लड़कियां इतनी हड़बड़ में क्यों होती हैं? यह अच्छी बात है कि अपनी उम्र बता रही हैं, खुद को औरतें पुकार रही हैं, दो कदम आगे जाकर यहां तक स्वीकार रही हैं कि हसीन नहीं हैं (जो अच्छी बात भले हो, एनकरेजिंग नहीं है! माने, क्या यह काफी नहीं था कि हम ठंड में खड़े-खड़े गिर रहे थे, भले रघुराज मियां उसका कितनाहूं तार्किक खुलासा करते रहें- अब इस डिप्रेसन में भी गिरें- और गिरे रहें कि ससुरी, लड़कियां हसीन तक नहीं हैं? हद है..); मगर इस सबसे ज़्यादा चिंताजनक बात यह है कि लड़कियां (जो हसीन नहीं हैं, सो गॉड्डैम सेड्ड अफ़ेयर!) हड़बड़ी में हैं! जबकि एक दिन पहले ही हमने मिस और बाद में मिसेज़ हुई गंगा का कूल एक्ज़ांपल इसीलिए क्वोट किया था कि मच्योर समझ का रास्ता खुले, लड़कियां भर्र-भर्र और ढर्र-ढर्र बहती न रहें; गंगा की तरह कूलली व स्मार्टली बिहेव करें. मगर चूंकि अंतत: हैं लड़कियां ही (ऊपर से हसीन नहीं ही हैं) अम्बा की तरह हदर-बदर चट् अपनी राह का फ़ैसला ले लेंगी और नतीजे में न उन्हें शाल्व अपनायेगा, न विचित्रवीर्य (विचित्र? वीर्य? व्यास महाराज को कोई अन्य नाम न सूझा?), भीष्म बाबा के अपनाने का तो सवाल ही नहीं उठता (उन ससुर की सिर्फ़ इतने भर की बुद्धि थी कि स्वयंवर से अम्बे, अम्बिके, अम्बालिके तीनों बहनों को अपना मर्दानापन दिखाके टांग लाये. अम्बिका और अम्बालिका तो ख़ैर, विचित्रवीर्य- अबे, लेकिन कोई और नाम नहीं सूझा?- के साथ सेट हो गईं; मगर मिस्स अम्बे जो शाल्व को अपना दिल दिये होने को लेकर सबसे ज़्यादा लड़िया रही थी, धोबी की गदही की मानिंद दर-दर की ठोकर खाती रही. अच्छा-खासा हिरोइन मटिरियल थीं, अंत तक आते-आते बिंदू जैसी वैम्प मटिरियल बनकर रह गईं!).
तो मिस्स अम्बे के हड़बड़-तड़बड़ का इतना क्रिश्टल क्लियर कट एक्ज़ांपल है, फिर भी लड़कियां अपना सबक नहीं ले रही हैं. इनको यही लगता है कि दुनिया (माने हिंदी के डेढ़ सौ लोगों का ब्लॉगजगत) अपना सारा काम-धाम छोड़ दे और इनकी आंख में झांक कर (जो वैसे भी हसीन नहीं है) कंकड़ बाहर करे, इनकी और पता नहीं किन-किनकी किरकिरी दूर करे! जबकि विमल ने पहले ही साफ किया है कि उसकी पालिटिक्स महिलाओं की किरकिरी दूर करना नहीं, मटरगश्ती है. यूनुस खान ने पहले से भी पहले साफ कर दिया था कि उनकी सारी पालिटिक्स हेमंत व किशोर कुमारों व अन्य कुमारियों के स्वर-चरणों पर लोटते रहने तक सीमित है. जहां तक मेरी बात है, मैंने आज नहीं, छठवीं कक्षा में ही घोषणा कर दी थी कि जिस गली में हसीनाओं का घर नहीं, उस गली से अपने को घंटा गुज़रना ही नहीं!
लेकिन ये चोखवालियां हैं (हसीन होतीं तो कुछ बात भी होती) कि गुहार करने से बाज नहीं आ रहीं- कि प्लीज़, हमारी चोख देखो.. देखो, हम कितनी शोख हैं! और लगे हाथ कर सको, तो भइय्या, ज़रा किरकिरी भी दूर करते चलो.. अरे? एक तो आप खुद्दे मिस्टिक के चिथड़े-चिथड़े फाड़ रही हो (पहले कह ही दिया है कि हसीन नहीं हैं), दूसरे, शोखी की जगह शोहदों की तरह डंडे भांज रही हो.. और तब्बो चाहती हो कि हम चोख में झांकें? बाला और बाली पहनायें? दुनिया में दूसरों को (माने डेढ़ सौ वाले हिंदी के ब्लॉगजगत को) और काम नहीं है? नीलिमा सुखीजा अरोड़ा ने अख़बार में मेंशन कर दिया, काफी नहीं है? कबाड़खाना, सस्ता शेर, भड़ास, मोहल्ला, बेटियों का ब्लॉग के ऊपर आप अपनी बोटियां सार्वजनिक करने चली आईं और ताबड़-तोड़ दनादन ऐसे पोस्ट पर पोस्ट ठेलने लगीं कि व्यास जी के गणेश जी भी अपनी लिखाई में गड़बड़ा जायें- इतने पर से आपको संतोष नहीं है? आप चाहती हैं सारे लोग सारा काम छोड़कर बस आपकी चोख और आपकी बाली देखें (जो वैसे भी होपलेसली हसीन नहीं है) ? मैं इसका प्रोटेस्ट करता हूं, और गूदेवाले हर मर्द (व जनाना) से इसकी मांग करता हूं कि वे मेरे साथ एक सुर में गायें- ज़माने में और भी ग़म हैं चोख और बाली के सिवा!
लास्टं, बट नॉट इन द लीस्ट, में: क्या आपलोगों में सचमुच कोई हसीन नहीं है?
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'दुनिया की हर औरत ख़ूबसूरत होती है ।'- डॉ. लोहिया
गंगा से लेकर अंबे तक और ठंड से लेकर चोख बाली तक। दिलचस्प है। ऊपर एक 'हसीनता' की निरंतर खोज...
अजी "हसीन" हम भी कुछ कम नहीं..:-)
'दुनिया की हर औरत ख़ूबसूरत होती है और हर पुरुष दीवाना।'- डॉ.(?) काकेश
सबको संगठित होने का अधिकार है,किसी का लिखा पढ़ने के बाद ही तो पता चलता है कि कौन हसीन है....पर ये सब भी मुझे मिथ्या ही लग रहा है..मन की आँखे खोल कर देखना होगा..
हमने तो चार बातें पढ़ी-सुनी हैं:
1 प्राणी जगत में कोई मादा सुन्दर नहीं होती, फिर चाहे वह मोरनी हो, मुर्गी हो, शेरनी हो, या फिर स्त्री हो! (बेशक शक्ति वाली हों)
2 कोई स्त्री सुन्दर नहीं होती, बल्कि सुन्दर होने का दिखावा करती है! (इसिलिये तो देखी जातीं हैं)
3 जो स्त्री सोकर उठने के बाद सुंदर लगे, वही सुंदर होती है! (गूढ़ अर्थ है)
4 सुंदरता देखने वाले की आँखों में होती है। (गौर कीजियेगा, देखने वाली की, नहीं कहा जाता)
और एक बात: कोसने के लिये, नारी की कोख से पुरूष का जनम, पुरूष की मानसिकता, अपनी माँ/ पुत्री के प्रति आपकी सोच जैसे परम्परावादी/ रूढ़िवादी/ घिसे-पिटे जुमलों का उपयोग न करें, कुछ नयी रचना करे!