Tuesday, February 19, 2008

वो तेरे प्‍यार का ग़म इक बहाना था सनम..

ये पतनशीलता को लेकर पिछले चार दिनों से जोशो-ख़रोश से जो लड़कियां लड़ि‍याने लगी हैं, और इस जोर से हाथ-पैर चलाने लगी हैं कि बेचारे चंदू को एक हारी हुई सी पोस्‍ट तक लिखनी पड़ी.. सस्‍ता शेर के रहनुमाओं को सस्‍तापन बचाने के डिफ़ेंस में अपना एक घोषणापत्र जारी करना पड़ा!.. और मुझ बेहया का क्‍या.. मैं तो शर्मिंदा हूं ही. जीवन में रोज़ जो आते हैं, हो सकता है वह प्रगतिशीलता लुगदी के मोल के सस्‍ते छापेखाने का पोस्‍टर हो, मगर इसका यह मतलब नहीं हो जाता कि हम छाती पर पतनशीलता का बैज धारकर इतराने लगें! लड़कियां (जिनमें ज़्यादातर बच्‍चों की मां हो गई हैं. कुछ बच्‍चोंवाली बच्चियों की मांएं भी हैं, या होने के रास्‍तों पर हैं!) इतरा ही रही हैं. अपना तो जो आगे करेंगी सो करेंगी, मुझे लजवा रही हैं.. नहीं मालूम था एक ऐसा भी ब्‍लॉगदिन आएगा कि मुझे प्रगति व शील की साज-संभाल में ‘शीलवता’ और प्रगत कुमार बनना होगा! मगर अभी आगे कैसे-कैसे दिन आयेंगे कौन जानता है? मैं तो आज की नहीं जानता कि चप्‍पल किधर लहराकर उड़ेंगे और कल तक और कितने शब्‍दों व अभिव्‍यक्तियों को धोबियापाट मिल चुका होगा! स्‍ट्रेंज टाइम्‍स वी आर लिविंग इन, इज़ंट इट?.. पता नहीं किस अंग्रेज मनीषी ने कब किस समय व संदर्भ में कहा होगा. किसी भी समय व संदर्भ में कहा होता, कहन सही ही ठिल रही होती..

बड़ा ठिला-ठिला सा महसूस हो रहा है. बेमतलब हो रहे शब्‍दों से उखड़कर आदमी कहां जायेगा? (औरतें तो जहां जाना है जा ही रही हैं!) पता नहीं ऐसे में अद्धा पीने आप कहां जाते हैं, मैं तो घबराकर संगीत पीने निकल लेता हूं. कभी-कभी खुद संगीत ठिला हुआ मिलता है तो पीने की जगह उसीको पिला आता हूं! आज भी कुछ वैसे ही ख़तरे पिये-पिघलते दिख (दिख से ज़्यादा सुन) रहे हैं!..

मेरी आवाज़ की मिठास से कयतानो वेलोज़ो को रहा नहीं गया तो पाजी मुझ पर चढ़कर गाने की कोशिश कर रहा है! क्‍या कीजियेगा, ऐसी ही दुष्‍टामियों का बोलबाला है.. दुष्‍ट को मत सुनियेगा. मुझे सुनियेगा. नहीं मैं रुष्‍ट हो जाऊंगा.. और रुष्‍ट हुआ तो घबराहट में सारा परगत कुमारत्‍व भूल फिर पतनशील होऊंगा और बात वहीं चली आयेगी जहां से शुरू हुई थी.. और ऐसा होगा तो अच्‍छा नहीं होगा.. क्‍योंकि बातों को दूर नहीं तो कहीं तक तो जाना ही चाहिए! कम से कम आप ले चलने की कोशिश करें.. बाद में. पहले मुझे सुन लीजिए (दुष्‍ट कयतानो को मत सुनियेगा!)..

9 comments:

  1. बहाना तो चाहे जो हो, पर दिल तो टूट गया।
    ब्लेंडिग कहें या कुछ ओर था बढ़िया। जिंदगी में भी यही चल रहा होता है। ठहरे हुए पानी में बनते हुए अलग-अलग वर्तुल। फैलते हुए , फिर एक दूसरे में समाते हुए । हर वर्तुल का चरित्र सिर्फ गोल होना नहीं हो सकता ....किसी में सुख , किसी में दुख...नवरस ....

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  2. सुबह- सुबह ये सब लिंक देकर कहाँ- कहाँ घुमा लाए ! धन्यवाद ।
    घुघूती बासूती

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  3. जैसे ही कयतानो वेलोज़ो शुर हुआ..बंद कर दिया. अब न रुष्ट होना महाराज!!!

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  4. हमने दुष्ट कयतानो को बिल्कुल नही सुना लेकिन एक बात है आपकी आवाज आपकी पोस्ट से या कह लीजिये पोस्ट की भाषा से बिल्कुल मेल नही खाती। हम तो समझे थे खूसट सी आवाज होगी लेकिन माशाअल्लाह! क्या मधुर सुर में सरगम बांधी आपने। हेहे देखा आपके ब्लोग पोस्ट की तारीफ भी साथ में लपेट ली। ;)

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  5. दिल तो हमारा टूटा और कायतानो का तो टूटा ही होगा ?

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  6. आप तो अच्छे गवैया हैं.. गाते रहें ..झिलाते रहें..

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  7. आवाज़ तो दमदार है..अच्छा लग रहा है कुछ जोड़ने वाला भी गाईये..मिक्सिंग तो बढ़ियाँ किये हैं भाई,कुछ और हो तो सुनाएं....

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  8. ओह ! अब तो कयतानो को स्टेज से गिरा भी दिया ? माईक तो पहले ही छीन लिया था । आपके साथ गाने में तो बड़े खतरे हैं।

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  9. मालिक - गाना बढ़िया रहा - यही बात है फ़रफरी मैं - अगली बार "देखी ज़माने की यारी?" - [ :-)] - मनीष
    (१) वैसे दूसरे लगाते (आपके नाम) तो (शायद) " आपकी इनायतें, आप के ही गम" ? (२) कैलाइडोस्कोप जैसे नजारे हो गए हैं (३) या [मेरे जैसों के लिए - to be clear and to avoid any sort of confusion] कहीं खम्बा है तो कहीं रस्सी है - वंदे मातरम [ :-)]

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