Saturday, February 23, 2008

बेसुध ब्‍लॉगिंग..



छुटे हुए पटाखों की तरह
घुल रहे बताशों की तरह

टिप-टिप-टिप औंजाया कीबोर्ड
बहका टिपटिपाया चलता है
बिना-ब्रेक की साइकिल-सा
ढुलकता सरसराया चलता हे

आंख खुलती है कभी बेसुध
चौंककर खुद को तकता है
बहुत बार एक अदद ऑपरेशन
की मेज़ होती है, ढेरों दवाईयां
और एक पुराना घिसा इंजेक्‍शन
जिसकी नली का रसायन
धीमे-धीमे ऊपर चढ़ता है.

2 comments:

  1. आह्ह्ह्ह!!!बेसुधाहट दिख रही है दूर दूर तक..

    साथ ही डर भी लगता है-पुराना घिसा इन्जेक्शन-नो स्टर्लाईजेशन कॉजेज एड्स!! ब्लॉगिंग की सी बीमारी...जान लेवा..

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  2. भालो लिखेछेन !

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