Monday, February 11, 2008

रोज़ ज़रूरी है?..

सुभो-सुभो फिर?.. काम नहीं चलता?.. एक दिन मैं चुप नहीं रह सकता? एक दिन! जस्‍ट वन सिंगल डे?.. रोज़ आवारगी, या आवारगी की नौटंकी करते रहना ज़रूरी है? विश्‍वास, आस्‍था, परम्‍परा जैसी सकारात्‍मक, सर्जनात्‍मक बातें नहीं कर सकता? रोज़-रोज़ याद दिलाते रहने की ज़रूरत है? रोज़? और मैं रोज़ भूलता रहूंगा? बाला साहब, या राजा साहब (एक ही बात है, ससुर) या उनसे ऊपर यह शहर याद दिलाती रहती है, तब भी?.. वैसे भी आभासी लोक में मुझे किसकी तलाश है? ज्ञानहरण की कितनी नौटंकियां करूंगा? सच्‍चाई जो है उसे कितना झुठलाऊंगा? जानता नहीं लंगियों के गीत कहीं नहीं जाते, नयी लंगियों तक ही पहुंचाते हैं? जबकि फिर-फिर तिनका जोड़ते रहने की बात भी बनी रहती है! गुस्‍से की तो रहती ही है.

ओह, मैं क्‍या हूं? सुभो-सुभो नोटपैड की मह-मह खुश्‍बू हूं? ऐसा? इतना व्‍यर्थ गुमान?..

(फ़ोटो तहलका से साभार)

3 comments:

  1. मीन राशि,....हम्म जन्मदिन को तो देर है...तो क्या ब्लॉग को साल भर हुआ है?!...कुछ समय को समेटती सी पोस्ट है...

    पिछले पूरे साल आप अपने अनोखे अंदाज़ और शैली में हमें अपने लेखन प्रतिभा से मिलाते रहे। बहुत अच्छे लिंक्स, कुछ बहुत उम्दा संगीत,चीन,वगैरह...।

    ब्लॉगजगत के मुक्तिबोध....ऐसा ही खिताब दिया था रविजी ने...सही है....!!

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  2. @बेजी,
    मुक्तिबोध एंड गॉड नोज़ व्‍हाट एल्‍स.. ओह, बेजी, रियली?..
    शर्म से गड़ जाऊं कहीं? या गिरा ही रहूं?

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  3. गिरे रहिये या उठे रहिये……हर हाल लिखते रहिये……

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