Saturday, February 2, 2008

आइए, मौज लें.. हेंहेंहें..

मौज लेने में हम सिद्धहस्‍त हैं. कह सकते हैं हमारा राष्‍ट्रीय चरित्र है. बैठे-बैठे मौज लेते रहते हैं बड़ा मज़ा आता है. देश के किसी हिस्‍से बाढ़ में गांव बह रहा हो, हम मौज में फुदकनी सवाल करते हैं- और गुरु, कितने घर बहे? देखो, प्रकृति भी साली क्‍या मौज ले रही है! किसी की साड़ी उतर रही हो- जब उतर रही होती है तब तो हम अपनी साइकिल शेड में छुपाये लुकाये होते हैं (भई, हमारे घर की औरत की नहीं उतर रही. जिसकी उतर रही हो वह और उसका घरवाला फिकर करे)- बाद में हम मौज लेने के लिए मैदान में आ जाते हैं!

बिहार में रेल की सफर का एक पुराना किस्‍सा है. दिल्‍ली में इम्‍तहान देकर कोई लड़की अकेली पटना लौट रही थी. नई-नवेली दुलहिन के साथ एक दूल्‍हा बाबू सीट की सांसत में थे. भीड़भरे कम्‍पार्टमेंट में इधर-उधर भटकते रहने के बाद लड़की को बर्थ पर अकेला देख अपनी मुसीबत सुना मदद की गुहार करने लगे. लड़की ने सिमटकर नये-नवेलों को अपनी बर्थ पर बैठने को जगह दे दिया. इतने में आठ-दस लौंडों की कोई चुलबुली मौज लेनेवाली पलटन कम्‍पार्टमेंट में घुसी. और जैसाकि होना था, अकेली लड़की को अकेला ताड़कर चुलबुली पलटन गंद फैलाने लगी, माने मौज लेने लगी. और जैसाकि यह भी स्‍वाभाविक था (पहले कहा ही था कि मौज लेना हमारा राष्ट्रीय चरित्र है) डिब्‍बे के बाकी लोग भी चुलबुल पलटन की चुहल में आनन्दित होने लगे. और तो और, नये-नवेले भी, इस चक्‍कर में कि कहीं उन्‍हें भी लड़की का साथी न समझ लिया जाये, बर्थ छोड़कर ज़रा दूर खड़े हो लिए और इस तरह से मौज-महोत्‍सव में अपनी हिस्‍सेदारी करने लगे. एक अकेली लड़की ही चिरकुट थी जो इस तरह इसके और उसके द्वारा अपने कपड़े खींचें जाने के मौज पर मुग्‍ध हो पाने में आनाकानी कर रही थी, बदकार बेवजह इस मौजी रस-रौ में रंग-भंग कर रही थी!..

कभी हमें क्रोध आता है?- सात्विक, प्राकृत, पतित- किसी भी तरह का? कि साल भर हर जगह हमें मौका-बेमौका हर वक़्त होली ही दिखती है? बहुत क्रियेटिव मौज है, इसे गोद में बिठाके रखें? सिर पे चढ़ाके? जीवन धन्‍य होगा?

परसों रवि रतलामी ने हिंदी ब्‍लॉगिंग पर एक पोस्‍ट चढ़ाई थी. जिनसे न सपरता हो वह करते रहें हेंहें-ठेंठें पर चिरकुटइयों का महिमा-मंडन तो न करें..

11 comments:

  1. चाँप दिया , धर के !

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  2. मौज लेने लिलाने का सत्यानाश कर दिया. विनोद प्रियता और हेंहेंठेंठें में फर्क होता है श्रीमान. आपने तो हास्य को और छेड़खानी को एक ही तराजू पर रख दिया.

