एक हितैषी ने चैट बॉक्‍स पर खिड़की बजाकर सूचित किया कि वही राग रो-रोकर मैं बोर कर रहा हूं.. सुनकर तकलीफ़ हुई.. क्‍योंकि बदहवासी में बीच-बीच में मैं वार ज़रूर करता हूं, मगर बोर करना नहीं चाहता. मगर मैं जो करना चाहता हूं और जो हो जाता है- वह भी तारतम्‍य की सुगठित कहानी कब कहां बनती है? (संदर्भ के लिए कृपया टिप्‍पणीकार के पोस्‍ट पर मेरी टिप्‍पणी देखें) गर्म पानी की बाल्‍टी में मैं गर्म पानी की बाल्‍टी समझते हुए ही पैर रखना चाहता हूं, जबकि तत्‍काल पता चलता है मैंने दूध के खौलते कड़ाह में रख दिया है! अब जैसे आज अपने हितैषी की सूचना सुनकर समझ नहीं पा रहा था पैर कहां, किधर रखूं.. घबराकर बीच में यह भी ख़्याल आया अच्‍छा हो कोई अच्‍छा-सा मुंह देखकर उस मुंह में ही रख दूं?..

बोर, वार, या समोवार के भीतर जलेबी जैसे घुमावदार पोस्‍ट से आखिर किसी का क्‍या फ़ायदा है? जिसका होना चाहिए उसका नुकसान भी नहीं है! मगर इसलिए नहीं है कि किसी को व्‍यक्तिगत तौर पर दु:खी करने की मेरी नीयत भी नहीं? लेकिन हिंदी फ़ि‍ल्‍मों के अच्‍छे बेटे की तरह सबको सुखी कर दूं टाइप सामंजस्‍यवादी पोस्‍टें लिखने लगूं- इतना दु:खी किसी दूसरे को क्‍या, मैं स्‍वयं को भी नहीं करना चाहूंगा! मगर बात तो रह ही जाती है कि वही बोझिल राग गा-गाकर बोर कर रहा हूं?.. इस उलझाव से बाहर आने का उपाय क्‍या है? हारकर असित सेन या केश्‍टो मुखर्जी टाइप कोई कहानी ठेल दूं? या हेमंत कुमार का कोई रोता हुआ गाना चढ़ाकर हंसने लगूं?..

लेकिन जैसाकि ऐसी स्थिति में मेरी तरह घबराया हुआ कोई भी आदमी करेगा, अंत में वही करता हूं- किताब के पीछे सिर छिपाकर बुद्धिजीवी की तरह सोचने लगता हूं. सोचने के लिए शांतनु और गंगा की प्रेम व पोस्‍ट प्रेमकथा है..

कहानी की बिगनिंग काफी घिसी-पिटी है. कि नदी तट पर हार्टथ्रॉब गंगा को देखकर किंग शांतनु का मन रीझ गया. देह व मन मरोड़-मरोड़कर शादी की चिरौरी करने लगे. इससे आगे गंगा ने मुस्‍कराकर शादी की अपनी कुछ शर्तें रखीं, गंगा का वह जवाब बड़ा इंटरेस्टिंग व आधुनिक है.. देखिए, मिस गंगे का शांतनु मियां के आगे मारा डायलॉग- मुझसे कोई यह न पूछ सकेगा कि मैं कौन हूं और किस कुल की हूं. मैं कुछ भी करूं- अच्‍छा या बुरा, मुझे कोई न रोके. मेरी किसी भी बात पर कोई मुझपर नाराज़ न हो और न कोई मुझे डांटे-डपटे. यह मेरी शर्तें हैं. इनमें से एक भी तोड़े जाने पर मैं उसी क्षण आपको छोड़कर चली जाऊंगी. स्‍वीकार है आपको?

मुझे तो नहीं होता. मैं तो चीखकर यही कहता- अबे, तू छुपा क्‍या रही है, लूज़ कैरेक्‍टर? यू थिंक यू कैन फूल मी? एंड द वर्ल्‍ड?.. मगर चूंकि शांतनु मेरी तरह समझदार नहीं थे, और मेरी तरह ज़रा-सा रूप देखकर खुद को फिसलने से रोक लें जैसा रोक नहीं पाये, मिस गंगा की सारी शर्तें प्रेम-बेवड़े ने स्‍वीकार कर लीं.. और कहानी में आगे जाकर जवान मेसी, बड़ी नौटंकी में फंसा..

