बैलों का ब्‍लॉग..

10 कमेंट - लजाइये नहीं, टिपियाइये

दैनिक जागरणों व भास्‍करों के प्रसार-विस्‍तार से जिस तरह हिंदी का चिरकुट क्षितिज ज्ञानाभा से दिक् व काल को प्रज्‍जवलित कर रहा है, ओह, समय आ गया है कि ब्‍लॉग विविध व वैभव से अंतर्जाल भी सुलग-सुलगकर जल उठे. कम से कम सुलग तो उठे ही. ये हज़ार फूलों के खिलने का समय है. मन में ऐसे भाव-भार से हमें सक्रिय होना होगा कि बारह-बारह मिनट पर बहार-बयार आती रहे (समाज में बहार न आये कम से कम अंतर्जाल पर तो हम ले आयें? और न ला पायें तो- मेरे जीवन को तो हमेशा से रहा ही है- आपके जीवन को धिक्‍कार है!). नहीं, सोचनेवाली बात है भंगार से लेकर व्‍योपार तक, हिंदीछद्म व हिंदीबम सबके लिए हम जगह निकाल रहे हैं. अरे, औरों की छोड़ि‍ये, नैन मटकाने वालियों तक को कहा ठीक है ज़रा अब हाथ की कलम मटकाके भी हमें मस्‍त करो. बेटियों के पीछे उठते-गिरते बाप मस्‍त हो ही रहे हैं. सस्‍ते शेरों तक का भाव बन रहा है.. तो बैलों का न बनेगा? बनना चाहिए. प्‍यास व भड़ास सबके लिए जगह है, बैलों के बिहाग के लिए नहीं? कोई मतलब है? होनी चाहिए!

सोचनेवाली बात है क्‍या बैलों को भी अपने ब्‍लॉग के लिए लड़ाई लड़नी होगी? क्‍या मताधिकार के लिए मैंने और आपने लड़ाई लड़ी थी? वह ऐसे ही खटिया पर लेटे-लेटे कान व नाक खुजाते हुए मिली थी या नहीं? बिना लड़े पाया मताधिकार हो चाहे मतासीन लोकतंत्र- घर बैठे-बैठे उसे दो कौड़ी का होते देखने की सार्थकता हमने सिद्ध की या नहीं? फिर बैलों का ब्‍लॉग, या गिद्ध का- उसे हम सिद्ध नहीं कर सकेंगे? इतना भी न कर सके फिर हम कैसे, कहां के बैल हुए, महाराज? मेरा तो मानना है बैलों का ही नहीं, सांप-बिच्‍छुओं का भी ब्‍लॉग हो! कि सुबह-सुबह मज़े में छाती पर हाथ बांधे हुए आप ब्‍लॉग में टहलते हुए पहुंचे.. गोड़ पर ससुर वो कर्मनाशा डंक पड़ा कि मुंह से मां की गाली छूटी और हाथ से मुस्कियायी टिप्‍पणी कि गुरु, मस्‍त कर दिया! सोचिये, कितना मज़ा आयेगा? आपको नहीं कम से कम सांप को तो आयेगा? हमेशा आप अपना ही सोचियेगा तो सांप की कौन सोचेगा? देश भी आखिर आपकी सोच रहा है कि सांप की और नाग की सोच रहा है? बावजूद उसके तरक़्क़ी कर रहा है कि नहीं? तो फिर ससुर आप जबर्जस्‍ती चिकचिक करके सुबह-सुबह हमारे मुंह से मां की गाली और बुढ़ौती वाला झाग निकलवाने पर क्‍यों आमादा हैं?..

सोचने की बात के बाद अब समझनेवाली बात है. ज़रा जेनुइनली समझिये, महाराज, बैलों के ब्‍लॉग के सचमुच बड़े फायदे हैं! संगठन में बड़ी ताक़त होती है, ये मैं नहीं पंचतंत्र के ज़माने से कहा जा रहा है. और इतनी मर्तबे कहा जा चुका है कि बेमतलब हो गया है और फिर से कहने की ज़रूरत पड़ रही है. दिल्‍ली के, या आगरा के ही पत्रकारों को देख लीजिए, इसी संगठन के बूत ब्‍लॉगजाल पर इन्‍होंने बाकियों की नाक में- व देह के अन्‍य नाज़ुक रंध्रों में- दम किया हुआ है. इन्‍हीं पत्रकारों का करम था कि मुंबई में पिछले दिनों राज बाबू की चौबीस लोगों की टिल्‍ली पलटन के टिल्‍ली करतब राष्‍ट्रीय महत्‍व की न केवल ख़बर बन गए, बल्कि बने भी रहे! सन् साठ के दशक में जिसे ख़बर बनवाने के लिए बाला बाबू को सत्‍तर मदरासियों की जान लेनी-लिवानी पड़ी थी, बिना एक गिरगिट व गदहे तक को ज़ि‍बह किये राज बाबू को इन पत्रकारों ने राष्‍ट्रीय लाल तिलक व मराठी मानुस का दुशाला दिलवा दिया! तो पत्रकारिता की ताक़त आप देख ही नहीं रहे, अभिभूत हो रहे हैं.. मगर बैलों के संगठन से आप आंख मोड़े रहना चाहते हैं!

