Sunday, February 3, 2008

पुस्‍तक मेले से बाहर मैं.. और मुझपर डंडे!

बुद्धिमान पदा राजधानी के पुस्‍तक मेले में टहल रहा था, मैं मेले की ज़द से बाहर था. चूंकि बुद्धिमान पदा पुस्‍तकों से ज़्यादा मेले पर नज़र धरे था, उसकी नज़रों ने मुझे धर लिया. लपककर वह मेरे पास आया, हमारे बीच संवाद का न होना अब असंभव हो गया. चूंकि हमारे यहां ज़्यादा बातें बुद्धिमान पदे ही शुरू करते हैं, हमारे बीच भी बातचीत की पहल बुद्धिमान पदे ने ही की. छूटते ही कहा- तुम बुद्धिमान नहीं हो!

अपने रूखे, असभ्‍य, असामाजिक हरकतों से हर वक़्त मैं यूं भी शर्मिंदा बना रहता हूं, अपने ऊपर किये इस टिप्‍पणी को नकारने का प्रश्‍न नहीं था, सो सिर हिलाकर स्‍वीकारा- बुद्धिमान नहीं हूं जानता हूं..

बुद्धिमान पदा मेरे हारे की स्‍वीकारोक्ति से प्रसन्‍न नहीं हुआ. उलटकर अपनी तारीफ़ में कुछ कहता इसके पहले ही जाने क्‍यों (इसलिए कि मैं मेले से बाहर था? मगर जिन्‍हें अपने न बुद्धिमान होने का वास्‍तविक ज्ञान होता है क्‍या वह हमेशा ही मेले से बाहर नहीं होते?) झुंझलाहट में मेरे मुंह से निकला- अपनी तारीफ़ में कुछ मत कहना. मैं जानता हूं तुम बुद्धिमान हो, तुम्‍हारे नाम से ही ज़ाहिर है..

इतने से बुद्धिमान पदा जो है वह खुश न हुआ. अनमना साथ-साथ चलता कभी मेले की ओर कभी मुझे तकता रहा. थोड़े मनन के बाद मुंह खोला- एक बात बताऊं? तुम्‍हारे आने के पहले सब कहीं हरियाली थी, तुमने आकर उसे क्‍या कहते हैं.. आग गिरा दी.. तुम नहीं दिखते तो ज़्यादा अच्‍छा था!

शर्म से सिर झुकाये मैंने बुदबुदाकर कहा- मैं तो अब भी मेले से बाहर हूं, बुद्धिमान श्रीमान.. बाहर-बाहर से देख रहा हूं, आपको उससे भी गुरेज है?..

मनन करने की बुद्धिमान पदे को आदत थी. देर तक मननोपरांत वह हमेशा कोई बुद्धिमानी की बात कहता, इसकी प्रसिद्धि थी, अबकी भी कहा- तुम गायब नहीं हो सकते? ऐसा नहीं हो सकता कि तुम दिखो ही नहीं? मेले के पंडाल पर तुम्‍हारी छाया पड़ती है. तुम्‍हारी छाया से मेले के कुएं का जल गंदा होता है..

मुझे सन्‍न चोट लगी, मैं सन्‍न चुप रह गया. मगर चोट बुद्धिमान पदे को भी लगी होगी जभी तो वह ऐसा कह रहा था; कह देने को विवश हो रहा था!.. न दिखने में शायद कोई गूढ़, गंभीर, अभिजात दर्शन छिपा हो जो मैं प्रकट, अबुद्धिमान नहीं देख पा रहा था!

कातरता में गिड़गिड़ाकर मैंने बुद्धिमान पदे से प्रार्थना की- सर, मैंने पहले ही कहा था मैं बुद्धिमान नहीं.. समझने की कोशिश कर रहा हूं.. देखने का अधिकार छीन लोगे तो मैं इस आंख का क्‍या करूंगा, श्रीमान?.. आप भी नहीं चाहते होगे किसी ऊंची इमारत के जंगले, पेड़ की किसी शाख पर उलूक की तरह आंखें झपकाता बैठा रहूं?..

श्रीमंत बुद्धिमान पदे को हमपर कुछ तरस आया, मन में मानवीय कुछ भाव फूटे, मगर वह बुद्धि से मजबूर थे, सिर हिलाते हुए बोले- तुम्‍हें देखना है तो मेले के अंदर से देखो; बाहर से देखना विजातीय देखना लगता है, ध्‍यान बंटता है, हमारी टहल में खलल होती है!..

हूं. सोचनेवाली बात थी. सारे अकेले देखनेवाले मेले और पंडाल में ही बैठकर देखने के सुख से सुखी व दु:ख से दु:खी हो सकेंगे, इससे अलग देखने का मतलब न होगा?.. मैं अबुद्धिमान घबराया मन ही मन चिंतित होता रहा, बुद्धिमान पदे ने मुंह में एक मगहिया पान धरी और आत्‍मविश्‍वासी कदम धरते इतमिनान से आगे बढ़ गए...

एक बड़ी मन मोहनेवाली कविता पढ़ी, आप भी पढ़ो... और यह भी..

6 comments:

  1. आप सचमुच दिल्ली में हैं क्या?

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  2. एक बात समझ नहीं आई, गधा बुध्दिमान हो कर भी पुस्‍तक मेले में था। अवश्‍य वह बुध्दिमान नहीं रहा होगा, होता तो मेले का मजा बाहर से लेता। गधों को अंदर-बाहर आते-जाते देखता।

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  3. @संजय,
    मेले से बाहर हूं, प्‍यारे, और फ़ि‍लहाल तो लोककथा में हूं..

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  4. आप लोककथा में रहें. भूलकर भी लोकसभा का रूख न करिएगा.

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  5. आपका लिखा लगभग सब पढ़ती हूँ, जब विश्वास होता है कि समझ आया तो टिप्पणी भी करती हूँ । मुझे तो स्वयं लगता है कि जीवन के मेले को बाहर ही बाहर से देख रही हूँ । उसका भाग तो बिल्कुल नहीं हूँ ।
    घुघूती बासूती

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  6. ये भी चीन यात्रा की तरज पर कीगई दिल्ली यात्रा है क्या...?

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