और क्‍या नहीं पूछेंगे?..

धत्, कुछ मतलब है इसका? फिर किसका मतलब है? विजिटर कितने हुए उसका होगा? चाय? हवाई चप्‍पल अभी भी नहीं मिली है! फरवरी की उतरती हवाओं में नहायी धूप का रंग उतरा जा रहा है. दिन गुजरा जा रहा है! झूमता मस्‍त महीना तो जा ही रहा है! ओह, फिर? व्‍हॉट ए मेलंकली मॉर्निंग..

Thursday, February 14, 2008

हम बहस चलायेंगे!.. आइए न, बड़ा मज़ा आएगा..

कितना अच्‍छा लगता है बहस करना. जिन्‍हें नहीं लगता अराजनीतिक हैं भगवारी हैं ब्‍लॉग की दुनिया के पटवारी हैं. हमारी तरह नवल नवरत्‍न सफेद घोड़े नहीं हैं, इंटर कालेज का चुनाव जीते नये इतराये लौंडों की तरह चौड़े नहीं हैं. हमें देखिये न, हमारी बहसों में एक अदा है. चारों ओर के राजनीतिक सूनेपन- बहस ब्‍लूज़ में, ओह, हम ट्रूली बहस बीज़ हैं! ऑर बहस वीनी हैं? सो डिफरेंट फ्रॉम एवरीवन एल्‍ज़, सो क्‍यूट ना? वेरी ब्रूट ना? ओह, वी आर सो अमेजिंग, फ्लाइंग सो हाई, डिड यू नोटिस? कितनी जगह लोग हम पर चर्चा कर रहे हैं, अपने एक क्राईम रिपोर्ट में मनोहर कहानियां तक ने हमको मेंशन किया है- डिड यू नोटिस? डिड यू, डिड यू? ओह, कितना अच्‍छा लगता है बहस करना! गरदन तक हम इस पंक में जंक में धंसे हैं! बहस बहस बहस स्‍ट्रेट मार्च लेफ्ट राईट देन लेफ्ट अगेन ओ वंडरस बहस, ओ माई लव, व्‍यूटि बहस वाइरस ओ ओ ओ!

बहस का हमने एक तरीका और अंदाज़ ईजाद किया है. धौंस व धमाके का, बात रखने, रखाने का. भैया व दादा को बुलाने, उलझाने फिर सात कदम आगे ले जाके उनकी पैंट उतरवाने, चप्‍पलों पिटवाने का. यही हमारी तमीज़ व तहजीब है. गो तमीज़ और तहजीब जैसे लफ़्जों को सजाना और मेहमान को अचक्‍के में चप्‍पलों ठुकवाना हमें बड़ा मनभावन लगता है. और सोचिये तो बुरा क्‍या है? आदमी बड़ा नहीं बहस बड़ी है. और फलाना अख़बार हमें बोल रहा है, ढिमाकी मैगज़ीन तोल रही है तो इसीलिए तो कि बहस खड़ी है? और हमने नहीं ‘जनता’ ने खड़ी की है (जनता शब्‍द हमें कितना तो प्‍यारा है!). हम तो सिर्फ़ मॉडरेट करते हैं. बस कुछ ऐसे हूनर से मैनिपुलेट करते हैं कि हर डेढ़ महीने चार लोग कुछ छूटे हुए बछड़ों की तरह आंगन में दौड़ने लगें. पटपटायें, गिर पड़ें, नाक से धुआं छोड़ने लगें. यह उससे भिड़ जाये, वह उसको पटक दे, ग़दर मच जाये, हम आज की, कल और परसों सबकी पसंद पर छा जायें. फिर किसी को लात लगे, कोई जोकर बन जाये घंटा हमारा क्‍या जाता है? बहस में रंग ऐसे ही थोड़ी आता है? फिर हम कुछ करते कहां हैं? जो करती है जनता करती है- दूध का दूध और पानी का पानी कर देती है. गो अलग बात है कि हमारा कोई पानी पानी नहीं करता. हम यहां इनको उनसे फंसाकर, लड़वाकर अपनी लड़ि‍याहटों की जगहों की खोज में निकल लेते हैं. जहां संवरना हो उसको सेट और जहां स्‍वार्थ न सधे उसे लंगी और बम पलेट कर आते हैं. आप बताइए, न न आप बक ही डालिए, ऐसी कौन सी जगह है जिसे सेटियाया जाना हो और हमने सेट न किया हो? एक नाम सूझता है कोई मथुरा से नरबाना तक? प्रगतिशील नीच से बाल चंदामामा तक? नहीं सूझेगा क्‍योंकि हम सुलझे हुए हैं! इतनी सारी जगहों पे हम छप रहे हैं आप देख रहे हैं? नहीं देख रहे हैं तो फिर आपने क़ायदे से ‘असली’ जनज्‍वार नहीं देखा. असली बहस भगंदर देखने से भी आप रह जा रहे हो. प्‍लीज़, अगली दफा आइए न? शान से आपकी स्‍वागत में हम क़सीदे पढ़ेंगे, खूब-खूब आपसे बुलवायेंगे; ज़रा वक़्त निकल जायेगा तब आपकी चूतड़ पर लात लगायेंगे. हो-हो बड़ा मज़ा आयेगा, आइए न, हम बहस चलायेंगे.

Wednesday, February 13, 2008

ओ सजनी, कैसे तोहे सेटियाऊं, कैसे अंकवार भरूं..



कैसे यह मझधार भरूं
अज़दक का विस्‍तार करूं
कहां छुपी हो प्रिय पठकिनी
तोरे करेजवा कैसे वार करूं
कैसे यह पुल पार करूं

फीडबर्नर के सब्‍सक्राइबर बढ़ते नहीं
रीडर फीडर पर तनिको उखड़ते नहीं
वही पचीस-पचास का तांता है
वही मुरचाया फटही छाता है
ससुर हंसता है न रुलाता है
छुरी पे कैसे धार धरूं, सजनी
कैसे यह पुलिया पार करूं

ओ हिन्‍दीयुग्‍म के कालाकांकर
ओ छद्मयुग के माताहारी
ओ दीप्‍त तृप्‍त नयनाभिराम
ओ निर्मोही सुप्‍तहृदय व्‍यभिचारी
कित जाऊं कहां अंकवार भरूं
किस कोने पूजूं तोरे मुखमंदिर
किस महफ़ि‍ल तोरे प्रीत बरूं
ओ बालम, कैसे यह गड़ही पार करूं?

अच्‍छा और ठीक..

फजलू भैया के नश्‍के दम पे सोचे ठीक है पल्‍टन जाइन कर लेंगे. हमारी हैट को लेके हुआं सब हल्‍ला-टल्‍ला किये तो रेलवे की डिरेबरी जिंदाबाद. मेहताब को बताये तो मुंड़ी हिलाके बोली अच्‍छा? हम रस्‍ता-बेरस्‍ता ठीक सोचके मुस्कियाके रहे. महीनों फारम आफिस के आगे चक्‍कर लगाये. किस-किसको चाय पिलायी, बी‍ड़ि‍यां सुलगायीं. रात को सपने में ऊपरवाला अच्‍छा है बोलके दुआ देता, हम ठीक है करके लेते उसके बाद बड़ी अच्‍छी नींद लग जाती. मच्‍छर फिर एकदम लगते ही नहीं. फिर जाने कौन बात हुई कि सल्‍लू की सास मरीं या कि पुराने मकान का छत गिर पड़ा था. हस्‍पताल के चक्‍कर-सक्‍कर के मामले पैदा हुई गए. मामू ने कहा बेटा तोहे दुकान संभाले का होगा, हमने कहा अच्‍छा? इस तरह पल्‍टन वाली बात रह गयी और हमारे कंधे पे आ गई जुनैब वाली सइकिल की दुकान. रेलवे की डिरेबरी का सपना अभी कंधे पे था ही, हमने सोचा चार-छह महीने निकल जायें, जनाना जो हैं घर संभाल लें तो हम ठाठ से लौटेंगे पुरानी जगह. पर भैया साइकिलों के पीछे वो चकरघिन्‍नी हुए कि हमने सोचा चलो, यह भी ठीक और उसी दरमियान जाने कैसे तो हमारा व्‍याह निपट गया.

