Friday, February 22, 2008

जिनसे मैं थकता हूं..

एक-एक के बारे में बताना शुरू करूं तो लिस्‍ट लंबी हो जायेगी. सुनते-सुनते आप भी लहाश हो जायेंगे.. मगर इस लंबी में जो चुनिंदा हैं उनकी भी फेहरिस्‍त कम छोटी नहीं.. गीता प्रैस से छपकर आयी एक स्‍वस्‍थ आकार-प्रकार वाली पुस्‍तक जितनी वॉल्‍युमिनियस तो हो ही लेगी.. चलिये, गीता प्रैस न सही रीता प्रैस! प्रीत की रीत भी रहेगी, और गीत तो रहेगा ही.. इससे कुछ लोग अनुमान लगा सकते हैं (लगायेंगे ही) कि मैं पहले गीता प्रैस का एजेंट था अब रीता का हूं. नहीं हूं. मैं गीता-रीता का भले होऊं (जो अगर सच्‍चाई हुई तो देर-सबेर मुझे इसकी ख़बर हो ही जायेगी), एजेंट किसी का नहीं.. यह दूसरी बात है कि कुछ लोग मुझे डिटर्जेंट बताने पर तुले हुए हैं, जबकि असलियत है कि आज के फ्री-वर्ल्‍ड में मैं कुछ भी बतवाये-बनाये जाने के खिलाफ़ खड़ा हूं.. और इस संतोष के साथ कि कमअज़कम कुछ ऐसा है जिसके मैं खिलाफ़ हूं और अभीतक खड़ा भी हूं (क्‍योंकि मूलत: तो अपनी प्रकृति लेटवइये की है)!

ओह, फुर्र-फुर्र में देखिए, कहां से फुदकता कहां-कहां और उसके बाद फिर कहां निकल गया? सबसे पहले तो एक यह विषयांतर ही है जिससे मैं बहुत थकता हूं.. पकता भी हूं. एक तरह से दोनों एक ही बात है. और दूसरी तरह से एक ही बात नहीं भी है. माने बहुत बार यह होता है कि थके हुए के साथ-साथ पके हुए भी हो जाते हैं. और फिर बहुत बार के बाद बहुत बार यह भी होने लगता है कि थके हुए थे, धीरे-धीरे उसीमें पकने लगते हैं.. या पके हुए पक रहे थे कि उसीके नीचे कहीं थकान का हंड़ि‍या भी सुलगने लगता है.. माने आप समझ ही रहे होंगे? नहीं समझ रहे, ससुर, तो मैं ज़रूर समझ रहा हूं कि जेनुइनली मुझे उकसाकर आप थकाना चाह रहे हैं.. और न भी चाह रहे होंगे तो यह खेल थोड़ी देर चला तो घबराकर मैं खुदै थकना चालू कर दूंगा..

मगर यह सब फालतू की लता-लतवन हैं, चिल्‍ली-बिल्‍ली थकवन है.. थकान के बटवृक्ष की असल डायरेक्‍टरी नहीं.. वह तो (आपका नहीं) मेरा बैंकवाला स्‍टेटमेंट है.. जो कभी-कभी बैंक से आता है, ज़्यादा मेरे सपनों में ही रहता है (फिर हरमख़ोर निकलकर कहीं जाता नहीं!).. उसके बाद फ़ोन, बिजली और जाने किस-किसका बिल है.. नियम से आये बिना मानता नहीं.. और एक बार दिख गया कि झट उसी क्षण आंखों में रतौंधी उतर जाती है.. इससे अलग और दूसरे बिल हैं जिन्‍हें स्‍वयं तो नहीं देखता मगर वहां से अवतरित हुए हर्षोन्‍मादी वासनाकामी मूषकावतारों को देखकर अपनी गुदगुदाहटों पर काबू नहीं रख पाता.. नतीजतन थकने लगता हूं.. भयोन्‍माद में बाज मर्तबे सटकने भी लगता हूं.. मगर वे बेहद निजी प्रसंग हैं और उन्‍हें सार्वजनिक न करने के लिए क्षमा चाहता हूं! और आप सार्वजनिक करवाने की खामख्‍वाह ज़ि‍द पकड़ि‍येगा तो ससुर, खामख्‍वाह मुझे थकवाइयेगा.. खामख्‍वाह यही सब गंडगोल होगा!..

फिर वैसी किताबों से थकता हूं जो मुझे समझने से इंकार कर देती हैं और परिणामस्‍वरूप मेरी समझ में नहीं आतीं. या वे लोग.. जो भूल जाते हैं एक पहुंचे हुए कलाकार की समझ में आये वाली बातें कैसी करें और नतीजे में मैं थकने, और थोड़ी देर बाद पकने पर मजबूर होने लगता हूं! या वह लड़कियां जो प्रगतिशील बनकर अपनी कमाई तो खाती ही हैं, बोनस में मेरा दिल भी चबाना चाहती हैं.. या सुबह जो बेमतलब रोज़ मुंह बाये आकर खड़ा हो जाता है और मिन-मिन रेंकने लगता है- अब? अब? अब?.. या रात.. जो स्‍वयं नहीं रेंकता मगर गली के सब कुत्‍तों को सक्रिय कर देता है कि मुझे पकाने में अपनी जान झोंक दें.. और इस तरह थकाने में.. कहने का मतलब कोई अंत नहीं है.. मेरे थकने.. या आपके पकने का?

5 comments:

  1. भईये पूरी पोस्ट पढ डाली....हां थक जरूर गया मगर यह पता नहीं चला कि आप लिखना क्या चाह रहे हैं....

    शायद पका कर थकाना चाहते हैं :)

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  2. सरजी क्या पोस्ट लिख मारी है.
    अपन तो पढ़ते-पढ़ते थक भी गए और पक भी गए.
    पर विश्वास मानिए एक नशा सा रहता है आपकी पोस्टों मे जो अपन जैसे थकेले और पकेले को भी अकेले नहीं रहने देता.
    गजब है.

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  3. azdak jee,
    saadar abhivaadan. kamaal kaa manovaigyanik vishleshan kiyaa hai aapne ye sabke saath hota hai shaayad.

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  4. बहुत थक कर, बहुत पक कर, चाय के साथ बैठा हूँ...
    करुँ मैं कौन सी टिप्पणी, इसी ऐंठन में ऐंठा हूँ...
    लिखें और रोज लिखते जायें, यही शुभकामना मेरी..
    समझ जाऊँगा कुछ बतियां, इसी कोशिश में रहता हूँ..

    ...अभी तो समझ ही नहीं आई. :)

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  5. आप भी थकते हैं? कभी ऐसा लगा तो नहीं...:-)

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