Wednesday, February 6, 2008

एक पतित पति के नोट्स..

ऊहूहूहू.. मुंबई में ऐसी ठंड पहले कभी महसूस नहीं की. पत्‍नी ने दूसरी बार भी लड़की ही पैदा किया था तब भी नहीं! किसी चीज़ में- खासतौर पर काम में- मन एकदम नहीं लग रहा (पत्‍नी में तो नहीं ही लगता). चूंकि पुरानी आदत है सुबह घर से भागकर (read पत्‍नी से भागकर) ऑफिस चला आता हूं, मगर ऑफिस पहुंचकर एक अजीब-सा खालीपन घेर लेती है. लगता है किसी गलत पड़ाव पर लगाम खींचकर रोक लिया गया होऊं. लगाम किसी और ने नहीं, खुद मैंने ही खींचा होता है, मगर इस खिंचने की अजीब अनुभूति तो हो ही जाती है (संदर्भ अज्ञेय और पता नहीं किस-किस की कवितायें).. पता नहीं ऑफिस में बाकी के लोग कैसे इतने उदासीन और वर्कोहॉलिक हैं! कि ऐसे अलसाये मौसम में भी चाव से ई-मेल और फ्री-सेल खेल पा रहे हैं. जबकि मौसम की ही तरह अलसाया हुआ मैं धूप के किसी टुकड़े में खड़ा दिन भर बस अपने पैर की नोक देखते भर रहना चाह पा रहा हूं. या हाथ के नाखून. या पता नहीं क्‍या देखते हुए सुधा पद्मानाभन के कंधों पर के तिल के बारे में सोचते रहना चाह रहा हूं. जिसके बारे में सोचते ही पता नहीं तो क्‍यों मेरे कान और नथुनों में कहां-कहां की ठंड चढ़ने लगती है (या गरमी? मगर ऐसी ठंड में गरमी कैसे चढ़ सकती है? ठंड ही चढ़ती होगी. इतनी है और दिमाग पर ऐसा सन्निपात चढ़ा हुआ है कि देखिए, ठंड और गरमी का प्राथमिक फर्क भूल रहा हूं)..

मेज के किनारों से होती हुई आंखें सेल फ़ोन के शरीर पर जाकर टिक गई हैं (ऐसी ठंड में मैं क्‍या आंखों को स्थिर नहीं रख सकता? कि खुली रहकर भी कुछ न देखें, और देखें भी तो आंख की किरकिरी तो कतई न हों?), और किसी भी क्षण हो सकनेवाले अनिष्‍ट की आशंका में टिकी हुई हैं. सेल किसी भी क्षण बज सकता है नहीं, बज रहा है. मेरी पत्‍नी बजा रही है (ऐसी ठंड में और कौन परेशान करेगा. या होगा). सीने पर बांह बांधे मुर्दे की तरह स्थिर पड़ा मैंने नंबर को उदासीन नज़रों से देखा है लेकिन फ़ोन उठाने की इच्‍छा नहीं हो रही (मुर्दे की तरह स्थिर न पड़ा होता तब भी इच्‍छा वहीं रहती). आखिर बात क्‍या करूंगा? पत्‍नी नेरुदा-फेलूदा के बारे में तो बात करेगी नहीं. फालूदा के बारे में भी नहीं करेगी. ज़्यादा से ज़्यादा पूछेगी कटहल की तरकारी कैसी बनी थी और मैं गुस्‍से की घूंट पीता धीमे से बुदबुदाकर कहूंगा- हूं. ऐसा तो नहीं ही होगा कि गुस्‍से की घूंट पीने की जगह मैं बेवकूफ की कान खींचकर चंदू के समझदार पोस्‍ट पर लिये जाऊं कि देख, बदकार, चंदू ने इशारा किया था, फिर भी तूने टिफिन में कटहल ठेल दी? कि मैं ठेल-ठेलके कटहल खाऊं और.. ? समझदार को इशारा काफी. लेकिन पत्‍नी समझदार हो तब तो इशारा समझे? नौ बार की घंटी पर भी मेरे फ़ोन न उठाने पर ऐसा कैसे हो कि ‘हारानो सुर’ हार मानकर हौसला त्‍याग दे! चार लोग मेरी दिशा में देखने लगे तो मैंने ही हार मानकर फ़ोन उठा लिया. चीखना चाहता था मगर ऑफिस और चार लोगों की देखती नज़रों के लिहाज में झींकने तक स्‍वयं को सीमित किया. कहा- कहीं बम फूट गया है जो इतनी जोर से साइरन बजा रही हो?