मझली चाची ने सवाल किया था कि सैदू बाबू अब्‍ब तुम बड़े भये तो हम बोले अच्‍छा? नन्‍हकू की छोटी बहन से शादी हो गई तो हमने तय किया कि ठीक. दुकान पे जाने कौन किसकी बतकही पे मारपीट हो गई. फूफा के हाथ पे डंडा पड़ा था और हमारा तो कपार फूटा था. बंटो की आंख में किसी हरामी ने चेन खींचकर मारा था, तो हम सारे लोगों की थाने में बुलाहट भई. फूफा को अंदर बुलाके कहा गया दस हजार पे बात छुटेगी तो पहले तो वो बेचारे घबराये. अच्‍छा? बोले बाद में रोने लगे. उसी में कब तो जावेद की खाला ने आके खबर की कि तैं बाप बने वाले हो. हम बोले ठीक फिर तीन दिन की सज़ा काटके बाहर निकले. दुकान जाने कौन हरामी रात ही को फूंक जला दिया था. अच्‍छा? खबर सुनके तो हवालात में ही हम फूफा से बोले मगर दुकनिया के आगे काले भंगार के सामने खड़े होके मन ही मन बड़ी तकलीफ हुई. फिर सोचा ठीक है कुछ दिन होटल की नौकरी कर लेंगे. फिर नन्‍हकू ने कहा होटल में कमाई कहां है तो हमने कहा अच्‍छा? नन्‍हकू कहने लगा दीपक टाकी के आगे टिकट बेचने में कमाई है तो हमने कहा ठीक. खूब टिकटें निकालीं हमने. सनीमा भी देखा. यार-दोस्‍तों को भी दिखायी.

एक मोटर पाट वाले सरदारजी थे उनसे खूब पहचान हो गई. कहते तू फिकर न कर, मैं तौंको लुधियाने में सेट कर दूंगा. हम सोचे अच्‍छा? फिर जनाना के पैर में फोड़ी थी जाने क्‍या निकला था कि फिर हस्‍पताल और खरचेवाली नौबत आ गई तो हमने कहा ठीक. सुई का असर था या मिलावट वाली दवा थी बेचारी औरत खड़े-खड़े बेहोश हो गई तो नन्‍हकू और दूसरों के साथ हमारा भी पारा गरम हो गया. हस्‍पताल वाले समझाते रहे वैसी बात नहीं जैसी आपलोग समझ रहे हो हमने कहा अच्‍छा? उनने कहा ठीक. मगर नन्‍हकू का वैसे भी मेरठवाले धंधे में नुकसान हुआ था तो वो तो उखड़ा था ही और हमने भी जाने पी रखी थी या क्‍या था सो फैलके बोले अच्‍छा? फिर हस्‍पताल में वो तोड़फोड़ की. खूब पीटा सालों को. फिर जाने क्‍या-क्‍या हुआ ठुल्‍ले आ गए फौजदारी का मामला बन गया हमने कहा अच्‍छा? थानेदार शरीफ आदमी था समझाता रहा ऐसे वाकयात हो जाते हैं. नन्‍हकू ने कहा अच्‍छा? मतलब थानेदार के साथ भी अच्‍छी गाली-गलौच की. मुझे थाने ले गए जबकि नन्‍हकू उनके हाथ चढ़ा नहीं फिर हमने भी कहा ठीक. वहीं खबर हुई कि नन्‍हकू की बहन गुजर गई तो हैरत में हम परेशान हुए कि अच्‍छा? लेकिन थाने के अंदर रहके अब क्‍या किया जा सकता था तो हमने सोचा इतना सोचके काहे माथा फोड़ना. फूफा बोले ठीक..

Tuesday, February 12, 2008

जो इंडिया शाइनिंग की सोच पर फुदकते हैं, यह उनके लिए है..



जो इंडिया शाइनिंग की सोचते ही बलून की तरह फूलने लगते हैं, चेहरा कोमल व बगलों में गुदगुदी होने लगती है.. उनसे विनम्र निवेदन है, थोड़ी देर के लिए अपनी फुदकन को विश्राम देकर इस लिंक पर ज़रा सा समय दें.. पढ़ें, गुनें, विचारें.. फुदकना फिर भी अनिवार्य लगता रहे तो फिर मज़े से होलूलू-होलूलू करें..

साइनाथ, साइनाथ..

पता नहीं हिंदी में वह दिन कभी आयेगा जब समाज के अलग-अलग क्षेत्रों की चिंतायें, तत्‍संबंधी सुझाव व उस क्षेत्र में सूरज की (या जिसकी भी) किरणें ब्‍लॉग पर एक जगह संकलित होंगी. माने शिक्षा संबंधी चिंताओं की खोज में व्‍यक्ति निकले और वह एक जगह मिल जायें. ऊर्जा की स्थिति क्‍या है, या भारत में कृषि संबंधी इश्‍यूज़ क्‍या हैं, या क्षेत्रवार ग्रामीण तरक़्क़ी (या नरक) का ग्राफ किस तरह का है- जैसे विषयवार संकलन. थोक में एक जगह. या चलिए, एक जगह नहीं, चार जगह. अभी तो सच्‍चाई यह है कि.. करीना कपूर को गूगल सर्च में डालिए, पंद्रह हजार नतीजे मिलते हैं. पी साइनाथ को डालने पर कितना मिलता है वह इतना हास्‍यास्‍पद है कि मैं नहीं बताऊंगा; और जो मिलता है उसमें ‘पी’ के साथ भड़ास का यह लिंक भी घुसा चला आता है कि कैसे ‘जमकर दारु पी’.. जाने दीजिए, सच्‍चाई क्‍या है वह आप जेनुइनली जानना चाहते हैं तो आप भी जान ही रहे होंगे.

