Saturday, February 16, 2008

नाली में गोड़ मत बुड़ाइये..



कहे थे नाली में गोर मत धरो
नीचे नाला है. ब्‍लंट है ज़्यादा स्‍टंट
है, हिरहुरिया में कीना हुआ साढ़े तीन
रुपल्‍ली का कगदी लुगदी भाला है.

गोर बचाने की बात नहीं, गोर से ज़्यादा
मुंह मत धरो. मुंह बरो त् थूकके
आगे बर्हो. मरदे, देखते नहीं, पांकी
का गहीर धंसाला है? हिलिर-हिलिर
हैं कुच्‍छ हिलै-हिलै जिनको मजा
आता है. मुंह का ललछौंका अऊर
कांखी का झिरकुट बसाता है. बिलिर-बिलिर
बिलाक कीजियेगा, जी? हगवन को ढांक
कीजियेगा, जी? कि सूंघके सुबही सकारथ?

अरे, कुकुरहांव को एक लात लगाके आगे
बर्हि‍ये. मुंह में पान का सुगंधि अऊर
ज्ञान-गुन ध्‍यान के आगे चलिये.
चलिये, महाराज!

4 comments:

  1. पतन ऑर नो पतन फोटो कन्टेक्स्चुअल है!!

    ReplyDelete
  2. अद्बुत ज्ञान है। चित्र प्रमान है।

    ReplyDelete
  3. बड़ा गंधाई सी रचना हैं,अब आपकी पतनशीलता कुछ गदराई सी लग रही है,थोड़ा भीगे हुए चमरौधा पर भी कुछ लिखिये, कुछ लोगन का कांख बसाने लगा है,अद्भुत है....

    ReplyDelete
  4. का करियेगा जी! इहाँ सही बात मंबे कौन करता है? धरने दीजिए गोर लोगों को नाली में नाईं त हाथ धरना परेगा दुनाली पर.

    ReplyDelete