Thursday, February 14, 2008

हम बहस चलायेंगे!.. आइए न, बड़ा मज़ा आएगा..

कितना अच्‍छा लगता है बहस करना. जिन्‍हें नहीं लगता अराजनीतिक हैं भगवारी हैं ब्‍लॉग की दुनिया के पटवारी हैं. हमारी तरह नवल नवरत्‍न सफेद घोड़े नहीं हैं, इंटर कालेज का चुनाव जीते नये इतराये लौंडों की तरह चौड़े नहीं हैं. हमें देखिये न, हमारी बहसों में एक अदा है. चारों ओर के राजनीतिक सूनेपन- बहस ब्‍लूज़ में, ओह, हम ट्रूली बहस बीज़ हैं! ऑर बहस वीनी हैं? सो डिफरेंट फ्रॉम एवरीवन एल्‍ज़, सो क्‍यूट ना? वेरी ब्रूट ना? ओह, वी आर सो अमेजिंग, फ्लाइंग सो हाई, डिड यू नोटिस? कितनी जगह लोग हम पर चर्चा कर रहे हैं, अपने एक क्राईम रिपोर्ट में मनोहर कहानियां तक ने हमको मेंशन किया है- डिड यू नोटिस? डिड यू, डिड यू? ओह, कितना अच्‍छा लगता है बहस करना! गरदन तक हम इस पंक में जंक में धंसे हैं! बहस बहस बहस स्‍ट्रेट मार्च लेफ्ट राईट देन लेफ्ट अगेन ओ वंडरस बहस, ओ माई लव, व्‍यूटि बहस वाइरस ओ ओ ओ!

बहस का हमने एक तरीका और अंदाज़ ईजाद किया है. धौंस व धमाके का, बात रखने, रखाने का. भैया व दादा को बुलाने, उलझाने फिर सात कदम आगे ले जाके उनकी पैंट उतरवाने, चप्‍पलों पिटवाने का. यही हमारी तमीज़ व तहजीब है. गो तमीज़ और तहजीब जैसे लफ़्जों को सजाना और मेहमान को अचक्‍के में चप्‍पलों ठुकवाना हमें बड़ा मनभावन लगता है. और सोचिये तो बुरा क्‍या है? आदमी बड़ा नहीं बहस बड़ी है. और फलाना अख़बार हमें बोल रहा है, ढिमाकी मैगज़ीन तोल रही है तो इसीलिए तो कि बहस खड़ी है? और हमने नहीं ‘जनता’ ने खड़ी की है (जनता शब्‍द हमें कितना तो प्‍यारा है!). हम तो सिर्फ़ मॉडरेट करते हैं. बस कुछ ऐसे हूनर से मैनिपुलेट करते हैं कि हर डेढ़ महीने चार लोग कुछ छूटे हुए बछड़ों की तरह आंगन में दौड़ने लगें. पटपटायें, गिर पड़ें, नाक से धुआं छोड़ने लगें. यह उससे भिड़ जाये, वह उसको पटक दे, ग़दर मच जाये, हम आज की, कल और परसों सबकी पसंद पर छा जायें. फिर किसी को लात लगे, कोई जोकर बन जाये घंटा हमारा क्‍या जाता है? बहस में रंग ऐसे ही थोड़ी आता है? फिर हम कुछ करते कहां हैं? जो करती है जनता करती है- दूध का दूध और पानी का पानी कर देती है. गो अलग बात है कि हमारा कोई पानी पानी नहीं करता. हम यहां इनको उनसे फंसाकर, लड़वाकर अपनी लड़ि‍याहटों की जगहों की खोज में निकल लेते हैं. जहां संवरना हो उसको सेट और जहां स्‍वार्थ न सधे उसे लंगी और बम पलेट कर आते हैं. आप बताइए, न न आप बक ही डालिए, ऐसी कौन सी जगह है जिसे सेटियाया जाना हो और हमने सेट न किया हो? एक नाम सूझता है कोई मथुरा से नरबाना तक? प्रगतिशील नीच से बाल चंदामामा तक? नहीं सूझेगा क्‍योंकि हम सुलझे हुए हैं! इतनी सारी जगहों पे हम छप रहे हैं आप देख रहे हैं? नहीं देख रहे हैं तो फिर आपने क़ायदे से ‘असली’ जनज्‍वार नहीं देखा. असली बहस भगंदर देखने से भी आप रह जा रहे हो. प्‍लीज़, अगली दफा आइए न? शान से आपकी स्‍वागत में हम क़सीदे पढ़ेंगे, खूब-खूब आपसे बुलवायेंगे; ज़रा वक़्त निकल जायेगा तब आपकी चूतड़ पर लात लगायेंगे. हो-हो बड़ा मज़ा आयेगा, आइए न, हम बहस चलायेंगे.

