Tuesday, February 12, 2008

साइनाथ, साइनाथ..

पता नहीं हिंदी में वह दिन कभी आयेगा जब समाज के अलग-अलग क्षेत्रों की चिंतायें, तत्‍संबंधी सुझाव व उस क्षेत्र में सूरज की (या जिसकी भी) किरणें ब्‍लॉग पर एक जगह संकलित होंगी. माने शिक्षा संबंधी चिंताओं की खोज में व्‍यक्ति निकले और वह एक जगह मिल जायें. ऊर्जा की स्थिति क्‍या है, या भारत में कृषि संबंधी इश्‍यूज़ क्‍या हैं, या क्षेत्रवार ग्रामीण तरक़्क़ी (या नरक) का ग्राफ किस तरह का है- जैसे विषयवार संकलन. थोक में एक जगह. या चलिए, एक जगह नहीं, चार जगह. अभी तो सच्‍चाई यह है कि.. करीना कपूर को गूगल सर्च में डालिए, पंद्रह हजार नतीजे मिलते हैं. पी साइनाथ को डालने पर कितना मिलता है वह इतना हास्‍यास्‍पद है कि मैं नहीं बताऊंगा; और जो मिलता है उसमें ‘पी’ के साथ भड़ास का यह लिंक भी घुसा चला आता है कि कैसे ‘जमकर दारु पी’.. जाने दीजिए, सच्‍चाई क्‍या है वह आप जेनुइनली जानना चाहते हैं तो आप भी जान ही रहे होंगे.

एनिवे, मैं अलग-अलग क्षेत्रों के सूचना-संकलनों की बात कर रहा था. वह कब होगा (सचमुच कभी होगा ही, यह भी कौन जानता है?), कैसे होगा; उसे करने का समय व साधन लोग कैसे जुटायेंगे- सब बड़े उलझे, टेढ़े प्रश्‍न हैं. इसलिए भी ज़्यादा हैं क्‍योंकि लगन व काम की एकाग्रता जैसे लक्षणों के हिंदी की दुनिया में बहुत दर्शन नहीं होते. हिंदी के इतने सारे पत्रकार गरीब घरों से आते हैं, मगर शायद ही अबतक हुआ है कि किसी ने साइनाथ जैसे फोकस्‍ड, महत्‍वाकांक्षी काम को अंजाम दिया हो. या उनके पास अपने विषय पर विस्‍तार से कहने को इतना-इतना कुछ हो. क्‍यों नहीं है? इसीलिए कि अपने विषय से ज़्यादा ताज़ा-ताज़ा अमीरी देख रहा पत्रकार फ़ि‍लहाल यप्‍पी अमीरी देखते हुए ही सुखी है? विषय को देखता भी है तो सिर्फ़ अदाबाजी की नाटकीय अदाओं की तर्ज़ पर देखता है? वास्‍तविक सच्‍चाई क्‍या है यह तो उनकी आत्‍मा ही ज़्यादा ढंग से जानती होगी. मैं जो जानता हूं वह यह चिंता है कि ‘एवरीबडी लव्‍स अ गुड ड्रॉट’ जैसा पाठ हिंदी के पास नहीं, न उसे मुहैय्या करवाने की वैसी शिद्दत से बेचैनी (मैं साइनाथ की किताब के आनन्‍द स्‍वरुप वर्मा द्वारा किये हिंदी अनुवाद 'तीसरी फसल' की बात नहीं कर रहा. वह तो प्रकाशकीय धंधा है)..

6 comments:

  1. यह किताब खरीदी है. जल्दी ही इसे पढ़ता हूँ.

    ReplyDelete
  2. मुन्ना भाई और सैफ़ की शादी हो रही है.. सचिन और सहेवाग सेन्चुरी लगा रहे हैं.. उस सब के बीच साइनाथ को पढ़ने का धैर्य कहाँ है प्रमोद भाई.. फिर भी बहुत साध के पढ़ा दिये गए लिंक पर साइनाथ के इन्टरव्यू को.. बहुत ज़रूरी है साइनाथ की बात सुनना..

    ReplyDelete
  3. साईनाथ अच्छी हिन्दी बोल लेते हैं ।

    ReplyDelete
  4. सूचना संकलन वाली बात सही है । ब्लॉग में भी ऐसे फोरम्स बनाये जा सकते हैं जो एक विषय पर सूचनायें एकत्रित करे .. कुछ सार्थकता कविता कहानी के परे? आप शुरुआत करेंगे ? हिन्दी की दुनिया में क्या नहीं होता ये सब जानते हैं । इसे बदलेगा कौन ? आप ? हम ? हम सब ..हिन्दी वाले ही न ।

    ReplyDelete
  5. हिन्दी में भी कुछ लोग तो निकलेंगे ही जो इस चिंता को दर कर सकेंगे पी साईंनाथ का काम निर्विवाद है लेकिन यह भी शोर है कि वे अपने लेखों के लिए एक्शन एड जैसी फण्डिंग एंजसियों से पैसे लेते हैं.
    फिर भी उनके काम को कहीं से कम नहीं आंका जा सकता. पी साईंनाथ मुंबई में अपनी मर्सीडीज चलाते हैं तो आंध्र के बसों में भी धक्के खाते हैं.
    उनके जैसे कुछ मिशनरी पत्रकार हैं इसलिए यह बहस भी बची हुई है कि इस देश में आम आदमी नाम का कोई जीव है जो तुम्हारे ताजा खबर को खाकर जिंदा नहीं है.
    साईंनाथ को सबको पढ़ना चाहिए. अगर बेहतर हिन्दी अनुवाद कोई कर रहा हो तो बताइयेगा उसे भी पढ़ेंगे.

    ReplyDelete
  6. वैसे गढ़े मुर्दे उखाड़ने तो नहीं चाहिए... पर क्या मनीष शांडिल्य को आपके इसी लेख से कुछ हमदर्दी हुई या वो बस संजोग है?

    ReplyDelete