एनिवे, मैं अलग-अलग क्षेत्रों के सूचना-संकलनों की बात कर रहा था. वह कब होगा (सचमुच कभी होगा ही, यह भी कौन जानता है?), कैसे होगा; उसे करने का समय व साधन लोग कैसे जुटायेंगे- सब बड़े उलझे, टेढ़े प्रश्‍न हैं. इसलिए भी ज़्यादा हैं क्‍योंकि लगन व काम की एकाग्रता जैसे लक्षणों के हिंदी की दुनिया में बहुत दर्शन नहीं होते. हिंदी के इतने सारे पत्रकार गरीब घरों से आते हैं, मगर शायद ही अबतक हुआ है कि किसी ने साइनाथ जैसे फोकस्‍ड, महत्‍वाकांक्षी काम को अंजाम दिया हो. या उनके पास अपने विषय पर विस्‍तार से कहने को इतना-इतना कुछ हो. क्‍यों नहीं है? इसीलिए कि अपने विषय से ज़्यादा ताज़ा-ताज़ा अमीरी देख रहा पत्रकार फ़ि‍लहाल यप्‍पी अमीरी देखते हुए ही सुखी है? विषय को देखता भी है तो सिर्फ़ अदाबाजी की नाटकीय अदाओं की तर्ज़ पर देखता है? वास्‍तविक सच्‍चाई क्‍या है यह तो उनकी आत्‍मा ही ज़्यादा ढंग से जानती होगी. मैं जो जानता हूं वह यह चिंता है कि ‘एवरीबडी लव्‍स अ गुड ड्रॉट’ जैसा पाठ हिंदी के पास नहीं, न उसे मुहैय्या करवाने की वैसी शिद्दत से बेचैनी (मैं साइनाथ की किताब के आनन्‍द स्‍वरुप वर्मा द्वारा किये हिंदी अनुवाद 'तीसरी फसल' की बात नहीं कर रहा. वह तो प्रकाशकीय धंधा है)..

Monday, February 11, 2008

एक पतित पति के नोट्स: दो

घर लौट आया हूं. धूप और सुधा पद्मनाभन के धोखों के बाद लौटने को घर ही होता है. लौट आया हूं और घर में घर लौट आया हूं जैसा खड़े होकर खुद को देख रहा हूं. थोड़ी देर बाद बैठे हुए भी वही देखता रहूंगा. वैसे बाहर भी ऐसा क्‍या ख़ास देख लेता हूं? जो दिखता है बड़े लेबल्‍स के विज्ञापनों का बिलबोर्ड दिखता है. जिसे देखने भर का ही मेरा लेवल है. खरीदने का कहां है? सुधा पद्मनाभन भी बॉस और बॉस के साले के लेवल में अटकी पड़ी है, मेरे लेवल तक कहां उतर रही है? और पत्‍नी के नाम पर जाने जिस तरह की जो जंतु घर में है, उसका जाने कौन-सा तो लेवल है.

इतनी अर्थ-अनर्थ की चिंतायें दिमाग में घूमती हैं (ज़्यादातर अनर्थ की ही) कि कभी-कभी लगता है दिमाग फट जाएगा. जबकि फटता नहीं. खाने के बाद एक छोटी झपकी से तरोताज़ा होकर फिर वही सब ऊटपटांग घूमने लगता है. दौड़ने, उड़ने लगता है जैसा भी कह सकते हैं. ख़ैर, मैं लौट आया हूं. पत्‍नी नहीं लौटी है. वह कहीं जाती ही नहीं तो उसे लौटने की ज़रूरत नहीं रहती. बहुत बार मैं गंभीरता से सोचता हूं यह अपने सोफे से कभी उठती भी है या नहीं. उठती नहीं तो खाना कब बनाती है, फ़ोन पर बात कब करती है (क्‍योंकि घर से सुधा पद्मनाभन को कभी फ़ोन तो मैं करता नहीं, जबकि बिल के पैसे मैं ही भरता हूं!).. क्‍योंकि हमेशा पत्‍नी को- जैसा अभी देख रहा हूं- इसी अवस्‍था में देखता हूं. सामने खुली हुई टीवी, हाथ में रिमोट, और चेहरे पर पुराने ज़माने के त‍पस्वियों जैसी भयानक एकाग्रता!

पत्‍नी को बच्‍चों (मेरे दो बच्‍चे हैं. दोनों मेरे ही हैं) से बहुत प्‍यार है. लेकिन टेलीविज़न के रिमोट से ज़्यादा है. बच्‍चे उसकी गोद में आकर लोटने, लाड़ जताने लगें तो इसका यह मतलब नहीं कि वह रिमोट बगल में फेंककर बच्‍चों के गाल चाटने लगे. नहीं. रिमोट वह उसी तरह से कसकर पकड़ी रहती है जैसे कोई गांववाला कस्‍बे के मेले में हाथ में चप्‍पल चांपे रहता है! पत्‍नी को थाहने के लिए दो-तीन मर्तबे मैंने खेल भी किये हैं. मसलन उससे दो हाथ की दूरी पर पासबुक और चेकबुक खोलकर बैठ गया हूं कि देखूं, अब रिमोट छोड़कर मेरे कंधे से सटी लाड़ जताने आती है कि नहीं. आती हरामख़ोर हर बार है, लेकिन रिमोट उसी तरह चांपे रहती है!

मैं आकर कमरे के बीचों-बीच खड़ा हो गया हूं मगर अब भी उसकी आंखें वहीं हैं जहां मेरे आने के पहले टंगी होंगी! ऐसे में कभी-कभी लगता है अच्‍छा होता बाहर धोखों के धूल में ही धंसा रहता, घर लौटकर क्‍यों चला आया हूं? यह स्‍त्री क्‍या सचमुच मेरी स्‍त्री है. इस घर में दो बच्‍चे हैं, वे मेरे ही हैं? मैंने ही उन्‍हें पैदा किया है? (पैदा तो इसी कमबख़्त ने किया है, मगर उत्‍प्रेरक व सर्विस-प्रोवाइडर मैं ही हूं?).. इस तरह से घर लौटकर अच्‍छा नहीं लगता.. दिमाग में कील गड़ने लगते हैं. और गड़ते रहते हैं..

(फ़ोटो उड़ाना इंस्‍पायर करने के लिए बेजी का आभार)

रोज़ ज़रूरी है?..

सुभो-सुभो फिर?.. काम नहीं चलता?.. एक दिन मैं चुप नहीं रह सकता? एक दिन! जस्‍ट वन सिंगल डे?.. रोज़ आवारगी, या आवारगी की नौटंकी करते रहना ज़रूरी है? विश्‍वास, आस्‍था, परम्‍परा जैसी सकारात्‍मक, सर्जनात्‍मक बातें नहीं कर सकता? रोज़-रोज़ याद दिलाते रहने की ज़रूरत है? रोज़? और मैं रोज़ भूलता रहूंगा? बाला साहब, या राजा साहब (एक ही बात है, ससुर) या उनसे ऊपर यह शहर याद दिलाती रहती है, तब भी?.. वैसे भी आभासी लोक में मुझे किसकी तलाश है? ज्ञानहरण की कितनी नौटंकियां करूंगा? सच्‍चाई जो है उसे कितना झुठलाऊंगा? जानता नहीं लंगियों के गीत कहीं नहीं जाते, नयी लंगियों तक ही पहुंचाते हैं? जबकि फिर-फिर तिनका जोड़ते रहने की बात भी बनी रहती है! गुस्‍से की तो रहती ही है.

ओह, मैं क्‍या हूं? सुभो-सुभो नोटपैड की मह-मह खुश्‍बू हूं? ऐसा? इतना व्‍यर्थ गुमान?..

(फ़ोटो तहलका से साभार)

Sunday, February 10, 2008

जैसे हैं हाल



एक

ऐसा कहां होता है कि अब दोस्‍त
पूछते हों कैसे हो, क्‍या है हाल
बीच-बीच में कोंचकर खुदी को
याद दिलाना पड़ता है
पूछना अकेले के गुमसुम में
कभी मिल भी जाता
है बुदबुदाहट भरा जवाब
बहुत बार तो सिर झुकाये
बस ख़ामोशी मिलती है.

दो

अजाने अंधेरे, मैदान, पहाड़ि‍यां और
फिर कैसे-कैसे तो घुमावदार
रस्‍तों के आखिर में
कोई अजनबी मुल्‍क होगा
या गुमनाम गांव कोई
वहां पहुंचकर तसल्‍ली से
पूछूंगा किसी से घर के हाल
क्‍योंकि घर में घिरे हुए
अब कहां हो पाता है
पूछना घर का हाल.