10 comments:

  1. हिन्दी प्रदेश के पढ़े-लिखे वर्ग की अमूल्य ऊर्जा बजाय कुछ सार्थक पढ़ने, लिखने और समझने में इस्तेमाल होने के बेवजह की बहस में व्यर्थ हो रही है.. जिस से किसी को न तो कोई लाभ होता है और न ही कोई रत्ती भर बदलता है.. दोनों तरफ़ के लोग अपनी-अपनी पोज़ीशन्स पर जम के जमे रहते हैं और देखने वाले जूतम पैजार वाले सुर से विषय से ही विमुख हो जाते हैं.. न तो लोग कुछ नया जानते हैं न कुछ नया समझते हैं.. पहले से जानी-समझी अपनी मोटी अवधारणाओं के बल पर एक दूसरे पर वार करते रहने से लोग क्या बदल जाते हैं..?
    जिस तरह से इस देश के हित के लिए लोगों को कविता करना बंद करना चाहिये वैसे ही ऐसी बहसें भी बंद करनी चाहिये जिनके करने वालों का उद्देश्य सामने वाले को ध्वस्त करना है और दूसरों को पतित व अपने को प्रगतिशील सिद्ध कर के अपनी सेटिंग जमाना..
    जी हाँ प्रगतिशीलता का भी एक बाज़ार है.. उस में ठेले लगाने वाले आप को आज कल खूब मिलेंगे..

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  2. "...अच्‍छा लगता है बहस करना. जिन्‍हें नहीं लगता अराजनीतिक हैं भगवारी हैं ब्‍लॉग की दुनिया के पटवारी हैं..."

    आप कितना ही उकसाओ, हड़काओ हम नईं करेंगे बहस... :)

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  3. इस देश के बहसबाज-वाग्वीर,आइदर निठल्ले ऑर सैटिंग-संलग्न,दिल्लिअस्थ, जगहबनाऊ-कानपकाऊ,आदर्शझाड़ू-कपड़ाफाड़ू, कागज़ी-आभासी(प्र)खर बुद्धिजीवियों की बुद्धि की उनकी रुचि के बैंक -- राष्ट्रीयकृत अथवा निजी -- में फ़िक्स डिपोज़िट करवा देनी चाहिए . पांच-सात साल में कै तो डबल हो जाएगी, नहीं तो बास मारने लगेगी और वे खुदई उसे नाबदान में सिरा देंगे .

    बुद्धि की कपाल-क्रिया हो रही है . विमर्श के नाम पर हाफ़बेक्ड -- अधकचरे -- ज्ञान,चुनिन्दा आंकड़ों और निजी अथवा वर्गीय कुंठाओं का वमन हो रहा है.

    राजनीतिज्ञ और बुद्धिजीवी को जब ज्ञान का 'गुचरका' आए तो उसके सामने नहीं बैठना चाहिए .

    'गुचरका' या 'गुचळका' या 'गुचळ्की' शब्द का अर्थ जानने के लिए कृपया सीताराम लालस का शब्दकोश देखें .

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  4. आप की हड़क से अब कौन हड़कता है.
    कोई पत्ता भी कहीं नहीं खड़कता है.

    हम को चार पैसे कमाने है.
    इसलिये ऎड-सैन्स लगाने हैं.

    आप को क्या मालूम आप समाजविरोधी हैं,अज्ञानी है.
    दबे कुचले लोगों का प्रतिनिधि बन हम आह कितने बड़े ज्ञानी हैं.

    चलो जी कोई नही बहस चलाओ जी
    जनता को उल्लू बनाओ जी

    बड़े आये...हुंह ...हद है..

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  5. हमरी मोटी बुद्धि में कछु समझ तो परा है । पर जिसको लात लागय हो वोही बेहतर समझा होगा ।
    वैसे हमहूँ बहस करना चाह्त हैं आप से....आप तैयार हो ?

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  6. ऐसे लहटन चौधरियों के मुँह मत लगिये इन्हें ..दरसल मुँह का पाइल्स है...जो कहीं भी अपना मुंह रगड़ते रहते हैं,इन ब्लॉग के चिल्लरों की मुंह्ज़ोरी मुर्दाबाद ।

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  7. @सुजाता डियर,
    प्‍लीज़, डराओ नहीं.
    बहस करके अब
    सुभो-सुभो सताओ नहीं?

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  8. शुक्रिया प्रमोदजी....सार्थक रहा।
    प्रियंकर जी, कृपापूर्वक लालस जी के शब्दकोश के प्रकाशक का नाम बताएंगे। इसके लिए लालसा बढ़ गई है।

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  9. ये आप भैस चराने की बात करने जा रहे थे ,बहस कहा से आ गई ..वैसे भी राष्ट्रीय स्तर पर बहस भैस चराने जैसी ही होती है.. जिसकी लाठी उसकी भैस को आप जिसकी लाठी उसकी बहस मे काहे तबदील करने मे लगे है जी..और ये लाईने तो बिलकुल भी सभ्य नही है ज़रा वक़्त निकल जायेगा तब आपकी चूतड़ पर लात लगायेंगे
    इसकी जगह आप ज़रा वक़्त निकल जायेगा तब आपकी पिछौटी पर हमारी चमरौधी बिराजैगी भी कह सकते थे ध्यान दे..:)

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  10. बड़े मियां शुभान अल्लाह.....

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