Friday, February 1, 2008

ब्‍लॉग में टहलने-ठिलने के कुछ सुगम मूल व मलमंत्र..

क्‍या हो विषय सारणी: गाल की फुंसी या कुहनी की फोड़ी. हरिद्वार महाबलेश्‍वर की मनलुभावन दौड़ा-दौड़ी. देखिए न उनको कितना प्‍यारा पुरस्‍कार मिला. या ओह, कितना तो अद्भुत है जीवन घर बैठे-बैठे हमें संसार मिला! कैसा तो धूल चटवाया ससुर (या ससुरी) को, आपने उनकी हार देखी? या हमारी कार? देखिए ये तीन फोटो हैं चार कल चढ़ायेंगे. हो सकता है साल के मध्‍य में चीन जायें वहां से पिंक व मिंक अंडरवीयर लायेंगे तो वह भी आपको दिखायेंगे. साथ-साथ देखना कितना अच्‍छा लगता है न. हेंहें-ठींठीं की अंतरंगता में थोड़ा हम ठिलें थोड़ा आपको ठेलें. ओह, कैसा आह्लादकारी आनन्‍द का चरम क्षण यूं ही गोड़ हिलाते-हिलाते जी लें.

एक काठ का कुत्‍ता है और पुराना बांस का एक बक्‍सा. अगड़म-बगड़म जाने किस ज़माने से रखा है वर्षों से कभी खोला नहीं. अकुलाइए नहीं, खोल-खोलकर ठेलेंगे आप आह और वाह कीजिएगा सचमुच बड़ा मज़ा आयेगा. मज़ा न भी आये तो मज़ा आने की थोड़ी एक्टिंग कर लीजिएगा, हिय हिल-मिल जायेंगे, मैं यहां आप वहां लड़ि‍यायेंगे. बात दूर तलक नहीं तो बक्से तक तो जायेगी ही. जीवन की खुलवाकर कौन यहां किसको बोर करना व होना चाहता है, गुरु, मुंह पर आधे मिनट की मुस्‍की आयेगी!

फिर बीच-बीच में हतप्रभ होकर लात चलाना भी ज़रूरी है. गिरी हुई किसी ऐसी औरत के बारे में कि पता नहीं उसका पति उसके साथ कैसे तो खड़ा रहता होगा. या ताज़्ज़ुब करने के लिए कि आखिरी मर्तबा कब वह मुस्‍कराई थी. बेटी का ब्‍लॉग तो हमने शुरू किया वह कभी क्‍या बेटी को गोद में उठाई थी? इसी तरह की चिरकुट हतप्रभताएं. आयं बायं दायं..

फिर ज़रा ब्‍लॉगटेनमेंट की भी सोचना ज़रूरी: किसी चिरई ने पाद दिया कबूतर किताब देखकर उलट पड़ी. ऐसे टेनमेंट से बहार आ जाती है, सितार और हेमंत कुमार बजने लगते हैं. इससे लगा-लगा कोई जालौन कोई जलपाईगुड़ी के किस्‍से याद करने लगता है. न याद आनेवाला भी मजबूरी में मुस्‍कराकर कहता है बहुत अच्‍छे! इसी पर दोस्तियां बन जाती हैं, सखा लोग ठेलने लगते हैं यारों का यार है, ब्‍लॉगस्‍टार है. फिर थोड़ी-बहुत टेकनोलॉजी कुछ विजिट थोड़े डिजिट सीख ली फिर समझ पौ बारह. लोग गले में बांह डाले साथ फोटो खिंचवाने अपने शहर बुलाने लगते हैं.

यही सब चिल्‍ले-गिल्‍ले तरीके हैं फील्‍ड में उतर लो, आओ हिल जाओ मिल लो. एकाध हफ़्ते धीमे-धीमे फुटबाल चलाओगे फिर जल्‍दी ही आज की पसंद में ऊपर जाओगे.

8 comments:

  1. बहुत कुछ बूझ रहा है ! जारी रहे मलमंत्र ।

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  2. क्या लिक्खे हैंं ब्लॉगटेन्मेंट ये बात आप सही कह रहे हैं जिसको जो बुझा रहा है लिक्खे जा रहा है...कुछ हैं कि अतीत में झांके पडे़ हैं,तो कुछ मन मौजी गीत से मन बहलाने में लगे है,कुछ नही मिला तो अपनी अफ़सरी पर कसीदे पढ़ने पर लगे हैं,किसी ने कुछ भी अंट शंट सुन लिख दिया तो झपट कर जवाब देने में पड़े हैं,पर ये ज़रूर है कि सब अपने दायरे में रहते हुए,एक दूसरे सहला भी रहे हैं.....अब ये हैं कि कौन ज्यादा दूर तक देख सकता है ये तो देखने की बात है..अभी तो एक मन्त्र ही मूल में मुझे लगता है...
    हम ही हम फ़िकर ना ग़म ।

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  3. सच्ची-मुच्ची की 'हेंहें-ठींठीं' ऐलॉइड विद क्रोध एण्ड विद सम करुणा .

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  4. अद्भुत विश्लेषण है ब्लॉगजगत का, और बेहद सटीक :)

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  5. "किसी चिरई ने पाद दिया कबूतर किताब देखकर उलट पड़ी."

    यही तो ब्लॉग है! यही हिन्दी ब्लॉग है !!

    अब थोड़कुन समझने बूझने लगे हैं आप और आपके द्वारा हम सभी भी बझने लगे हैं :)

    बढ़िया व्यंग्य...

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  6. होम्योपैथी का इलाज चल रहा है। पहले फोड़े-फुनसियां फूटकर निकलेगा रोग। फिर निखरेगी सुंदर त्वचा। चिंता की बात नहीं है। चिरकुटई का भी अंत होगा। ये भरोसा है।

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  7. ऒह गुरुमंत्र सा है ये तो ..... चलिये अब आपके बताये रास्ते पर चलकर देखेंगें।

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  8. गुरु , एकजाई ।

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