Saturday, February 9, 2008

चोखवालियां, जो शोख नहीं हैं, इतनी हड़बड़ी में क्‍यों हैं?..

लड़कियां इतनी हड़बड़ में क्‍यों होती हैं? यह अच्‍छी बात है कि अपनी उम्र बता रही हैं, खुद को औरतें पुकार रही हैं, दो कदम आगे जाकर यहां तक स्‍वीकार रही हैं कि हसीन नहीं हैं (जो अच्‍छी बात भले हो, एनकरेजिंग नहीं है! माने, क्‍या यह काफी नहीं था कि हम ठंड में खड़े-खड़े गिर रहे थे, भले रघुराज मियां उसका कितनाहूं तार्किक खुलासा करते रहें- अब इस डिप्रेसन में भी गिरें- और गिरे रहें कि ससुरी, लड़कियां हसीन तक नहीं हैं? हद है..); मगर इस सबसे ज़्यादा चिंताजनक बात यह है कि लड़कियां (जो हसीन नहीं हैं, सो गॉड्डैम सेड्ड अफ़ेयर!) हड़बड़ी में हैं! जबकि एक दिन पहले ही हमने मिस और बाद में मिसेज़ हुई गंगा का कूल एक्‍ज़ांपल इसीलिए क्‍वोट किया था कि मच्‍योर समझ का रास्‍ता खुले, लड़कियां भर्र-भर्र और ढर्र-ढर्र बहती न रहें; गंगा की तरह कूलली व स्‍मार्टली बिहेव करें. मगर चूंकि अंतत: हैं लड़कियां ही (ऊपर से हसीन नहीं ही हैं) अम्‍बा की तरह हदर-बदर चट् अपनी राह का फ़ैसला ले लेंगी और नतीजे में न उन्‍हें शाल्‍व अपनायेगा, न विचित्रवीर्य (विचित्र? वीर्य? व्‍यास महाराज को कोई अन्‍य नाम न सूझा?), भीष्‍म बाबा के अपनाने का तो सवाल ही नहीं उठता (उन ससुर की सिर्फ़ इतने भर की बुद्धि थी कि स्‍वयंवर से अम्‍बे, अम्बिके, अम्‍बालिके तीनों बहनों को अपना मर्दानापन दिखाके टांग लाये. अम्बिका और अम्‍बालिका तो ख़ैर, विचित्रवीर्य- अबे, लेकिन कोई और नाम नहीं सूझा?- के साथ सेट हो गईं; मगर मिस्‍स अम्‍बे जो शाल्‍व को अपना दिल दिये होने को लेकर सबसे ज़्यादा लड़ि‍या रही थी, धोबी की गदही की मानिंद दर-दर की ठोकर खाती रही. अच्‍छा-खासा हिरोइन मटिरियल थीं, अंत तक आते-आते बिंदू जैसी वैम्‍प मटिरियल बनकर रह गईं!).

तो मिस्‍स अम्‍बे के हड़बड़-तड़बड़ का इतना क्रिश्‍टल क्लियर कट एक्‍ज़ांपल है, फिर भी लड़कियां अपना सबक नहीं ले रही हैं. इनको यही लगता है कि दुनिया (माने हिंदी के डेढ़ सौ लोगों का ब्‍लॉगजगत) अपना सारा काम-धाम छोड़ दे और इनकी आंख में झांक कर (जो वैसे भी हसीन नहीं है) कंकड़ बाहर करे, इनकी और पता नहीं किन-किनकी किरकिरी दूर करे! जबकि विमल ने पहले ही साफ किया है कि उसकी पालिटिक्‍स महिलाओं की किरकिरी दूर करना नहीं, मटरगश्‍ती है. यूनुस खान ने पहले से भी पहले साफ कर दिया था कि उनकी सारी पालिटिक्‍स हेमंत व किशोर कुमारों व अन्‍य कुमारियों के स्‍वर-चरणों पर लोटते रहने तक सीमित है. जहां तक मेरी बात है, मैंने आज नहीं, छठवीं कक्षा में ही घोषणा कर दी थी कि जिस गली में हसीनाओं का घर नहीं, उस गली से अपने को घंटा गुज़रना ही नहीं!

लेकिन ये चोखवालियां हैं (हसीन होतीं तो कुछ बात भी होती) कि गुहार करने से बाज नहीं आ रहीं- कि प्‍लीज़, हमारी चोख देखो.. देखो, हम कितनी शोख हैं! और लगे हाथ कर सको, तो भइय्या, ज़रा किरकिरी भी दूर करते चलो.. अरे? एक तो आप खुद्दे मिस्टिक के चिथड़े-चिथड़े फाड़ रही हो (पहले कह ही दिया है कि हसीन नहीं हैं), दूसरे, शोखी की जगह शोहदों की तरह डंडे भांज रही हो.. और तब्‍बो चाहती हो कि हम चोख में झांकें? बाला और बाली पहनायें? दुनिया में दूसरों को (माने डेढ़ सौ वाले हिंदी के ब्‍लॉगजगत को) और काम नहीं है? नीलिमा सुखीजा अरोड़ा ने अख़बार में मेंशन कर दिया, काफी नहीं है? कबाड़खाना, सस्‍ता शेर, भड़ास, मोहल्‍ला, बेटियों का ब्‍लॉग के ऊपर आप अपनी बोटियां सार्वजनिक करने चली आईं और ताबड़-तोड़ दनादन ऐसे पोस्‍ट पर पोस्‍ट ठेलने लगीं कि व्‍यास जी के गणेश जी भी अपनी लिखाई में गड़बड़ा जायें- इतने पर से आपको संतोष नहीं है? आप चाहती हैं सारे लोग सारा काम छोड़कर बस आपकी चोख और आपकी बाली देखें (जो वैसे भी होपलेसली हसीन नहीं है) ? मैं इसका प्रोटेस्‍ट करता हूं, और गूदेवाले हर मर्द (व जनाना) से इसकी मांग करता हूं कि वे मेरे साथ एक सुर में गायें- ज़माने में और भी ग़म हैं चोख और बाली के सिवा!

लास्‍टं, बट नॉट इन द लीस्‍ट, में: क्‍या आपलोगों में सचमुच कोई हसीन नहीं है?

Friday, February 8, 2008

ठंड के भंवर व हिंदी की टूटी कमर..

पता नहीं आमची मुंबई में यह ठंड आ कहां से गई है? और आ जहां से भी गई हो, जा क्‍यों नहीं रही? यह कुछ वैसा ही हास्‍यास्‍पद नहीं हो गया है कि लड़की पाने के मोह में आप शादीरूपी भंवर में घुस जाते हैं, और जल्‍दी ही नशा के हिरन होते ही भंवर में फड़फड़ाने लगते हैं? मगर तबतक आपके साथ भांवर खेल रही लड़की के मन में आपके प्रति ऐसा प्रेम उमड़ने लगता है, और उस प्रेम की कुछ ऐसी तगड़न जकड़न बन जाती है, कि आप लाख भंवर की चूल-चूल हिला लें- भंवर से बाहर नहीं आ पाते? कुछ उसी तरह से हम मुंबई की इस भंवरी ठंड में- और ठंड जो है हममें- भंवर बनी हुई है! पत्‍नी और डॉन के डायलॉग के लेवल की ही नाटकीयता ठेलते हुए मन ही मन फुसफुसा सकते हैं: ठंड मुश्किल ही नहीं नामुमक़ि‍न हो रही है..

