Sunday, February 17, 2008

खैनी खाओगे?



ऐसे ही देर रात की लड़ि‍याहट में एक ट्राई मार रहा हूं. एक पॉडकास्‍ट. ठेल रहा हूं. लहे तो रिसीव कीजिएगा, खामख्‍वाह ठिलियेगा नहीं. पॉडकास्‍ट की शास्‍त्रीयता के स्‍तर का ही खत्‍म होता मैं..

4 comments:

  1. एतना फास्ट पोस्ट कर दिये. :)

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  2. तो ये दिन भी खत्म होता है,अब तो खैनी में भी वो मज़ा नहीं,
    हत्थी छाप, हो चाहे नेवला छाप ,अब तो सब काटने लगे हैं,दिन तो खत्म होता है,पर ये सुरती,खत्म नहीं होती,अच्छा लगा, ऐसे छोटे पहर की बंदिशों पर काम करें अ़च्छा लग रहा है.

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  3. चुकते जा रहे लम्हों को अब खैनी पर टिकाइयेगा ?
    और गणेश जी की तरफ पैर करके सिगरेट जला रहे हैं ? कैसे संस्कार हैं महाराज ?
    अब जैसे भी हैं, बदल तो जाएंगे नहीं , सो बने रहें ऐसे ही।

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  4. अब तक अज़दक पर सबसे अच्छी पोस्ट. उम्मीद है आगे भी इस तरह के पॉडकास्ट सुनने को मिलेंगे. खैनी तो छोट गई है...कहीं फिर न शुरू हो जाए.

    जमे रहिये.

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