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  3. @प्‍यारे संजय,
    अभय के पोस्‍ट पर, और दूसरी जगहों, रचना और प्रत्‍यक्षा पर टुच्‍ची कहके गंदगी उछाली जा रही थी तो वह आपकी इस ब्‍लॉग बिरादरी का चिरकुट हास्‍य था या घटिया छेड़खानी? आपको तकलीफ न हुई, आपकी यही इतनी ही समझ है, जिनको हुई आप उनको अपने ठें-ठें में शामिल करवाना चाहते हैं? सॉरी, मुझे हंसी नहीं आ रही..

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  4. सच में 'अरन्येर दिनरात्रि' ही हो गया है. निकलना ज़रूरी है......:-)

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  5. @शिव बाबू,
    ज़्यादा रात्रि ही है, वही दिखाने की कोशिश में फ़ि‍ल्‍म के पोस्‍टर की फोटू चिपकाई, चलिए, आपतक बात पहुंची, शुक्रिया..

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  6. मौज मे मुद्दा कहाँ दिखता है आप कितनी भी कोशिश करे

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  7. आप मौज ही मौज मे { मन } की कह देते हैं----आभार ।

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  8. अपने यहां ज्यादातर हंसी-मजाक परपीड़क ही है। किसी की जाति, किसी के रंग, किसी के प्रांत, किसी की बीमारी का मजाक उड़ाने के अलावा हंसने का कोई और जरिया भी हो सकता है, शायद हम यह भूल ही गए हैं। लोगों के दायरे इतने अलग हुआ करते हैं कि जिन चीजों को ब्लैक ह्यूमर के दायरे में भी बमुश्किल रखा जा सकता है उन्हें हम निर्मल हृदय हास्य माने रहते हैं। भाई लोगों को अंत-अंत तक यही लगता रहा कि पत्नी के खाना बनाने में ऐसी क्या बात है जिसे सुनकर किसी को इस कदर मिर्ची लग पड़ी है...

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  9. अच्छा! तो आप इस लिहाज से कह रहे हैं।

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  10. हँसी ठेंठे वाले आपके नतीजे से तो सहमत हूँ प्रमोद भाई, बाकी इस पूरे ही प्रसंग से अनजान हूं , जानना भी नहीं चाहता। ब्लाग हो या कोई और मंच पढ़े लिखे , संभ्रांत लोग ऐसे अवसर नहीं छोड़ते है जिनका उल्लेख आपने किया है। कई लोग आपराधिक मौन धारण कर लेते हैं , वह भी ग़लत है।
    दो-दो पुरस्कार-सम्मान प्रसंग देख चुका हूं। वहां भी यही सब देख , बुरा लगा। तरकश की साइट पर एकतरफ पुरस्कारों की घोषणा दूसरी तरफ अपमान की हदें पार करती ठिलुआई नैतिक असंगततता लग रही थी। मैने इस पर ऐतराज भी किया। घटिया चीज़ का विरोध होना चाहिए था या उसे रोकना था। कही का नज़ला कहीं गिराना।
    बहरहाल जो समाज में है , वही यहां भी दिखेगा। अलबत्ता लोग ज़रूर कुछ सुलझे हुए हैं मगर....दिन को होली रात दिवाली की तुलना में
    उत्सवप्रियः हि मनुश्याणाम् वाली बात कहीं ज्यादा सात्विकता से अपनी बात कहती है।

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  11. त्रेता में परशुराम ने इक्कीस बार पृथ्वी अहंकारी और युयुत्सु क्षत्रियों से हीन कर दी थी . इस बार कलियुग में यह दायित्व परशुप्रमोद ने लिया है.कम से कम एक बार इन मर्दवादी-मौजवादी(यूपी-प्रयोग की सफलता के मद्देनज़र मनुवादी चिप्पा अभी कारगर नहीं है) द्विजों को ब्लॉग की पृथ्वी से बुहार देना है . खाए-अघाए-डकार लेते,तोंद पर हाथ फिराते-जनेऊ से कमर खुजाते ये चुटियाधारी हर गंभीर बात में मौज ढूंढते हैं . यही सीखा है शास्त्रों से ? हर समय हेंहेंहें..ठेंठेंठें..

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