Thursday, February 7, 2008

दुष्‍टता, धृष्‍टता व निकृष्‍टता पर कुछ प्रात:कालीन मौलिक चिंतन..

क्लिष्‍टता, धृष्‍टता, दुष्‍टता में जो फर्क करना नहीं जानते, और खासतौर पर इन सभी के लिए मुझे जिम्‍मेदार बताते चलते हैं, वे विशिष्‍ट नहीं निकृष्‍ट लोग हैं. जबकि उच्छिष्‍ट की तरफदारी में चंदू का फिर-फिर पोस्‍ट ठेलना धृष्‍टता की कैटेगरी में देखा जाना चाहिए (इन्‍हीं भोली धृष्‍टताओं का दुष्‍परिणाम है कि पत्रकारिता के मैदान में चंदू की विशेष तरक्‍की नहीं हो पायी है. न होने के आसार हैं. मगर इससे घंटा मुझे, या आपको, क्‍या फर्क पड़ता है?). लेकिन अकेले चंदू का कसूर नहीं, धृष्‍टताएं मैं भी करता हूं- और उसी का धृष्‍ट या क्लिष्‍ट जैसा भी दुष्‍परिणाम है कि पत्रकारिता ही क्‍यों किसी भी मैदान में विशेष तो क्‍या सामान्‍य तरक्‍की तक नहीं पा सका हूं! न पाने के आसार हैं! और आपको भले न पड़ता हो, मुझे तो फर्क पड़ता है.. मगर मैं जो हूं धृष्‍टताओं से बाज नहीं आ पाता (कोई एक भली, आंचल की धनी लड़की नहीं जो धृष्‍टताओं से मुझे बाज दिलवा दे? यह बेमतलब की जानलेवा बेवड़ेबाजी छुड़वा दे?.. लेकिन नहीं, ब्‍लॉगजगत की जैसी निर्मम सच्‍चायी है कि कोई भला लड़का नहीं, उसी तरह से यह भी अधर्मी सच्‍चायी ही है कि एक भली लड़की तक नहीं)..

लेकिन नालों के नीचे मैं कितना भी नहाता रहूं, होती वह धृष्‍टताएं ही हैं. जबकि कुछ लोग हैं चुप्‍पे-चुप्‍पे दुष्‍टताएं कर ले जाते हैं! जैसे मैंने दोपहर के खाने के बाद अभी तीन अंगड़ाई ठीक से ली भी नहीं थी कि बाज़ार मियां ने दुष्‍टतायी कर दी! चुप्‍पे से आकर आततायी ‘सत्‍यमेव जयते’ लिखकर छोड़ गए! अब यह जो सत्‍यमेव जयते है- सरकारी प्रचार व पोस्‍टर से बाहर कहीं भी देखूं तो मेरे कान खड़े हो जाते हैं! तो वही खड़े कानों के साथ मैंने अनुभवी ज़रा-सी जासूसी की और देखिए, कैसे मासूम व भोले गड्ढे में आकर गिरा हूं! अब आप ही बताइए, बैठे-बैठे की यह दुष्‍टता है या नहीं? धृष्‍टता तो नहीं ही है.

इस छोटी-सी अंतर्जालिक पड़ोस की निष्‍पाप, निष्‍प्रयोजन यात्रा से यह तथ्‍य भी उजागर हुआ कि प्रत्‍यक्षा बेबी कितना निकृष्‍ट हैं. जिन बेबाओं के मासूम मौज पर यह चीखते हुए बम-गोला हो रही थीं कि बाबाओं की यह दूसरी बार की धृष्‍टता है, और बाबा हकलाते हुए नहीं, सबको सुलाते हुए कह रहा था कि बेबी, कितना तो तुम तिल का ताड़ बनाती हो, इत्‍ती सी बात पे इत्‍ता रार उठाती हो? जबकि देखो, हम अफ़सोस तक ज़ाहिर कर रहे हैं.. जबकि पड़ोस की अंतर्जालिक यात्रा (और बाज़ार मियां की दुष्‍टतायी से) हमें पुनि-पुनि ज्ञात हुआ कि यही बाबा लोग थे, नाला के किनारे खड़े होकर पहले भी इसी निष्‍काम भाव से ऐसा ही एक अन्‍य बेबी-मर्दन किया था. और तब यह ‘मर्दानापन’ झेल रही बेबी नीलिमा ने मुंह से झाग फेंका था.. और भोले बाबा वहां भी यही भोला अफ़सोस दोहरा रहे थे कि कि अरे, नीलमणि जी, आप तो इत्‍ती सी बात का इत्‍ता बुरा मान गईं? जबकि कायदे से बेबी नीलिमा को बुरा नहीं मानना चाहिए था, हेंहें करके ब्‍लॉग मौज परम्‍परा को सुदृढ़ करना चाहिए था. मगर असली सवाल वह नहीं है. असली सवाल है तब बेबी प्रत्‍यक्षा कहां थीं और कहां था उनका पॉलिटिक्‍स, पार्टनर? लेकिन जैसाकि लड़कियों के साथ स्‍वभावत: होता है कि वे निराश करती हैं.. तब बेबी नीलिमा ने निराश किया था. अब प्रत्‍यक्षा बी कर रही हैं..

