Saturday, February 16, 2008

चिरकुट बिस्‍कुट

ज्ञान व समझ भी सीधे कलकत्‍ते के लड्डू वाला मामला है. खाने की सोचते ही आदमी पछताने लगे (औरत के साथ कोई अलग स्थिति नहीं!), और जिसने नहीं खाया, वह तो रो ही रहा है. नॉलेज, अंडरस्‍टैंडिंग, समझ, शिक्षा- माल, माल और माल खरीदते व सिर्फ़ व सिर्फ़ खुद में लीन रहते अमरीकी लोक मानस में गदहे की लीद हो गई है. वैसे अमरीका को लेकर चिंता करने की ज़रूरत नहीं, दुनिया के बाकी हिस्‍से भी उसी राह चल रहे हैं. हमने तो वैसे भी शिक्षा को हमेशा रोजग़ार पाने का साधन माना है (एक बार वह मिल गई तो सारी शिक्षा हम वहीं घुसा आते हैं जहां से इन द फर्स्‍ट प्‍लेस निकालकर लाये थे! हाथ में उठाकर किताब देखते भी हैं तो महज यह देखने के लिए कि यह हमारा नाम क्‍यों नहीं छाप रही..). हालांकि हमारे यहां अभी यही अपने में बड़ी तक़लीफ़ है कि एक बड़ा तबका अशिक्षित व अनपढ़ छुटा पड़ा है. शिक्षित हो जाये तो शायद समाज में कुछ रोजग़ार पाने लायक हो जाये, समाज में सुधार आ जाएगा उसकी गारंटी नहीं है. क्‍योंकि भ्रष्‍टाचार- जिसके बारे में बात करना व सोचना हमारे सोशल एटिकेट से गायब हो गया है- सबसे ज़्यादा तो इसी शिक्षित तबके में है. किडनी का रैकेट चलानेवाला और निठारी का जल्‍लाद कोई अनपढ़-गंवार लोग नहीं हैं. और इसके साथ यह भी उतना ही सही है कि जो शिक्षित हैं और जल्‍लाद नहीं हैं, वो अपनी हासिल शिक्षा के दोगलई वाले इस्‍तेमाल में बझे हैं. माने उनकी सारी शिक्षा का इकलौता उद्देश्‍य उनके स्‍वयं के करियर को प्रमोट करने में है. तो सवाल ज़रा टेढ़े-मेढ़े हैं. शिक्षा से ज़्यादा समाज किस तरह के मूल्‍य बना रही है (और क्‍यों बना रही है, और उनके बनने से रोकने के तरीके क्‍या होंगे)- सवाल उसके हैं..

ख़ैर, मैं ज़रा बहक गया. वापस अमरीका पर लौटता हूं. खूबसूरत एडोरेबल ‘अमेरिकन आइडल’ ब्‍लोंड केली पिकलर फॉक्‍स के एक गेम शो में भूगोल के अपने बेसिक ‘ज्ञान’ का चिरकुट परिचय दे रही है. वीडियो देखकर अपनी सुबह गुलज़ार करें. ज्ञान के ऐसे परिष्‍कृत संस्‍करणों से अपने यहां के सेलीब्रेटीज़ बहुत अलग होंगे, चिता यह नहीं है. चिंता चिरकुट सेलीब्रेटीज को बिस्‍कुट बनाकर दिन भर कुरकुराते रहने का जो अपने यहां मीडिया में चौबीसों घंटे चलन चला है- असल बिवाय वह है. हम सबके पास कुछ अच्‍छे, स्‍मार्ट शब्‍द हैं. ऑपिनियन और ऑपिनियन देने की अदायें हैं, अपने करियर से परे बा‍त व विचार बनाने की समझ कुछ है? क्‍या और कितनी है अपने अकेले के एकांत में कभी गंभीरता से हम इस पर सोचते हैं? सोचते हुए कोई तस्‍वीर बनती, सामने आती हे? इस लिहाज़ से अमरीकी गंडगोल के गोले से हम बहुत बाहर नहीं हैं. थोड़ा सुज़न जेकॉबी ने सोचा है, थोड़ा आप सोचियेगा.

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