Wednesday, February 20, 2008

अमोस का दिल और दुनिया..

एक चीज़ जो हमारे यहां इफरात में थी वह थी किताबें. एक दीवार से दूसरे दीवार तक ठंसी हुईं, गलियारे और रसोई में, एंट्रेंस और खिड़कियों के सिल पर- हर कहीं वे भरी पड़ी थीं. हजारों किताबें, फ्लैट के हर कोने में. मुझे लगता लोग आते-जाते हों, जन्‍म लेते और मरते हों, मगर किताबों की कभी मौत नहीं होती. जब मैं छोटा था मेरी यही हसरत थी कि किताब की शक्‍ल में बड़ा होऊं. किताबें लिखनेवाला लेखक नहीं. लोग मक्खियों की तरह मर सकते हैं. लेखकों का मरना भी ऐसा खास मुश्किल नहीं. लेकिन किताबों का है: आप कितनी ही तरतीब से उन्‍हें खत्‍म करने की कोशिश करो, इसकी हमेशा गुंजाइश रहती है कि कहीं एक प्रति ज़िंदा बच जाये और किसी दूर-दराज, असामान्‍य-सी जगह की लाइब्रेरी के शेल्‍फ पर सुरक्षित पड़ी रहे.

एक या दो मर्तबा जब कभी ऐसा हुआ कि शबात के मौके पर घर में खाने को पैसे न हों तब मां बाबा की तरफ देखतीं, और बाबा समझ जाते कि क़ुरबानी का क्षण आ गया है और किताबों की अलमारी की ओर पलटते. वह नैतिक आदमी थे, और जानते थे रोटी की जगह किताबों से ऊपर है और बच्‍चे की बेहतरी सब चीज़ों से ऊपर है. मुझे दरवाज़े से बाहर निकलती उनकी झुकी हुई पीठ याद पड़ती है, बांह के नीचे दो या तीन अपने प्‍यारे पोथों को दाबे मेयर साहब की सेकेंडहैंड किताब की दुकान के लिए हड़बड़ी में निकलते कि जल्‍दी से जल्‍दी इस पाप से निजात पायें...

मैं उनकी तक़लीफ़ समझ सकता था. मेरे बाबा का अपनी किताबों से एक बेहद सेंसुअल संबंध था. किताबों को सहलाना, थपथपाना, सूंघना उन्‍हें अच्‍छा लगता. किताबों की संगत में उन्‍हें एक जिस्‍मानी खुशी मिलती: भले दूसरों की किताबें हों, खुद को वह रोक नहीं पाते, आगे जाकर उन्‍हें छू-टटोल लेना उन्‍हें ज़रूरी लगता. और आज की बनिस्‍बत तब किताबें ज़्यादा सैक्‍सी भी थीं: सूंघने, सहलाने, दुलराने के लिए ज़्यादा मुफ़ीद हुआ करती थीं. सुनहले लिखावट वाली थोड़ा रफ़ बाइंडिंग की कुछ खुशबूदार किताबें थीं, जिन्‍हें छूते ही मन ऊपर-नीचे करने लगता; मानो पहुंच से परे किसी अगम्‍य व निजी दुनिया में झांक रहे हों, और आपके छूते ही वह रोमांच और थरथराहट में आंखें खोल उठेगी. फिर गत्‍ते व कपड़ों से बंधी किताबें थीं जिनसे सरेश की अद्भुत सेंसुअस महक उठती. हर किताब की अपनी खास निजी, उत्‍तेजक महक होती. बहुत बार- किसी ढीठ फ्रॉक की तरह- गत्‍तों से कपड़ा अलग हो जाता, तब कपड़े व देह की उन अंधेरी जगहों में झांककर देख लेने व नशीले महक को सूंघने की इच्‍छा पर काबू करना असंभव हो जाता.

बाबा अमूमन एक या दो घंटे पर वापस लौटते. किताबों की जगह भूरे कागज़ी बैग में रोटी, अंडे, चीज़, और कभी-कभी डिब्‍बाबंद मांस होता. लेकिन कभी-कभी क़ुरबानी पर निकले वह वापस लौटते तो होंठों पर एक छोर से दूसरे छोर तक मुस्‍कान तनी होती- अपनी दुलारी किताबों को खोकर लौटे होते, मगर साथ में खाने का कुछ सामान भी न होता. अपनी किताबें वह ज़रूर बेच आये होते, मगर उस कमी की भरपायी उन्‍होंने तत्‍काल दूसरी किताबें खरीदकर कर ली होतीं, क्‍योंकि सेकेंडहैंड किताब की दुकान में किसी अनोखे ख़जाने पर उनकी निगाह पड़ी होती, ऐसा मौका जो जीवन में दुबारा नहीं आता, और खुद पर काबू करना उनके लिए नामुमकिन हो गया होता. मां उन्‍हें माफ़ कर देतीं, और उसी तरह मैं भी. वैसे भी मीठी मकई और आइसक्रीम से अलग मुझे कुछ खाना अच्‍छा न लगता. आमलेट और मांस से तो एकदम नफ़रत थी. ईमानदारी से कहूं तो मुझे तो भूखे मर रहे उन हिंदुस्‍तानी बच्‍चों से रश्‍क होता जिन्‍हें अपने प्‍लेट का सबकुछ खत्‍म करने को कोई उनके सिर पर न सवार रहता.

