Friday, February 8, 2008

ठंड के भंवर व हिंदी की टूटी कमर..

पता नहीं आमची मुंबई में यह ठंड आ कहां से गई है? और आ जहां से भी गई हो, जा क्‍यों नहीं रही? यह कुछ वैसा ही हास्‍यास्‍पद नहीं हो गया है कि लड़की पाने के मोह में आप शादीरूपी भंवर में घुस जाते हैं, और जल्‍दी ही नशा के हिरन होते ही भंवर में फड़फड़ाने लगते हैं? मगर तबतक आपके साथ भांवर खेल रही लड़की के मन में आपके प्रति ऐसा प्रेम उमड़ने लगता है, और उस प्रेम की कुछ ऐसी तगड़न जकड़न बन जाती है, कि आप लाख भंवर की चूल-चूल हिला लें- भंवर से बाहर नहीं आ पाते? कुछ उसी तरह से हम मुंबई की इस भंवरी ठंड में- और ठंड जो है हममें- भंवर बनी हुई है! पत्‍नी और डॉन के डायलॉग के लेवल की ही नाटकीयता ठेलते हुए मन ही मन फुसफुसा सकते हैं: ठंड मुश्किल ही नहीं नामुमक़ि‍न हो रही है..

हालांकि इच्‍छा तो यह भी हो रही है कि ठंड महारानी ज़रा सामने आ जायें तो उनका झोंटा खींच के वो ख़बर लें कि ससुरी की सात पुश्‍त दुबारा मुंबई की ओर मुंह न फेरें.. मगर फिर यह भी सच्‍चायी है कि यह डायलॉग भी मैं फेंकने के लिए ही फेंक रहा हूं.. क्‍योंकि ठंड महारानी ज़रा क्‍या पूरा ही सामने खड़ी हैं, और मैं हाथ उनके झोंटे पर रखूं ऐसा कहां हो रहा है? हाथ क्‍या मैं तो समूचा देह बचाये, खिड़की का पल्‍ला गिराये, ठंडरानी से जान बचाता कभी यहां कभी वहां भागता फिर रहा हूं!.. और ठंडरानी जो हैं हर जगह वैसे ही पहुंच जा रही हैं, जैसे हिंदी फ़ि‍ल्‍मों में ऐन शादी के फेरों के वक़्त डेढ़ साल के बच्‍चे को गोद में हिलाती कोई जूनियर आर्टिस्‍ट शादी के मंडप में पहुंचकर हिनहिनाती आवाज़ में वही घिसा डायलॉग चीखती है- कि यह शादी नहीं हो सकती!.. कहने का मतलब ठंड आ गई है और जा नहीं रही. जा रही हैं वह इक्‍का-दुक्‍का किताब की दुकानें जो जाने क्‍यों तो इन द फर्स्‍ट प्‍लेस पता नहीं कहां से मुंबई में कभी आ गई थीं.

परसों अभय और मैं पवई में जितेंद्र भाटिया की दुकान वसुन्‍धरा में कुछ हाथ में लिए किताबों के कम डिसकाउंट की शिकायत कर रहे थे, कि इतने में भाटिया जी कहीं से आ रहा हूं कहीं जा रहा हूं के अंदाज़ में पता नहीं कहां से अव‍तरित हुए, सूचित किया कि जल्‍दी ही कम-ज़्यादा किसी भी तरह के डिसकाउंट का झंझट ही न होगा. इसलिए नहीं होगा क्‍योंकि वह दुकान बंद करने जा रहे हैं! अब चूंकि जितेंद्र भाटिया स्‍वयं भी लेखक हैं, पहल के संपादक मंडल में हैं, उनकी पत्‍नी सुधा अरोड़ा भी हिंदी की सक्रिय लेखिका हैं, हिंदी के प्रति उनके ऐसे दुष्‍कर्म की हमने अधिकारभाव से वजह जाननी चाही. लेकिन उनके चेहरे की मुर्दनी का भाव नहीं बदला, न उन्‍होंने हमारे अधिकारभाव को तूल देकर हमें बताने की कोई ज़रूरत समझी. भाटियाजी के चले जाने के बाद काउंटर की मराठी लड़की से ज्ञात हुआ किताबों की बिक्री नहीं होती, दुकान महज़ सजावट है. शाम के पांच बज रहे थे, अभय ने लड़की से सवाल किया- सुबह से कितने ग्राहक आये हैं? लड़की ने बिना किसी सेंटामेंटिलिटी के जवाब दिया- आप लोग दूसरे हो. फिर थोड़ा ठहरकर बोली- कभी-कभी तो पूरे दिन कोई नहीं आता!..

जबकि नेट पर हिंदी की चौतरफा तरक़्क़ी को लेकर हम कूद रहे हैं.. जैसे हमारे बिल्डिंग की सोसायटी है, जीवन के प्रति अतिशय उत्‍साह लेकर कूदती रहती है. मैं कूद क्‍या फुदक भी नहीं पाता; गिरा हुआ, गिरा रहकर, मन ही मन जोर-जोर से तीन तरह की आत्‍माओं के लिए तीन तरह की प्रार्थनाएं बुदबुदाने लगता हूं. और चूंकि हिंदी को लेकर आप अतिशय उत्‍साह दिखाते रहते हैं, घबराकर प्रार्थना अंग्रेजी में अलबलाने लगता हूं:

1. I am a bow in your hands, Lord. Draw me, lest I rot.

2. Do not overdraw me, Lord. I shall break.

3. Overdraw me, Lord, and who cares if I break!
मगर ठंड जा नहीं रही. सोचता हूं अब व्हिस्‍की में बर्फ़ की जगह ऊन की गोलियां डालकर पिऊं?..

2 comments:

  1. मुंबई की भंवरी ठंड की वजह तो समझ में आती है। लेकिन नहीं समझ में आता कि हिंदी की दुर्दशा में सुधार क्यों नहीं आ रहा।

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  2. पिछली वाली पोस्ट बहुत महत्वपूर्ण है। कहकर एकाध जगह और लिंक पड़वा दें। कुछ लोग उसपर कुछ बोलें तो अच्छा रहेगा, शायद मसले से जुड़ी कुछ और बातें भी समझ में आएं।

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