बोलिये, यह अच्‍छा लगता है कि कोई आंकड़ा कुमार ही यह गिनाता रहे कि जिन दिनों नेहरु के गोड़ के पास बैठे थे, या नटराज के कांधे के पास.. यह दिख रहा था कि समाज की सत्‍तर नालियों में सात नाली दक्षिणाभिमुख हैं, फिर नागराजू कमीशन के आंकड़ों ने भी वही प्रमाण इंगित व चिन्हित किये. हमने सब देखा फिर गौर से देखते हुए एक अच्‍छी नौकरी पकड़ ली. और पकड़े रहे. मगर इंगित, चिन्हित, बिंबित ठेलते भी रहे. क्‍योंकि सारे सामाजिक बुखार तो आंकड़ा कुमार आंकड़ों की कड़ि‍यों में ही पिरो व पेर के दूर होता देख लेना चाहते हैं. और फिर आंकड़ा व मुस्‍की काटते हुए करियर के पायदान पे ज़रा और ऊपर ठिल जाना चाहते हैं.. तो ठिलने-ठेलने का यह सब सुख सिर्फ़ आंकड़ा रत्‍न ही प्राप्‍त करें? बैल सिर्फ़ बिवाय प्राप्‍त करे?..

सोचने, समझनेवाली के बाद अब देखनेवाली बात है कि आज की पसंद में आप सांप व बिल्लियों को ही ऊपर देखना चाहते हैं कि कुछ हक़ बैलों का भी बनता है? आपका बनता है? कुछ भी.. फ़र्ज? फिर आप किस तरह का बैल हैं? या बैला? बेल्‍ला तो नहीं ही हैं (मगर वह तो पहले ही कहा था)..

(ऊपर फ़ोटो: आपकी उपस्थिति से देखिए, देबाशीष छेड़छाड़ कर रहे हैं)

 
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kewal sach - February 18, 2008 10:15 AM

लगता है आप उनके सबसे बडे हिमायती हैं इसीलिये तो बार बार ब्लोग लिंक देते हैं

Mired Mirage - February 18, 2008 11:10 AM

बैलों के विषय में ग्यान बहुत कम है । कभी बगीचे में नहीं आते । सड़क पर बैल या गाय या भैंस जो भी दिखे हमें डर लगता है । साँपों पर तो हम जल्दी ही लिखने वाले हैं । वे तो बगीचे में, घर में भी आ जाते हैं । बैलों पर आप लिखते रहिये ।
घुघूती बासूती

राघव आलोक - February 18, 2008 11:14 AM

आपके जैसा चम्‍मच आदमी नहीं देखा। एक तरफ अनिल रघुराज, देबाशीष की सहलाने में लगे रहते हैं, दूसरी तरफ प्रत्‍यक्षा, बेजी, सुजाता को सेट करते रहते हैं। बेटियों के ब्‍लॉग पर भी आपको रवीश के ही लिखे का इंतजार रहता है। कब वो टीवी पत्रकार लिखे और आप निर्देशक महोदय टिप्‍पणी करें। सिनेमा-टीवी का अजब सेटिंग राग छेड़ा भाई।

Pramod Singh - February 18, 2008 11:51 AM

@राघवजी आलोकजी,
बड़ी पैनी व पीनी नज़र है, महाराज? एकदम से हमारा सत्‍व-तत्‍व पकड़ लिये? आप कहां सहला रहे हैं? वो जगह हमसे छूटी रह गई हो तो कृपया बतायें, वहां भी हम सहलाने पहुंचें, ऐं?

Pratyaksha - February 18, 2008 12:26 PM

किसने किसको सेट किया ये आलोक जी ने देख लिया । जहाँ नहीं सेट किया वहाँ भी देख लिया । ये तीसरी नज़र कहाँ से ले आये ?
और ब्लॉग की दुनिया में इतने कलछुल , चमचा , हंडिया बिखरे पड़े हैं वहाँ कुछ नहीं दिखा ?

Priyankar - February 18, 2008 2:33 PM

ना जी ! बैल अपना बिहाग ज़रूर छेड़ें . पूरी मंडली के साथ छेड़ें . बल्कि छेड़ रहे हैं . बस थोड़ा सींग कटवा दीजिए. वरना एक दिन वृंदवादन में तबला-नगाड़ा-ढोलक सब फूटा अउर 'जांटी' पर झूलता मिलेगा अउर एक-आध संगतकार घायलावस्था में करुण रस का कौनौ राग आलापता मिलेगा .

आपके ई प्रेमी-प्रशंसकबंधु भाई राघव आलोक जी अउर सत्त्तबादी जी का दिल्ली रहते हैं ? दिल्ली गए अउर उनका सेट नहीं किए सो नाराज़ हैं . अबकी जाइएगा तो ज़रूरै भेटियाइएगा . मेट-माट कर लीजिएगा .

कुछ बूझते हैं सिंघ जी ?

राघव आलोक - February 18, 2008 3:05 PM

जय हो जय हो... पूरी टीम फड़क उठी... जय हो जय हो ब्‍लॉग सेटिंग की... जय हो... हमरी दिल्‍ली जिंदाबाद है...

अनिल रघुराज - February 18, 2008 3:14 PM

बैल तो शेयर मार्केट का बुल दिख रहा है। इसकी कैटेगरी दूसरे बैलों से अलग होनी चाहिए। यानी बैलों के ब्लॉग में अलग-अलग बैलों की श्रेणियां अलग होनी चाहिए। इस सामूहिक ब्लॉग की श्रेणियों में से एक श्रेणी राघव आलोक के लिए अभी से रिजर्व रखी जाए।

vimal verma - February 18, 2008 4:42 PM

राघव आलोक इतना खिसियाये क्यों है? बैलों के साथ रह रह कर क्या हालत हो गई है....इसको कहते हैं बैलिया डाह...

अजित वडनेरकर - February 19, 2008 1:29 AM

विमल भाई का आभार ....नए मुहावरे से परिचित कराने के लिए -बैलिया डाह। क्या बात है।

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