(इज़राइली लेखक अमोस ओज़ की किताब: प्‍यार व अंधेरे का एक क़ि‍स्‍सा से एक टुकड़ा)

19 comments:

  1. धन्यवाद इसे हम तक पहुचाने के लिये.

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  2. बहुत सुन्दर।
    एक दुनियाँ ऐसी बने जहां किताबों और रोटी में कोई कशमकश न हो।
    और मुझ शाक-पात वाले जीव के हिसाब से न तो जीव की कुरबानी हो न किताब की।

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  3. कल अनिल भाई ने इस किताब का जिक्र किया और आज आपने एक अंश पढ़ा दिया। लगता है बहुत बढ़िया किताब होगी। इस इतवार आर्थर सी. क्लार्क की 'रामा सेकंड' और 'गार्डन
    ऑफ दि रामा' दिखीं क्रॉसवर्ड में। कितने जमाने से इन्हें खोज रहा हूं लेकिन हा हंत, जेब में इतने पैसे ही नहीं थे कि सस्ती वाली भी खरीद सकूं। काउंटर पर बैठे बंदे से कहा कि भइया कुछ जुगाड़ नहीं हो सकता? चाहो तो मेरा मोबाइल रख लो। लेकिन वह नहीं पसीजा। पता नहीं अगले इतवार तक किताबें वहां बचेंगी या नहीं।

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  4. मेरी साँस रुक गई है । इन्हीं किताबों में से कोई एक ...

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  5. मैं ऐसी किताबें नही पढ़ पाता मिलती ही नही यहां!! इसलिए आपका शुक्रगुज़ार हूं कि कम से कम आप पढ़वा तो देते हैं!!
    पता करता हूं अगर मेरे शहर में यह मिले तो हालांकि उम्मीद बहुत ही कम है!!

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  6. जबरदस्त। पूरी किताब अगर उधार मांग लूं तो हफ्ते दस दिन के लिए...

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  7. मार्मिक !

    अमीचाइ,मिशोल और ओज़;हमारी कितनी दूरी है इज़राइली साहित्य से . इन्हें नोबेल नहीं मिला इसलिए ? या फिलिस्तीन के साथ सहानुभूति की वजह से ? या फिर .....

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  8. बहुत बढ़िया. किताबों के बारे में लेखक के बाबा के विचारों को अद्भुत तरीके से लिखा गया है.

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  9. बहुत अच्छी, शुक्रिया। अब अगली बार एक प्रति barnes& noble में कम होगी.

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  10. sahi hai ji, mast item laate ho ap! jhaqqas!

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  11. Amazon par yahee kitaabe kam daam par mil sakatee hai.

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  12. विस्मृतFebruary 21, 2008 at 10:38 AM

    सर जी....अापको थोड़ा late discover kiya....पता नहीं क्यूँ....पहले भी अाया था इस ब्लॉग पर...पर थाह नहीं लगी... एग्रीगेटर्स पर कभी जाता नहीं....तो पता नहीं चला... पिछले एक हफ्ते में अापका लिखा काफी पढ़ा....चीज क्या हो यार....अादत लग गयी है...कहते हो टाइम नहीं है...अौर इतना कुछ पढ़ लिख छोड़ा है...रश्क होता है...ग्लानि से मार डालोगे क्या....पता नहीं अाप कॉम्पलिमेंट की तरह लेंगे या गाली की तरह...पर २ ४ अौर अा जाएँ अाप जैसे तो हमारी पढ़ाई तो चली तेल लेने...

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  13. अद्भुत!
    किताबों को ऎसे देखना..
    प्रमोद जी आभार इस पोस्ट का.. its awesome!

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  14. in kitabo ki khushboo ka apna hi ek alg nsha hai .isme doobte utrate jo dimagi our aatmik sukoon milta hai uski bat hi kuchh our hai .thanks .

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  15. अनुवाद के किहिस है?

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  16. @अभय,
    अनुबाद हमहीं किये रहें, मगर बहुत खुश नाहीं रहें.

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  17. aapko padhte rahe hain.....bahut atyalp blogs hain jahan comment bemani nazar aati hai....apna haal
    bhi 'bismrit ke tarah hai'

    pranam.

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  18. क्या क्या धरा है आपकी अलमारी में जय हो।

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  19. सारे बिखरे मोतियों को समेट कर हमतक पहुँचाने के लिए किन शब्दों में आभार व्यक्त किया जाता है... कभी सीखेंगे तो अज़दक को आभार लिखेंगे...

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