Friday, February 1, 2008

चंद निर्मोही रससिक्‍त श्रृंगारिक दोहे..

पता नहीं कौन-सा तो पुरस्‍कार था जिस पर कौन-से लोगों ने मत देकर जाने कौन-से तो को विजयी बना दिया. जौन-से जो विजयी हुए पता चला कोमलता की वाणी हैं काव्‍य प्रांतर के प्राणी हैं.. एनीवे जब से जाना है तौन-से तो कविता के लिए अकुला रहा हूं (कि ऐसा न हो मैं जो है पीछे रह जाऊं और कविता जो है आगे चली जाये). तो उसी अकुलन अगन में मौन से ठेलकर, महीन कल्‍पनाओं में बेल कर कविताकण मुखरित कर रहा हूं. सुलग-सुलगकर जाड़े की इस बेदर्दी रात में नेह-अगिन की अलाव होने की कोशिश कर रहा हूं.. भाव वही समर्पण व श्रृंगार वाले हैं (ब्‍लॉगजगत में अभी इन्‍हीं भावों का बोल और बाला है. बोली भी इन्‍हीं भावों की है. बकिया भावों से हावं-हावं की ध्‍वनि फूटती है और काफी कौन-से तो हैं उनका रोश और काफी गूढ़ विद्वता फटने लगती है).. तो पेश है चंद श्रृंगारिक मर्मस्‍पर्शी (और भी कौन-कौन-से तो स्‍पर्शी) दोहे.. और अभिन्‍नाये एंटी-मीरा वाले समर्पित कोमलांगी स्‍वरों में मैं..



मेरा सब अर्पण तुमको
तुमही से तर्पण सबको.

न जाना पिये नयनों से
कभी तीन कदम भी दूर
कि मैं हो जाऊंगी चूर-चूर

तुमही में सब ध्‍यान किया है
सत्‍य समय अनुसंधान किया है

ज्ञान प्राण सब तुम ही मेरे
हुल्‍ल-हुल्‍ल करें चाहे जितना बहुतेरे

ओ मलिन कुलीन बंशीधर धारे
तोहे देखूं कैसा मन निर्मोही किलकारे

कुकुर गति जग जिनको ना पूछे
स्‍वामी हावं-हावं तोहरे पर काहे ला ऊ भूंकें?

तू जिन घबराना स्‍वामी
बने रहिय मर्दाना स्‍वामी

अंग-अंग फूट जइंहै सबके
नयन धार जो मिलवैंये तोहसे

अकथ कष्‍ट पथ में क्‍यों इतना स्‍वामी
एमए बीए में भ्रष्‍टेभष्‍ट क्‍यों इतना स्‍वामी

फूल पताका बन तुझको छुपा लूंगी सजना
बन आग सबको जला दूंगी बलमा

कि रतिया कवन वाली तरकारी बनाऊं सजन
कि वहिये दिनवाली बसिया गरमा के खिलाऊं सजन

कितबिया सब अगिया में दे दूंगी जार
पलक झपकै में दूंगी सकल जग सुधार.

1 comment:

  1. इस हाथ 'अर्पण' और लगे हाथ दूसरे से 'तर्पण' -- का करते हैं महाराज . यह 'नेटकविता-पतन-चालीसा' था या 'पुरस्कार-पतन-चालीसा'.

    सुधरते काहे नहीं . सब कुछ ताजा चाहते हैं . ऐसा कब तक चलेगा . कुछ लेते क्यों नहीं (गोली-सोली). यह बसियाए हुए को ओवेन में गरमा कर खिलाने का बुसा हुआ समय है -- लोकतांत्रिक समय .

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