Sunday, February 24, 2008

बल्‍ली की जाणा मैं कौन..



ना मैं सीधा-सच्‍चा फीता, ना मैं अकल का बीता-रीता
ना मैं अच्‍छे बच्‍चे का कलेंडर, ना रुल्‍ली कक्षा का मौन.

ना जब खाना हो तब खाऊं, ना टैम पे देह गिराऊं
सब छत पर तरबूजा खाएं, तरबूजे के छिलके का
छिलके औ’ बीजे का मैं खाऊं दातौन.

ना पापा की अकड़ को खाऊं, ना मम्‍मी की पकड़ में आऊं
ना दूध का गिलास छुऊं, ना सताया प्‍यासा पानी पियूं
छांह में औंधा गिरके पेड़ की चि‍ड़ि‍या से पूछूं हौं हौंन?

ना मैं पेप्‍सी क्रेकर टेकर, न इनकी उनकी उम्‍मीदों का टेंडर
ना मैं गहरा भीम पलासी, ना मैं चहारदीवारी वासी
सतरंगी तागों का मैं उझराया-उझराता सस्‍ता-सा बाबौन?

बल्‍ली की जाणा मैं कौन..
नीचे कैटी मेलुआ का एक गाना है.. बचकाना ही है..

6 comments:

  1. हे हे हे !
    जाणा मैं कौन ?
    नईं?

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  2. आप तो एक की सुना रहे हैं - [चिरायु हों चिरंजीव ]- हमारे तो दो दो हैं और दूसरे का पहले दिन का स्कूल आज चालू हुआ - निकल कर मां को समझाया - "मैं रोया तो था लेकिन मुझे डांठा नहीं गया" - [ भगवान टीचर का भला करें ]- मनीष
    p.s. - [बच्चों के मामा बेजिंग/ पीकिंग में दो साल नौकरी पेशा थे - पूछेंगे *#!@ गिनी क्या?]

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  3. गुड है जी। आजकल आपका यह सहज , सम्प्रेषणीय रूप बहुत भा रहा है हमें। कुंठा भी नहीं होती।

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  4. आपके और चन्दू के आग्रह पर कुछ पुनर्विचार्

    http://swapandarshi.blogspot.com/2008/02/blog-post_21.html

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  5. दादा की कोरछेन ?

    सांद्र अम्ल की जगह तनु अम्ल काहे ठेल रहे हैं . रिएक्शन ठीक नहिएं न हो रहा है .

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  6. बल्ला की जाणा ,मैं कौण...वाह..मेरा प्रिय ....आपने कैसे जाणा, भाई??

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