हालांकि इच्‍छा तो यह भी हो रही है कि ठंड महारानी ज़रा सामने आ जायें तो उनका झोंटा खींच के वो ख़बर लें कि ससुरी की सात पुश्‍त दुबारा मुंबई की ओर मुंह न फेरें.. मगर फिर यह भी सच्‍चायी है कि यह डायलॉग भी मैं फेंकने के लिए ही फेंक रहा हूं.. क्‍योंकि ठंड महारानी ज़रा क्‍या पूरा ही सामने खड़ी हैं, और मैं हाथ उनके झोंटे पर रखूं ऐसा कहां हो रहा है? हाथ क्‍या मैं तो समूचा देह बचाये, खिड़की का पल्‍ला गिराये, ठंडरानी से जान बचाता कभी यहां कभी वहां भागता फिर रहा हूं!.. और ठंडरानी जो हैं हर जगह वैसे ही पहुंच जा रही हैं, जैसे हिंदी फ़ि‍ल्‍मों में ऐन शादी के फेरों के वक़्त डेढ़ साल के बच्‍चे को गोद में हिलाती कोई जूनियर आर्टिस्‍ट शादी के मंडप में पहुंचकर हिनहिनाती आवाज़ में वही घिसा डायलॉग चीखती है- कि यह शादी नहीं हो सकती!.. कहने का मतलब ठंड आ गई है और जा नहीं रही. जा रही हैं वह इक्‍का-दुक्‍का किताब की दुकानें जो जाने क्‍यों तो इन द फर्स्‍ट प्‍लेस पता नहीं कहां से मुंबई में कभी आ गई थीं.

परसों अभय और मैं पवई में जितेंद्र भाटिया की दुकान वसुन्‍धरा में कुछ हाथ में लिए किताबों के कम डिसकाउंट की शिकायत कर रहे थे, कि इतने में भाटिया जी कहीं से आ रहा हूं कहीं जा रहा हूं के अंदाज़ में पता नहीं कहां से अव‍तरित हुए, सूचित किया कि जल्‍दी ही कम-ज़्यादा किसी भी तरह के डिसकाउंट का झंझट ही न होगा. इसलिए नहीं होगा क्‍योंकि वह दुकान बंद करने जा रहे हैं! अब चूंकि जितेंद्र भाटिया स्‍वयं भी लेखक हैं, पहल के संपादक मंडल में हैं, उनकी पत्‍नी सुधा अरोड़ा भी हिंदी की सक्रिय लेखिका हैं, हिंदी के प्रति उनके ऐसे दुष्‍कर्म की हमने अधिकारभाव से वजह जाननी चाही. लेकिन उनके चेहरे की मुर्दनी का भाव नहीं बदला, न उन्‍होंने हमारे अधिकारभाव को तूल देकर हमें बताने की कोई ज़रूरत समझी. भाटियाजी के चले जाने के बाद काउंटर की मराठी लड़की से ज्ञात हुआ किताबों की बिक्री नहीं होती, दुकान महज़ सजावट है. शाम के पांच बज रहे थे, अभय ने लड़की से सवाल किया- सुबह से कितने ग्राहक आये हैं? लड़की ने बिना किसी सेंटामेंटिलिटी के जवाब दिया- आप लोग दूसरे हो. फिर थोड़ा ठहरकर बोली- कभी-कभी तो पूरे दिन कोई नहीं आता!..

जबकि नेट पर हिंदी की चौतरफा तरक़्क़ी को लेकर हम कूद रहे हैं.. जैसे हमारे बिल्डिंग की सोसायटी है, जीवन के प्रति अतिशय उत्‍साह लेकर कूदती रहती है. मैं कूद क्‍या फुदक भी नहीं पाता; गिरा हुआ, गिरा रहकर, मन ही मन जोर-जोर से तीन तरह की आत्‍माओं के लिए तीन तरह की प्रार्थनाएं बुदबुदाने लगता हूं. और चूंकि हिंदी को लेकर आप अतिशय उत्‍साह दिखाते रहते हैं, घबराकर प्रार्थना अंग्रेजी में अलबलाने लगता हूं:

1. I am a bow in your hands, Lord. Draw me, lest I rot.

2. Do not overdraw me, Lord. I shall break.

3. Overdraw me, Lord, and who cares if I break!
मगर ठंड जा नहीं रही. सोचता हूं अब व्हिस्‍की में बर्फ़ की जगह ऊन की गोलियां डालकर पिऊं?..

व्‍हॉट ए पज़ल अ स्‍त्री इज़!..

एक हितैषी ने चैट बॉक्‍स पर खिड़की बजाकर सूचित किया कि वही राग रो-रोकर मैं बोर कर रहा हूं.. सुनकर तकलीफ़ हुई.. क्‍योंकि बदहवासी में बीच-बीच में मैं वार ज़रूर करता हूं, मगर बोर करना नहीं चाहता. मगर मैं जो करना चाहता हूं और जो हो जाता है- वह भी तारतम्‍य की सुगठित कहानी कब कहां बनती है? (संदर्भ के लिए कृपया टिप्‍पणीकार के पोस्‍ट पर मेरी टिप्‍पणी देखें) गर्म पानी की बाल्‍टी में मैं गर्म पानी की बाल्‍टी समझते हुए ही पैर रखना चाहता हूं, जबकि तत्‍काल पता चलता है मैंने दूध के खौलते कड़ाह में रख दिया है! अब जैसे आज अपने हितैषी की सूचना सुनकर समझ नहीं पा रहा था पैर कहां, किधर रखूं.. घबराकर बीच में यह भी ख़्याल आया अच्‍छा हो कोई अच्‍छा-सा मुंह देखकर उस मुंह में ही रख दूं?..

बोर, वार, या समोवार के भीतर जलेबी जैसे घुमावदार पोस्‍ट से आखिर किसी का क्‍या फ़ायदा है? जिसका होना चाहिए उसका नुकसान भी नहीं है! मगर इसलिए नहीं है कि किसी को व्‍यक्तिगत तौर पर दु:खी करने की मेरी नीयत भी नहीं? लेकिन हिंदी फ़ि‍ल्‍मों के अच्‍छे बेटे की तरह सबको सुखी कर दूं टाइप सामंजस्‍यवादी पोस्‍टें लिखने लगूं- इतना दु:खी किसी दूसरे को क्‍या, मैं स्‍वयं को भी नहीं करना चाहूंगा! मगर बात तो रह ही जाती है कि वही बोझिल राग गा-गाकर बोर कर रहा हूं?.. इस उलझाव से बाहर आने का उपाय क्‍या है? हारकर असित सेन या केश्‍टो मुखर्जी टाइप कोई कहानी ठेल दूं? या हेमंत कुमार का कोई रोता हुआ गाना चढ़ाकर हंसने लगूं?..

लेकिन जैसाकि ऐसी स्थिति में मेरी तरह घबराया हुआ कोई भी आदमी करेगा, अंत में वही करता हूं- किताब के पीछे सिर छिपाकर बुद्धिजीवी की तरह सोचने लगता हूं. सोचने के लिए शांतनु और गंगा की प्रेम व पोस्‍ट प्रेमकथा है..