समझदार होती तो इशारा समझकर चुप हो जाती (मगर समझदार होती तो पत्‍नी ही क्‍यों होती, सुधा पद्मनाभन न होती?), घबरायी आवाज़ में गंवार ने कहा- समझो बम ही फूटा है.. केबल काम नहीं कर रहा!

नोआखाली के दंगों की खबरें सुनकर गांधीजी के चेहरे पर जो भाव आये होंगे, कुछ वैसे ही भाव मैंने अपने चेहरे पर लाने की कोशिश की. और लाने में नाकाम होकर कहा- इसमें इतना परेशान होने की क्‍या बात है. एक दिन टीवी नहीं देखोगी, दोपहर में झपकी ले लोगी..

अभी सो गई तो रात में आंख नहीं लगेगी!- पत्‍नी ने घबरायी आवाज़ में कहा- बहुत टेंशन हो रहा है, जी.. क्‍या करूं, कुछ बोलो ना?..

बोलने को मैं उसे अपने कागज़-पत्‍तर की अलमारी साफ़ करने और कुर्तों में बटन टांकने का काम बोल सकता था.. मगर अपने अंतर्लोक में पत्‍नी को इतना अंतरंग बनाने का विचार अचानक पता नहीं क्‍यों बड़ा भयावना लगा. सोच-विचार वाले स्‍वर में मैंने सोच-विचार करके समझदारी से जवाब दिया- ऐसी ही खाली टीवी के सामने बैठी टीवी निहारती रहो, मैं आधे घंटे में फोन करता हूं! कहकर मैंने फ़ोन काट दिया और उदासीन खोया-खोया चुपचाप पैर हिलाने लगा. पता नहीं ऑफिस में बाकी लोग क्‍या खाकर तो खेल और ठेल रहे हैं जबकि मैं फ्री-सेल खेलना नहीं चाहता. न ई-मेल खोलना. सिर्फ़ धूप सेंकना चाहता हूं.. लेकिन धूप तक पहुंचने के रास्‍ते में बॉस का साला खड़ा है.. और अकेला नहीं, सुधा पद्मनाभन के साथ खड़ा है. और सुधा मेरे पैर, हाथ या मुख नहीं, उसी नीच का मुंह देख रही है! (मुझमें देखने की गलती कैसे कर सकती है, बदचलन!).. ऊहूहूहू, सचमुच, मुंबई में ऐसी ठंड पहले कभी महसूस नहीं की!!!!

7 comments:

  1. बाकी तो सब पतित है ही सिर्फ बायें वाली फोटो प्रगतिशील है । ऐसी चमकती हुई सच्चाई कहाँ से निकाल लाते हैं ? हतप्रभ हूँ , चकाचौंध भी ।

    ReplyDelete
  2. यह आपकी माइथोलॉजिकल पत्नी भी बड़ा खिटखिट करती है भाई। देखो कहीं कोई इक्सचेंज ऑफर हो तो नक्की करो।

    ReplyDelete
  3. pati-patni dono hi sahaanubhuuti ke paatr....

    ReplyDelete
  4. वाकई मुम्बई में ठंड बहुत है..ई एतना ना काम काजी पत्नी लाये हैं कि उसका खिटखिट तो सुनना ही पड़ेगा,यही तो पतित पति का धर्म है, जो पतित हैं उनका कोई देखनिहार भी तो नहीं होता,गजबै करेक्टर आप भी पकड़ते है..लगता है ई कुल तो हमरे घर में भी होता है त का हमहूं आपकी तरह पतित हुई गये हैं का...

    ReplyDelete
  5. 116 बीवी के ताने
    एक सुधा के कांधे का तिल
    झूठमूठ के किस्से कुछ

    ReplyDelete
  6. थोड़ा बहुत तकनीक तो आप भी जाने ही हैं, तनिक बताइए कया करें हम नहीं जानते कि हमारी पत्‍नी आपकी इन पोस्‍टों को पढें, हमारी सारी पतितता सामने आ जाती है..(लगता है ब्लॉग का रास्‍ता 'दिखाना' ही भूल थी)

    ReplyDelete
  7. वस्तुगत को आत्मगत बहुतै धीरज से बनाते हैं . रामरसोई बहुतै जतन से पकाते हैं . अच्छी खबर यह है कि पकाऊ जनता में सेंस ऑव सटायर जाग रहा है . मनहूसी का राक्खस भाग रहा है .

    ReplyDelete