Sunday, February 10, 2008

जैसे हैं हाल



एक

ऐसा कहां होता है कि अब दोस्‍त
पूछते हों कैसे हो, क्‍या है हाल
बीच-बीच में कोंचकर खुदी को
याद दिलाना पड़ता है
पूछना अकेले के गुमसुम में
कभी मिल भी जाता
है बुदबुदाहट भरा जवाब
बहुत बार तो सिर झुकाये
बस ख़ामोशी मिलती है.

दो

अजाने अंधेरे, मैदान, पहाड़ि‍यां और
फिर कैसे-कैसे तो घुमावदार
रस्‍तों के आखिर में
कोई अजनबी मुल्‍क होगा
या गुमनाम गांव कोई
वहां पहुंचकर तसल्‍ली से
पूछूंगा किसी से घर के हाल
क्‍योंकि घर में घिरे हुए
अब कहां हो पाता है
पूछना घर का हाल.

6 comments:

  1. ओह! ऐसा सरल । सहज भी और सार भी ।

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  2. आप कभी कभी काफ़ी से ज्यादा uncomfortable कर देते हैं. फिर भी आप को पढता हूँ. पता नहीं क्यों.

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  3. @प्रत्‍यक्षा,

    ओह, आपने हमारे अंत:स्‍थ्‍ल की बात कह दी. बाह्यस्‍थल तो रचना में लक्षित हो ही रही है..

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  4. क्याब्बात कही है प्रमोदजी! मज़ा आ गया। सचमुच बहुत सरल और आसान ... काश आपका गद्य-लेखन भी इतना ही सरल होता !

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  5. जबतक बना रहे
    खुद से कुछ पूछने का खयाल
    लाख बेहाली में भी तबतक
    समझो अच्छा ही है हाल

    रोजमर्रे में मसरूफ
    ज्यादातर लोग
    यूं ही मसरूफियत में
    एक दिन निकल भी लेते हैं-
    भूले से भी पूछे बगैर
    खुद से खुद का हाल-हवाल

    बाद का कुछ पता नहीं
    कौन जाने किसी रोज
    सिगरेट ऑफर करते हुए
    उनकी भौंचक आत्मा को
    खुदा ही पूछता हो फिर
    बेमसरफ-सा यह सवाल

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  6. its wonderful to read my thoughts here ... bilkul "aise hai haal"

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