कहानी की बिगनिंग काफी घिसी-पिटी है. कि नदी तट पर हार्टथ्रॉब गंगा को देखकर किंग शांतनु का मन रीझ गया. देह व मन मरोड़-मरोड़कर शादी की चिरौरी करने लगे. इससे आगे गंगा ने मुस्‍कराकर शादी की अपनी कुछ शर्तें रखीं, गंगा का वह जवाब बड़ा इंटरेस्टिंग व आधुनिक है.. देखिए, मिस गंगे का शांतनु मियां के आगे मारा डायलॉग- मुझसे कोई यह न पूछ सकेगा कि मैं कौन हूं और किस कुल की हूं. मैं कुछ भी करूं- अच्‍छा या बुरा, मुझे कोई न रोके. मेरी किसी भी बात पर कोई मुझपर नाराज़ न हो और न कोई मुझे डांटे-डपटे. यह मेरी शर्तें हैं. इनमें से एक भी तोड़े जाने पर मैं उसी क्षण आपको छोड़कर चली जाऊंगी. स्‍वीकार है आपको?

मुझे तो नहीं होता. मैं तो चीखकर यही कहता- अबे, तू छुपा क्‍या रही है, लूज़ कैरेक्‍टर? यू थिंक यू कैन फूल मी? एंड द वर्ल्‍ड?.. मगर चूंकि शांतनु मेरी तरह समझदार नहीं थे, और मेरी तरह ज़रा-सा रूप देखकर खुद को फिसलने से रोक लें जैसा रोक नहीं पाये, मिस गंगा की सारी शर्तें प्रेम-बेवड़े ने स्‍वीकार कर लीं.. और कहानी में आगे जाकर जवान मेसी, बड़ी नौटंकी में फंसा..

तो आगे के पोस्‍ट-प्रेम, पोस्‍ट-मैरिज सीनारियो पर अब ज़रा गौर फरमायें. दे-दनादन एक के बाद एक उर्वरा गंगे ने सात बच्‍चे पैदा किये.. और उनकी डेलिवरी के तत्‍काल बाद ही बच्‍चों को नदी की बहती धारा में निर्मोही फेंक आती.. और ऐसे होरेंडस कृत्‍योपरांत हंसती-इठलाती नामुराद सहमे शांतनु के अंकवार में लौट आती! अब जो शांतनु का सहमा होना है उसमें कुछ भी अजीब नहीं.. क्‍योंकि आखिर बाप था, और देख रहा था कैसी बदकार औरत के जाल में फंस गया था जो अपने ही पेट के जने को हंसती-मुस्‍कराती नदी में गिरा आ रही थी. और शांतनु जो है स्‍टुपिड महसूस कर रहा था क्‍योंकि बंदे ने सवाल न करने की शपथ खा रखी थी.. मगर अब उस खाये हुए को निगलने में, ऐसी बीवी को पचाने में तकलीफ़ हो रही थी. ऐसे कथा-विवरण को पढ़ते हुए, मिस गंगा के स्‍ट्रेंज बिहेवियर से मुझे भी हो रही थी (ठंड से नहीं, ऐसे बिहेवियर की सोचकर मैं मद्धम-मद्धम थरथराता रहा..

और चूंकि बुद्धिजीवी हूं (बुद्धि पर ही तो जी रहा हूं, आपके प्रेम पर मैं कहां- वह तो रघुराज जी रहे हैं), मैं बुद्धि घुमा-घुमाकर इस उलझे कथासार और राइटर मिस्‍टर व्‍यास के क्रियेटिव व्‍यवहार (या मिसकंडक्‍ट कहना ज़्यादा उचित होगा?) की पेंच सुलझाता रहा.. हंसती-खेलती, अपनी सलोनी, सुंदरी नायिका से ऐसा हिंसक व प्रोवोकिंग आचरण करवाकर कथाकार स्त्रियोचित हमारे सबकॉंशस के भय, आशंकाओं को इग्‍नाईट करने के आखिर कैसे खेल खेल रहा है? क्‍या वह इसका इशारा कर रहा है कि सुंदरता की आड़ में स्‍त्री एक पज़लिंग, अनरेलायबल मिस्‍ट्री है? या वह हमें सुख के सहजलोक से बाहर खींचकर उलझाव के एक बड़े जटिल कैनवास के लिए तैयार कर रहा है?..

ओह, मैं फिर कहां-कहां बहक गया.. एनिवे, उलझी गंगा को सहमे शांतनु ने बर्दाश्‍त किया तो मेरे रोतड़े राग को हितैषी हमराही बर्दाश्‍त न करें यह बात मुझे किंचित व्‍यथित कर जाती है. और अपने जो पैर हैं वह मैं छुपाकर रखता हूं- कि उसे किसी के मुंह या आंख में न रख दूं!

Thursday, February 7, 2008

दुष्‍टता, धृष्‍टता व निकृष्‍टता पर कुछ प्रात:कालीन मौलिक चिंतन..

क्लिष्‍टता, धृष्‍टता, दुष्‍टता में जो फर्क करना नहीं जानते, और खासतौर पर इन सभी के लिए मुझे जिम्‍मेदार बताते चलते हैं, वे विशिष्‍ट नहीं निकृष्‍ट लोग हैं. जबकि उच्छिष्‍ट की तरफदारी में चंदू का फिर-फिर पोस्‍ट ठेलना धृष्‍टता की कैटेगरी में देखा जाना चाहिए (इन्‍हीं भोली धृष्‍टताओं का दुष्‍परिणाम है कि पत्रकारिता के मैदान में चंदू की विशेष तरक्‍की नहीं हो पायी है. न होने के आसार हैं. मगर इससे घंटा मुझे, या आपको, क्‍या फर्क पड़ता है?). लेकिन अकेले चंदू का कसूर नहीं, धृष्‍टताएं मैं भी करता हूं- और उसी का धृष्‍ट या क्लिष्‍ट जैसा भी दुष्‍परिणाम है कि पत्रकारिता ही क्‍यों किसी भी मैदान में विशेष तो क्‍या सामान्‍य तरक्‍की तक नहीं पा सका हूं! न पाने के आसार हैं! और आपको भले न पड़ता हो, मुझे तो फर्क पड़ता है.. मगर मैं जो हूं धृष्‍टताओं से बाज नहीं आ पाता (कोई एक भली, आंचल की धनी लड़की नहीं जो धृष्‍टताओं से मुझे बाज दिलवा दे? यह बेमतलब की जानलेवा बेवड़ेबाजी छुड़वा दे?.. लेकिन नहीं, ब्‍लॉगजगत की जैसी निर्मम सच्‍चायी है कि कोई भला लड़का नहीं, उसी तरह से यह भी अधर्मी सच्‍चायी ही है कि एक भली लड़की तक नहीं)..

लेकिन नालों के नीचे मैं कितना भी नहाता रहूं, होती वह धृष्‍टताएं ही हैं. जबकि कुछ लोग हैं चुप्‍पे-चुप्‍पे दुष्‍टताएं कर ले जाते हैं! जैसे मैंने दोपहर के खाने के बाद अभी तीन अंगड़ाई ठीक से ली भी नहीं थी कि बाज़ार मियां ने दुष्‍टतायी कर दी! चुप्‍पे से आकर आततायी ‘सत्‍यमेव जयते’ लिखकर छोड़ गए! अब यह जो सत्‍यमेव जयते है- सरकारी प्रचार व पोस्‍टर से बाहर कहीं भी देखूं तो मेरे कान खड़े हो जाते हैं! तो वही खड़े कानों के साथ मैंने अनुभवी ज़रा-सी जासूसी की और देखिए, कैसे मासूम व भोले गड्ढे में आकर गिरा हूं! अब आप ही बताइए, बैठे-बैठे की यह दुष्‍टता है या नहीं? धृष्‍टता तो नहीं ही है.