तो आगे के पोस्‍ट-प्रेम, पोस्‍ट-मैरिज सीनारियो पर अब ज़रा गौर फरमायें. दे-दनादन एक के बाद एक उर्वरा गंगे ने सात बच्‍चे पैदा किये.. और उनकी डेलिवरी के तत्‍काल बाद ही बच्‍चों को नदी की बहती धारा में निर्मोही फेंक आती.. और ऐसे होरेंडस कृत्‍योपरांत हंसती-इठलाती नामुराद सहमे शांतनु के अंकवार में लौट आती! अब जो शांतनु का सहमा होना है उसमें कुछ भी अजीब नहीं.. क्‍योंकि आखिर बाप था, और देख रहा था कैसी बदकार औरत के जाल में फंस गया था जो अपने ही पेट के जने को हंसती-मुस्‍कराती नदी में गिरा आ रही थी. और शांतनु जो है स्‍टुपिड महसूस कर रहा था क्‍योंकि बंदे ने सवाल न करने की शपथ खा रखी थी.. मगर अब उस खाये हुए को निगलने में, ऐसी बीवी को पचाने में तकलीफ़ हो रही थी. ऐसे कथा-विवरण को पढ़ते हुए, मिस गंगा के स्‍ट्रेंज बिहेवियर से मुझे भी हो रही थी (ठंड से नहीं, ऐसे बिहेवियर की सोचकर मैं मद्धम-मद्धम थरथराता रहा..

और चूंकि बुद्धिजीवी हूं (बुद्धि पर ही तो जी रहा हूं, आपके प्रेम पर मैं कहां- वह तो रघुराज जी रहे हैं), मैं बुद्धि घुमा-घुमाकर इस उलझे कथासार और राइटर मिस्‍टर व्‍यास के क्रियेटिव व्‍यवहार (या मिसकंडक्‍ट कहना ज़्यादा उचित होगा?) की पेंच सुलझाता रहा.. हंसती-खेलती, अपनी सलोनी, सुंदरी नायिका से ऐसा हिंसक व प्रोवोकिंग आचरण करवाकर कथाकार स्त्रियोचित हमारे सबकॉंशस के भय, आशंकाओं को इग्‍नाईट करने के आखिर कैसे खेल खेल रहा है? क्‍या वह इसका इशारा कर रहा है कि सुंदरता की आड़ में स्‍त्री एक पज़लिंग, अनरेलायबल मिस्‍ट्री है? या वह हमें सुख के सहजलोक से बाहर खींचकर उलझाव के एक बड़े जटिल कैनवास के लिए तैयार कर रहा है?..

ओह, मैं फिर कहां-कहां बहक गया.. एनिवे, उलझी गंगा को सहमे शांतनु ने बर्दाश्‍त किया तो मेरे रोतड़े राग को हितैषी हमराही बर्दाश्‍त न करें यह बात मुझे किंचित व्‍यथित कर जाती है. और अपने जो पैर हैं वह मैं छुपाकर रखता हूं- कि उसे किसी के मुंह या आंख में न रख दूं!

 
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अनिल रघुराज - February 8, 2008 10:41 AM

वाकई शांतनु को दिया गया गंगा का जवाब बड़ा आधुनिक किस्म का था।

Priyankar - February 8, 2008 11:12 AM

पतित और पावन के दोनों लोक माप लिए हैं प्रभु!अब तीसरा डग मेरे मस्तक पर रखिए और शांत हूजिए .

रही बात हितैषी की तो उनकी ऐसी की तैसी . जो कष्ट और बेचैनी का बाइस बने वो काहे का हितैषी .

Pratyaksha - February 8, 2008 12:20 PM

"या वह हमें सुख के सहजलोक से बाहर खींचकर उलझाव के एक बड़े जटिल कैनवास के लिए तैयार कर रहा है?.."

कैनवस तो जटिल हमेशा से था ..तब । अब भी है । गूढ़ार्थ को महाराज हाईलाईट कर दिया कीजिये । सुबह सुबह की अफरा तफरी में हाईलाईटेड पर नज़र मार लेंगे , इंस्टैंट ज्ञान प्राप्त कर लेंगे ।

चंद्रभूषण - February 8, 2008 1:56 PM

कितना सुंदर क्लू दिया है सोचने का। कोई भी रचना तार्किक से ज्यादा रहस्यमय होती है। संभवतः स्त्री भी पुरुष की तुलना में उतनी ही अतार्किक, उतनी ही रहस्यमय हुआ करती है, जितनी वह संतान रचना के करीब होती है। दूरदर्शन पर काफी पहले एक टेलीड्रामा देखा था- 'पिता'। यह किसी पश्चिमी लेखक की कृति पर आधारित था और उसमें इसी थीम को इक्सप्लोर करने का प्रयास किया गया था। मेरी यह पुरानी मान्यता है कि जीवन के नाटक की समझ के मामले में व्यास अद्वितीय हैं। उनके यहां कुछ भी पारंपरिक, कुछ भी सुविधाजनक नहीं है- इस मामले में वे और उनका महाभारत कितने 'अभारतीय' हैं!

अजित वडनेरकर - February 8, 2008 3:08 PM

कैसी सुंदर ,सरल, सारगर्भित बानी है प्रत्यक्षा की-
गूढ़ार्थ को महाराज हाईलाईट कर दिया कीजिये

सुजाता - February 8, 2008 5:44 PM

स्‍त्री एक पज़लिंग, अनरेलायबल मिस्‍ट्री है?

बाबा :) अपनी आज की पोस्ट में यही बात उठाई है ।

क्यो स्त्री की यह छवि बनाई गयी है?सबकांशस के भय ? आपका चिंतन जारी रहे ।
एक मज़ेदार पोस्ट !

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