Saturday, February 23, 2008

दोस्‍त कहां है?..

सीट की गदराहट में धंसे गाड़ी की स्‍टीयरिंग में फंसे किसने कहा सुखी नहीं, मगर किसी का हाथ अपने हाथ ले लें, निठल्‍ले खुलके हंस लें- ऐसा दोस्‍त कहां है? तंजौर, तेलहाट घूमा हूं, पहाड़ों पर सूरज के उतरने की ढेरों गुलाबी तस्‍वीरें उतारी हैं, चीड़ के जंगलों के गुनगुने अंधेरों से चुपचाप गुज़रा हूं, भावुक होकर देखी है चमकती त्‍वचा, भौंचक रोंये, मगर अंतरंगता में मेरी नज़रों देखता कोई- ऐसा दोस्‍त कहां है? इस तरह की उस तरह की जिस तरह की महफ़ि‍ल हो सकती है, देखी है जो नहीं देखना था वह तक देखी मगर वह छोटी-सी महफ़ि‍ल जिसके उजाले में ज़रा ताप पाते, आत्‍मा की पदचाप- ऐसा दोस्‍त कहां है? घुमक्‍कड़ी, पियक्‍कड़ी, बुझक्‍कड़ी, गढ़ और जाने क्‍या-क्‍या तो कड़ी के बेल्‍ट धारे, सीधे रास्‍ते उल्‍टे गये, उलटके ढेरों वर्ष गुज़ारे, आईने में हड्डि‍यों को गलता देखा, सूनी रातों में खुद को चलता- हाथ आगे बढ़ाके कभी रोक लेता मगर ऐसा दोस्‍त कहां है? प्‍यारी देखी, बेचारी देखी, बल खायी बलिहारी देखी, वह घर देखा जिसे सपनों में देखा था, वह बाहर जिसे अपना कहता, लेकिन ज़रा अपनापे से अपना कह सकूं- ऐसा दोस्‍त कहां है?

13 comments:

  1. ये सब का सब एक साथ???...ऐसी वन विंडो सर्विस अभी उपलब्ध नहीं है दोस्त..पीसेस में ही मिल पायेगा..वरना तो सलाह मात्र है, खोज जारी रखें कि ऐसा दोस्त कहाँ है.

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  2. मिल जाए तो हमें भी बताइगा एकठो पोस्ट ठेल के ! हमारा भी हौसला बढेगा ! क्योंकि खोज तो हम भी रहे हैं न..

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  3. बड़ा मोहक बयान है आप के दुःख का..

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  4. patansheel qisson se zaraa hatke...ye acchha lagaa...

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  5. ऐसा दोस्त स्वयं बन जाएँ किसी का.... तलाश खत्म ...!!

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  6. औरों का ख्याल रखनेवालों के साथ अक्सर ऐसा ही होता है। वैसे, यह बहुत भारी समस्या है। लेकिन अब real world के बजाय virtual world इस समस्या को हल करने का भ्रम तो पैदा कर ही रहा है।

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  7. लेकिन ज़रा अपनापे से अपना कह सकूं- ऐसा दोस्‍त कहां है?
    कहीं है?!
    दोस्त किसी और वेराइटी के भी होते हैं ?!

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  8. किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता....सदियों पहले किसी ने कह दिया था..अब समझ में आ रहा है..अरे एक बात गोरखजी भी तो कह गए हैं
    दु:ख तुम्हें क्या तोड़ेगा

    तुम दु:ख को तोड़ दो

    केवल अपनी आँखें

    औरों के सपनों से

    जोड़ दो..

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  9. @विमल एंड दलबल,
    भइया, आंखें तो हम अपने चश्‍मे से ही जोड़े रखना चाहते हैं, गोड़ भले कहीं और जोड़ लें! फिर मरदे, यह एक मनोलोक है, कौनो आत्‍मस्‍वीकारोक्ति थोड़ी? उसके लिए तो अपने पास गाड़ी, बाड़ी और घरवाली और अपने दिवाले की दरकार होगी! बकिया बाबू उड़नछू तश्‍तरी जी का वन विंडो सर्विस वाला एक्‍सप्रेशन बड़ा चुहलदार है!

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  10. दोस्त की खोज? क्यों भला? खोजने से दोस्त मिलेंगे?

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  11. मिल जाय तो अपन को भी बता दीजियेगा.
    वैसे सबसे सरल रास्ता तो यही लगता है कि अगर उम्मीद छोड़ दें तो दुःख भी कम हो जायेगा.

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  12. कहाँ है ? एक दियासलाई आस पास ढूंढते हैं - जब तक बिजली गुल है और गुल बक बकावली हैं - शुक्रिया [ :-)]- manish

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  13. itni umar ho gayi aur kambakht abhi apne rone-dhone mein hi gafil hai.
    vipin

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