नीलिमा तब जो है धृष्‍टता कर रही थी. जबकि प्रत्‍यक्षा ने जो किया वह दुष्‍टता की तरह देखा जाना चाहिए (देखा क्‍या जाना चाहिए, मुझे दिख रहा है!). कि एक सुकृत्‍य पहले हो चुका था, और सबकी नज़र में हुआ था, मगर प्रत्‍यक्षा बेबी उसका स्‍मरण नहीं कर सकीं? इसी से जुड़ा प्रश्‍न उठता है कि हम स्‍वयं से इतना मोहाच्‍छादित क्‍यों हैं? और साथ ही साथ जवाब भी मिल जाता है कि हम स्‍वयं से बहुत मोहाच्‍छादित हैं, और इतनी भर ही हमारी पॉलिटिक्‍स है!..

दूसरी ज्ञान की बात यह है कि मौजी अफ़सर, बाबाजन बीच-बीच में अगर इधर-उधर अ-स्त्रियोचित इनको व उनको फूल-माला पहनायें, और जवाब में किसी के मुंह से झाग छूटने लगे और बाबा लोग तत्‍काल सन्‍न होकर अफ़सोस ज़ाहिर कर दें- तो मुझे लगता है उनकी अ-स्त्रियोचित भावनाओं की कद्र करते हुए उन्‍हें माफ़ कर देना चाहिए.. और खुद सिर नवाकर चुपचाप कॉफ़ी पीते रहना चाहिए!.. क्‍योंकि अंतत: बेबी किम्‍बा बेवा आप हो.. वह तो अच्‍छी मंशाओं वाले भले अफ़सर मात्र हैं.. दुष्‍ट, धृष्‍ट, निकृष्‍ट तो नहीं ही हैं. वह पता नहीं कौन है..

(ऊपर की फ़ोटो: दिल्‍ली में नोटपैड की सुजाता के साथ नीलिमा; अमित गुप्‍ता के ब्‍लॉग से साभार)

10 comments:

  1. ‘सत्‍यमेव जयते’ पहला मन्त्र लिखो फिर धो पोछ कर मिटा दो । लो जी अब तो सब मिट गया लगता है कंप्यूटर उनका system restore हो गया । आप कुछ मोटा मोटा लिखा करे जल्दी असर होगा , सूक्ष्म आप का वह भी जलेबी के अंदर , आम ब्लॉगर नही समझ पाता !!!!!!!!!!!!!!

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  2. अब लिखा कम था जो फोटू भी चिपका दिये बाबा !! काहे ? ब्लॉग करे , आपको एक्ठो सूटेबल गर्ल न मिले । वैसे ,बाबा ई बतलाने का कष्ट करें कि गूढार्थ क्या हैं ,व्यंग्य इतनी अंडर्टोनस लिये है , कौन सी टोन सुनूँ । दोनो ओर तीर चलाते हो ।रोज़ आना हो रहा है महाराज के ब्लॉग पर । बहुत हुआ !बडका लोग आपको पढना बन्द कर देंगे ।

