Monday, February 4, 2008

उझरायी औरत का स्टिल लाइफ़..

इतना दिन चढ़ आया और अब तक मैं लेवा-चद्दर में फंसी हूं! झाड़-पत्‍तर के पास ये पेंसिल यहां क्‍यों पड़ी है? बक्‍सा-किताब झुलाया, हो गई पढ़ाई.. फेंक दिया पेंसिल, फिर आ जायेगा, क्‍या फरक पड़ता है!.. दुबारा आने दो रब्‍बर-पेंसिल मांगने, दस ठो देती हूं धम्‍म्-धम्‍म् पीठ पर, तब बुझायेगा छोकरी को! रोज़ बताओ रैक पर कापी-किताब ऐसे गांजके मत रक्‍खा करो लेकिन बात सुनेगी तब्‍ब ना.. दीपू की देखा-देखी वैसे ही हर बात में फरर्र-फरर्र.. लड़की का आखिर एक ठो बात-व्‍योहार होता है, अभी नहीं सीखेगी तो कब सीखेगी? इनसे चिल्‍लाते हैं कि समझाओ, बेटी को.. तो इनके कान पे हमारी बात ठहरती है? चार दिन से वही किचकिच सुना रहे हैं कि मैंने पालिसी का कागज घुमा दिया. अरे, हम मैगजिन-पेपर तो देखते नहीं, आपका कागज-पत्‍तर छेड़छाड़ करेंगे? और दिखेगा तो हमको अकल नहीं है कि पालिसी का कागज संभाल के रक्‍खेंगे? मगर ये कैसे मान लें कि हमको अकिल है.. घर में कागज गड़बड़ाया है तो हमारी लापरवाही से ही गड़बड़ाया होगा!.. ठीक है, आपको जो मानना है, मानिये, अब आपसे झूठे बहस करके हम माथा नहीं फोड़ेंगे..

एक न एक चीज़ हर समय इनका गड़बड़ाया ही रहता है!.. इतवार को चश्‍मा का खोल गायब था, बुच्‍चन दो चटाका खायी भी कि जब देखो, इससे-उससे खेलती रहती है, फिर खोल खुदै खोजके बाहर किये तकिया के नीचे से! ऐसे तो झक्‍की आदमी हैं कि ये भी साफ-साफ नहीं बताते कि कागज नहीं मिला तो कितने का नुकसान हो जायेगा.. मैं बोली ऑरिजनल में गड़बड़ी हो गई तो ठीक है, आदमी जान तो नहीं देगा, नकल निकलवा लो.. तो मुझको ऐसे देखने लगे जैसे नीता और मेरी बुद्धि में कोई फरके नहीं है! ठीक है, भाई, आपका कागज, आपका पैसा, जो बुझाये सो कीजिए! मेरी सलाह कब लिये थे कि अब लीजियेगा!..

अरे, भागती है कि नहीं, हरामखोर! सुर्र! सुर्र!.. ये बिलार भी एकदम परिक ही गई है.. रसोई से जरा नज़र हटा नहीं कि जंगले से फांदकर अपना खेल करने चली आती है. दस दफे नीता को समझाया है कि पीछेवाला जंगला बंद रक्‍खा कर मगर हरामखोर सिंगार-बहार और अपने गल-बजव्‍वल से फुरसत पायेगी तब तो मेरी बात का ध्‍यान करेगी! साढ़े नौ हो रहा है और अभी तक माधुरी दीक्छित का पता नहीं है! दरवाजा में पैर धरते ही बोलेगी दीदी, आज जल्‍दी छोड़ दीजिए, हॉस्पिटल जाना है.. हर तीसरे हीरोईनजी को हॉस्पिटल जाना रहता है!.. बदमाश से कहे थे ये सब बयाम एक दिन धो-खंगार के एक तरफ रख दे, साथ बैठ के कभी आंवड़ा-ओल का अचार डालेंगे मगर जब तक सिर पे चढ़के न करवायें, अपने जी से कहां से होगा.. आयें आज दीक्छित महारानी, भेजती हूं इनको हॉस्पिटल!..

लो, ये लौकी भी खराब हुई, मिसराइन इतनी अच्‍छी बतिया ला के दे गईं थीं, पकौड़ी-तरकारी कुछ बना लिये होते, देखो, धरे-धरे ये भी नुकसान हुआ! और ये नवल जी के बाजू में गाड़ी से सामान कैसा उतर रहा है? नए किरायेदार ये सब मोहमडन हैं क्‍या? अरे, अब यहां मोहमडन मोहल्‍ला बनेगा क्‍या? मिसराइन आके मुझको बोली भी नहीं? बुच्‍चन! बुच्‍चन!..

3 comments:

  1. घर में कागज गड़बड़ाया है तो हमारी लापरवाही से ही गड़बड़ाया होगा!.. ठीक है, आपको जो मानना है, मानिये, अब आपसे झूठे बहस करके हम माथा नहीं फोड़ेंगे..
    क्या बात है.. आपने तो हमारे घर को उतार कर रख दिया..मज़ा आ गया

    ReplyDelete
  2. बहुत सही चित्रण किया है... ।

    ReplyDelete
  3. बहुत बढ़िया ! दीपू से बराबरी वाली बात सही रही ।
    घुघूती बासूती

    ReplyDelete