इस छोटी-सी अंतर्जालिक पड़ोस की निष्‍पाप, निष्‍प्रयोजन यात्रा से यह तथ्‍य भी उजागर हुआ कि प्रत्‍यक्षा बेबी कितना निकृष्‍ट हैं. जिन बेबाओं के मासूम मौज पर यह चीखते हुए बम-गोला हो रही थीं कि बाबाओं की यह दूसरी बार की धृष्‍टता है, और बाबा हकलाते हुए नहीं, सबको सुलाते हुए कह रहा था कि बेबी, कितना तो तुम तिल का ताड़ बनाती हो, इत्‍ती सी बात पे इत्‍ता रार उठाती हो? जबकि देखो, हम अफ़सोस तक ज़ाहिर कर रहे हैं.. जबकि पड़ोस की अंतर्जालिक यात्रा (और बाज़ार मियां की दुष्‍टतायी से) हमें पुनि-पुनि ज्ञात हुआ कि यही बाबा लोग थे, नाला के किनारे खड़े होकर पहले भी इसी निष्‍काम भाव से ऐसा ही एक अन्‍य बेबी-मर्दन किया था. और तब यह ‘मर्दानापन’ झेल रही बेबी नीलिमा ने मुंह से झाग फेंका था.. और भोले बाबा वहां भी यही भोला अफ़सोस दोहरा रहे थे कि कि अरे, नीलमणि जी, आप तो इत्‍ती सी बात का इत्‍ता बुरा मान गईं? जबकि कायदे से बेबी नीलिमा को बुरा नहीं मानना चाहिए था, हेंहें करके ब्‍लॉग मौज परम्‍परा को सुदृढ़ करना चाहिए था. मगर असली सवाल वह नहीं है. असली सवाल है तब बेबी प्रत्‍यक्षा कहां थीं और कहां था उनका पॉलिटिक्‍स, पार्टनर? लेकिन जैसाकि लड़कियों के साथ स्‍वभावत: होता है कि वे निराश करती हैं.. तब बेबी नीलिमा ने निराश किया था. अब प्रत्‍यक्षा बी कर रही हैं..

नीलिमा तब जो है धृष्‍टता कर रही थी. जबकि प्रत्‍यक्षा ने जो किया वह दुष्‍टता की तरह देखा जाना चाहिए (देखा क्‍या जाना चाहिए, मुझे दिख रहा है!). कि एक सुकृत्‍य पहले हो चुका था, और सबकी नज़र में हुआ था, मगर प्रत्‍यक्षा बेबी उसका स्‍मरण नहीं कर सकीं? इसी से जुड़ा प्रश्‍न उठता है कि हम स्‍वयं से इतना मोहाच्‍छादित क्‍यों हैं? और साथ ही साथ जवाब भी मिल जाता है कि हम स्‍वयं से बहुत मोहाच्‍छादित हैं, और इतनी भर ही हमारी पॉलिटिक्‍स है!..

दूसरी ज्ञान की बात यह है कि मौजी अफ़सर, बाबाजन बीच-बीच में अगर इधर-उधर अ-स्त्रियोचित इनको व उनको फूल-माला पहनायें, और जवाब में किसी के मुंह से झाग छूटने लगे और बाबा लोग तत्‍काल सन्‍न होकर अफ़सोस ज़ाहिर कर दें- तो मुझे लगता है उनकी अ-स्त्रियोचित भावनाओं की कद्र करते हुए उन्‍हें माफ़ कर देना चाहिए.. और खुद सिर नवाकर चुपचाप कॉफ़ी पीते रहना चाहिए!.. क्‍योंकि अंतत: बेबी किम्‍बा बेवा आप हो.. वह तो अच्‍छी मंशाओं वाले भले अफ़सर मात्र हैं.. दुष्‍ट, धृष्‍ट, निकृष्‍ट तो नहीं ही हैं. वह पता नहीं कौन है..

(ऊपर की फ़ोटो: दिल्‍ली में नोटपैड की सुजाता के साथ नीलिमा; अमित गुप्‍ता के ब्‍लॉग से साभार)

Wednesday, February 6, 2008

दोपहर के खाने के बाद कुछ गंभीर सवालों से जुत्‍तम-पैजार..

1. ब्‍लॉग शुरू करते वक़्त हमारे दिमाग में कुछ आइडियाज़ अरेंज करने, स्‍व के जिये-अदेखे का साक्षात करने की कुछ उत्‍कट जिजीविषा होती है. चंद महीनों ब्‍लॉग की भाग-दौड़ व रचनात्मकता की कसरतों के बाद ब्‍लॉग शुरू करने का उद्देश्‍य खुद हमें ठीक-ठीक कितना याद रहता है? इसी से जुड़ी दूसरी बात है..

2. ब्‍लॉग के पोस्‍ट के पीछे कोई विचार, कोई चिंता होती है, या टिप्‍पणियों का मोह ही पोस्‍ट के ठेले जाने का मुख्‍य उत्‍प्रेरक तत्‍व होती है? विचार, चिंता पहले है.. या अधिकाधिक टिप्‍पणियों का नयन-सुख?

3. हिंदी ब्‍लॉग की एक सामाजिकता तो है, मगर वह सामाजिक ही है, या आपस की जान-पहचान से ऊपर उसकी कोई तटस्‍थ नागरिकता भी है? विवेकपूर्ण नागरिकता जो उचित-अनुचित पर सही मात्रा में व सही समय पर रियेक्‍ट करती हो? या उसकी नागरिकता परस्‍पर के जेनुइन लिहाज़ की धारणाओं से नियंत्रित- अग्रवाल व चतुर्वेदी समाज की सीमित, सतही अपेक्षाओं व सहूलियतों के पैटर्न पर चलते हैं? चोट तभी चोट समझी व बतायी जाती है जब वह अपने समूह के अग्रवाल व चतुर्वेदी पर हुई हो? वर्ना आंखें मूंदकर ब्‍लॉग-व्‍योपार पूर्ववत सहज-सहज जारी रहता है?

4. अपनी सहज नागरिकता में हम प्रोटेक्‍टेड व सहेजे नहीं जायेंगे? बेटियों का ब्‍लॉग, बेटों व बहिनों का ब्‍लॉग का यूनियनिस्टिक स्‍वर ही हमें कवच व सुरक्षाभाव मुहय्या करवायेगा?..

5. निजी राग-द्वेष, फ़तवे व फ़ैसलेबाजी से अलग सामु‍दायिक हितचिंता में सवालों को एड्रेस करने की भाषा हम सीख व बरत पायेंगे? या ऐसी अपेक्षाओं के ख़्याल से हिंदी ब्‍लॉगजगत का दम फूलने लगेगा?

ओह, खाने के बाद लेटने व लेटे रहने की जगह मैं भी क्‍या बिठा-बिठाके पिलाने लगा! ऐसा न हो कि ऐसी पंक्तियां पढ़कर पैदल चलनेवाले लोग फुटपाथ के एक ओर गिर पड़ें, और गिरे ही रहें. और उसी मात्रा में मुझतक आनेवाली टिप्‍पणियां.. ऐसी किसी दुर्घटना से बचने के लिए एक मार्मिक, अभी-अभी पैदा की एक ताज़ा कविता भी पूंछ की तरह नीचे चिपका रहा हूं. कृपया- मुझे नहीं तो- कविता को अपना प्‍यार देना न भूलियेगा..