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  3. सबसे पहले गंभीर बात .. जब नीलिमा वाला मुद्दा उठा तब नीलिमा की आवाज़ अकेली आवाज़ रह गई इसका बेहद अफसोस है ।
    अब जब दोबारा मुद्दा उठा तब चूँकि नीलिमा वाली बात की सही जानकारी नहीं थी मैं मुद्दे रिलेट/लिंक नहीं कर पाई .. इसका भी अफसोस है ।
    आगे ऐसा न हो ..इसके लिये चोखेर बाली ..सिर्फ औरतें ही नहीं पुरुष भी संवेदनशीलता से भागीदारी करें .. स्पॉट लाईट एक जगह पड़े तो रौशनी तीखी तेज़ पड़ती है ।
    दूसरे .. बेबी किम्बा बेवा तो हमीं हैं , निकृष्ट भी हम ही ..फिर पतनशील पतित आप हैं तो महीन को मोटा करने और गद्ढे में गिरने (गिरे हुये को क्या गिराना ?)चोखेरबाली के कंकड़ को होनरेरी सदस्यता हम ही प्रदान कर दें ..कैसा रहेगा ? माँ सरस्वती की कृपा तो नहीं ही है किम्बा बेबीयों की ही ..चलेगी तो ? वैसे भी आपको अनिल अंबानी समझने से तो रहे , बेबी बीबी समझ लें इसी में सार्थकता समझें ।

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  4. @प्रत्‍यक्षा,
    बेबी, बीवियां मुझे न भी समझें, मां सरस्‍वती समझती हैं (समझती होंगी? न समझें तो मां का तो बड़ा नुकसान हुआ?).. रही बात अनिलजी अंबानीजी की मुझे समझने से रहने की तो मैं भी धन, दाना-पानी कहां समझ पा रहा हूं? अनिलजी अंबानीजी मेरे पोस्‍ट समझें से ज़्यादा अच्‍छा हो, भारतीय सरकार उनके घोस्‍ट्स समझकर अपने को तीन-चार परसेंट बचा ले जाये, इसी में आप लोगों का कल्‍याण होगा (मेरा कहां होगा, सवाल ही नहीं उठता!)..

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  5. i stood in favor of neelima even then , may be neelima remembers it !!! even if she does not i feel that since i was there it was more then enough

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  6. कई दिनों से पढ़ रहा हूं आप लोगों का अबूझ संवाद, एनक्रिप्टेड नहीं दिखता, मॉर्स कोड या ब्रेल लिपी भी नहीं फिर भी एकहू शब्द न समझ आया। अब मुझे बस टीकू तलसानिया जैसे एक ही डायलाग मारने का मन होता है, "ये हो क्या रहा है?" या बांग्ला में कहूं, "होच्चे टा की?" ;) कुछ हमारे जैसे नासमझों के लिये सरल हिन्दी में भी कुछ लिखें सर!

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  7. हम्म! उल्टा कैलेंडर चलाते हुए न जाने कितना पुराना पढ़ आए इस पोस्ट को समझने के लिए । फिर भी पूरी समझ आ गई कह नहीं सकती । एक नया शब्द उच्छिष्ट सीखा । किम्बा के किम् की तो जानकारी है परन्तु किम्बा की नहीं । हमारा शब्दकोष भी धोखा दे गया । शब्दज्ञान व पिछले कुछ समय से चलती अनेक भागों वाली इस कहानी को समझने में सहायता करने के लिए धन्यवाद ।

    घुघूती बासूती

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  8. @घुघूती बासूती जी,


    जहां मेरे लिखे शब्‍द समझ न आयें, कृपया उसके लिए दोष अपने शब्‍दकोश को नहीं, मुझे ही दें! अपनी जलेबीवाली लिखाई में बहुत बार मैं यहां-वहां से शबद इस तरह से उठाता हूं कि वह हमेशा ठीक और सबकी समझवाली हिंदी की ही हो, कतई ज़रूरी नहीं. असुविधा हुई होगी तो माफ़ी चाहता हूं

    (वैसे बहुतों के लिखे से मुझे रोज़ ही असुविधा होती रहती है- और यह व्‍यंग्‍य का अंडरटोन नहीं खालिस व्‍यंग्‍य ही है. ओह, व्‍यंग्‍य कैसे पढ़ें इसका एक वर्कशॉप ले लिया जाये क्‍या? आप मॉडरेट करेंगी?)..

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  9. जो मन्ने कहना था वो तो देबू दा ने कै दिया इसलिए रिपीट करे का कौनो लाभ नाही। समझ तो मन्ने भी ना आ रिया कि यो हो के रिया है पर मैं यो मान के संतोष करता हूँ कि ज्ञानी लोगों की बात तब समझ आन लगेगी जब मैं भी ज्ञानी हो जाऊँगा, अभी तो बच्चा हूँ इसलिए परेशान होन की कौनो बात ही ना!! ;)

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