मुझको अपने गले लगा लो, ऐ मेरे हमराही
हमको खुद से है प्‍यार कितना ये कैसे बतलाएं
तुम चले जाओगे तो मगर याद बहुत आओगे?
कहीं दीप जले कहीं दिल
कहीं मोड़-मोड़ पर सांप के बिल
तुम नेवला बनकर आओगे नहीं, प्रिये
मुझको बचाओगे नहीं, प्रिये?

एक पतित पति के नोट्स..

ऊहूहूहू.. मुंबई में ऐसी ठंड पहले कभी महसूस नहीं की. पत्‍नी ने दूसरी बार भी लड़की ही पैदा किया था तब भी नहीं! किसी चीज़ में- खासतौर पर काम में- मन एकदम नहीं लग रहा (पत्‍नी में तो नहीं ही लगता). चूंकि पुरानी आदत है सुबह घर से भागकर (read पत्‍नी से भागकर) ऑफिस चला आता हूं, मगर ऑफिस पहुंचकर एक अजीब-सा खालीपन घेर लेती है. लगता है किसी गलत पड़ाव पर लगाम खींचकर रोक लिया गया होऊं. लगाम किसी और ने नहीं, खुद मैंने ही खींचा होता है, मगर इस खिंचने की अजीब अनुभूति तो हो ही जाती है (संदर्भ अज्ञेय और पता नहीं किस-किस की कवितायें).. पता नहीं ऑफिस में बाकी के लोग कैसे इतने उदासीन और वर्कोहॉलिक हैं! कि ऐसे अलसाये मौसम में भी चाव से ई-मेल और फ्री-सेल खेल पा रहे हैं. जबकि मौसम की ही तरह अलसाया हुआ मैं धूप के किसी टुकड़े में खड़ा दिन भर बस अपने पैर की नोक देखते भर रहना चाह पा रहा हूं. या हाथ के नाखून. या पता नहीं क्‍या देखते हुए सुधा पद्मानाभन के कंधों पर के तिल के बारे में सोचते रहना चाह रहा हूं. जिसके बारे में सोचते ही पता नहीं तो क्‍यों मेरे कान और नथुनों में कहां-कहां की ठंड चढ़ने लगती है (या गरमी? मगर ऐसी ठंड में गरमी कैसे चढ़ सकती है? ठंड ही चढ़ती होगी. इतनी है और दिमाग पर ऐसा सन्निपात चढ़ा हुआ है कि देखिए, ठंड और गरमी का प्राथमिक फर्क भूल रहा हूं)..

मेज के किनारों से होती हुई आंखें सेल फ़ोन के शरीर पर जाकर टिक गई हैं (ऐसी ठंड में मैं क्‍या आंखों को स्थिर नहीं रख सकता? कि खुली रहकर भी कुछ न देखें, और देखें भी तो आंख की किरकिरी तो कतई न हों?), और किसी भी क्षण हो सकनेवाले अनिष्‍ट की आशंका में टिकी हुई हैं. सेल किसी भी क्षण बज सकता है नहीं, बज रहा है. मेरी पत्‍नी बजा रही है (ऐसी ठंड में और कौन परेशान करेगा. या होगा). सीने पर बांह बांधे मुर्दे की तरह स्थिर पड़ा मैंने नंबर को उदासीन नज़रों से देखा है लेकिन फ़ोन उठाने की इच्‍छा नहीं हो रही (मुर्दे की तरह स्थिर न पड़ा होता तब भी इच्‍छा वहीं रहती). आखिर बात क्‍या करूंगा? पत्‍नी नेरुदा-फेलूदा के बारे में तो बात करेगी नहीं. फालूदा के बारे में भी नहीं करेगी. ज़्यादा से ज़्यादा पूछेगी कटहल की तरकारी कैसी बनी थी और मैं गुस्‍से की घूंट पीता धीमे से बुदबुदाकर कहूंगा- हूं. ऐसा तो नहीं ही होगा कि गुस्‍से की घूंट पीने की जगह मैं बेवकूफ की कान खींचकर चंदू के समझदार पोस्‍ट पर लिये जाऊं कि देख, बदकार, चंदू ने इशारा किया था, फिर भी तूने टिफिन में कटहल ठेल दी? कि मैं ठेल-ठेलके कटहल खाऊं और.. ? समझदार को इशारा काफी. लेकिन पत्‍नी समझदार हो तब तो इशारा समझे? नौ बार की घंटी पर भी मेरे फ़ोन न उठाने पर ऐसा कैसे हो कि ‘हारानो सुर’ हार मानकर हौसला त्‍याग दे! चार लोग मेरी दिशा में देखने लगे तो मैंने ही हार मानकर फ़ोन उठा लिया. चीखना चाहता था मगर ऑफिस और चार लोगों की देखती नज़रों के लिहाज में झींकने तक स्‍वयं को सीमित किया. कहा- कहीं बम फूट गया है जो इतनी जोर से साइरन बजा रही हो?

समझदार होती तो इशारा समझकर चुप हो जाती (मगर समझदार होती तो पत्‍नी ही क्‍यों होती, सुधा पद्मनाभन न होती?), घबरायी आवाज़ में गंवार ने कहा- समझो बम ही फूटा है.. केबल काम नहीं कर रहा!

नोआखाली के दंगों की खबरें सुनकर गांधीजी के चेहरे पर जो भाव आये होंगे, कुछ वैसे ही भाव मैंने अपने चेहरे पर लाने की कोशिश की. और लाने में नाकाम होकर कहा- इसमें इतना परेशान होने की क्‍या बात है. एक दिन टीवी नहीं देखोगी, दोपहर में झपकी ले लोगी..

अभी सो गई तो रात में आंख नहीं लगेगी!- पत्‍नी ने घबरायी आवाज़ में कहा- बहुत टेंशन हो रहा है, जी.. क्‍या करूं, कुछ बोलो ना?..

बोलने को मैं उसे अपने कागज़-पत्‍तर की अलमारी साफ़ करने और कुर्तों में बटन टांकने का काम बोल सकता था.. मगर अपने अंतर्लोक में पत्‍नी को इतना अंतरंग बनाने का विचार अचानक पता नहीं क्‍यों बड़ा भयावना लगा. सोच-विचार वाले स्‍वर में मैंने सोच-विचार करके समझदारी से जवाब दिया- ऐसी ही खाली टीवी के सामने बैठी टीवी निहारती रहो, मैं आधे घंटे में फोन करता हूं! कहकर मैंने फ़ोन काट दिया और उदासीन खोया-खोया चुपचाप पैर हिलाने लगा. पता नहीं ऑफिस में बाकी लोग क्‍या खाकर तो खेल और ठेल रहे हैं जबकि मैं फ्री-सेल खेलना नहीं चाहता. न ई-मेल खोलना. सिर्फ़ धूप सेंकना चाहता हूं.. लेकिन धूप तक पहुंचने के रास्‍ते में बॉस का साला खड़ा है.. और अकेला नहीं, सुधा पद्मनाभन के साथ खड़ा है. और सुधा मेरे पैर, हाथ या मुख नहीं, उसी नीच का मुंह देख रही है! (मुझमें देखने की गलती कैसे कर सकती है, बदचलन!).. ऊहूहूहू, सचमुच, मुंबई में ऐसी ठंड पहले कभी महसूस नहीं की!!!!