Wednesday, February 6, 2008

दोपहर के खाने के बाद कुछ गंभीर सवालों से जुत्‍तम-पैजार..

1. ब्‍लॉग शुरू करते वक़्त हमारे दिमाग में कुछ आइडियाज़ अरेंज करने, स्‍व के जिये-अदेखे का साक्षात करने की कुछ उत्‍कट जिजीविषा होती है. चंद महीनों ब्‍लॉग की भाग-दौड़ व रचनात्मकता की कसरतों के बाद ब्‍लॉग शुरू करने का उद्देश्‍य खुद हमें ठीक-ठीक कितना याद रहता है? इसी से जुड़ी दूसरी बात है..

2. ब्‍लॉग के पोस्‍ट के पीछे कोई विचार, कोई चिंता होती है, या टिप्‍पणियों का मोह ही पोस्‍ट के ठेले जाने का मुख्‍य उत्‍प्रेरक तत्‍व होती है? विचार, चिंता पहले है.. या अधिकाधिक टिप्‍पणियों का नयन-सुख?

3. हिंदी ब्‍लॉग की एक सामाजिकता तो है, मगर वह सामाजिक ही है, या आपस की जान-पहचान से ऊपर उसकी कोई तटस्‍थ नागरिकता भी है? विवेकपूर्ण नागरिकता जो उचित-अनुचित पर सही मात्रा में व सही समय पर रियेक्‍ट करती हो? या उसकी नागरिकता परस्‍पर के जेनुइन लिहाज़ की धारणाओं से नियंत्रित- अग्रवाल व चतुर्वेदी समाज की सीमित, सतही अपेक्षाओं व सहूलियतों के पैटर्न पर चलते हैं? चोट तभी चोट समझी व बतायी जाती है जब वह अपने समूह के अग्रवाल व चतुर्वेदी पर हुई हो? वर्ना आंखें मूंदकर ब्‍लॉग-व्‍योपार पूर्ववत सहज-सहज जारी रहता है?

4. अपनी सहज नागरिकता में हम प्रोटेक्‍टेड व सहेजे नहीं जायेंगे? बेटियों का ब्‍लॉग, बेटों व बहिनों का ब्‍लॉग का यूनियनिस्टिक स्‍वर ही हमें कवच व सुरक्षाभाव मुहय्या करवायेगा?..

5. निजी राग-द्वेष, फ़तवे व फ़ैसलेबाजी से अलग सामु‍दायिक हितचिंता में सवालों को एड्रेस करने की भाषा हम सीख व बरत पायेंगे? या ऐसी अपेक्षाओं के ख़्याल से हिंदी ब्‍लॉगजगत का दम फूलने लगेगा?

ओह, खाने के बाद लेटने व लेटे रहने की जगह मैं भी क्‍या बिठा-बिठाके पिलाने लगा! ऐसा न हो कि ऐसी पंक्तियां पढ़कर पैदल चलनेवाले लोग फुटपाथ के एक ओर गिर पड़ें, और गिरे ही रहें. और उसी मात्रा में मुझतक आनेवाली टिप्‍पणियां.. ऐसी किसी दुर्घटना से बचने के लिए एक मार्मिक, अभी-अभी पैदा की एक ताज़ा कविता भी पूंछ की तरह नीचे चिपका रहा हूं. कृपया- मुझे नहीं तो- कविता को अपना प्‍यार देना न भूलियेगा..

मुझको अपने गले लगा लो, ऐ मेरे हमराही
हमको खुद से है प्‍यार कितना ये कैसे बतलाएं
तुम चले जाओगे तो मगर याद बहुत आओगे?
कहीं दीप जले कहीं दिल
कहीं मोड़-मोड़ पर सांप के बिल
तुम नेवला बनकर आओगे नहीं, प्रिये
मुझको बचाओगे नहीं, प्रिये?

8 comments:

  1. क्या दर्द है प्रिये..?
    क्यों दर्द है प्रिये.??
    जीवन गर्द है प्रिये..
    मत सोच इतना..
    खा..पचा.....
    उड़ेल..धकेल..
    नकेल मत कस..
    मत खुरच..
    बचा खुचा दिमाग..
    चतुर बन ..चौपट कर
    बहल..मचल मत..
    संभल..बदल..
    देख..बोल मत..
    चुप रह..
    बस पूछ..
    क्या दर्द है प्रिये??

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  2. हम तो लिखने के लिये लिखते हैं,पर आपकी लिखाई पर मैने भी अभी अभी एक शेर बनाया है
    मैं शायर तो नहीं
    मगर तेरा ब्लॉग देखकर
    शायरी आ गई
    अंदर से कोई बाहर ना आ सके
    बाहर से कोई अंदर ना जा सके
    तेरे ब्लॉग मे फ़ंसकर
    कोई वहीं फ़ंस जाय ऐ विमल

    ऐसे शेर तो मैं बाएं हाथ से लिखता हूँ
    ब्लॉग लिखने के लिये बहुत ज़्यादा दिमाग नहीं लगाता..मुम्बई के इस ठंड में थोड़ी नरम धूप मयस्सर हो जाती है तो सोच के बताता हूँ..

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  3. भोजन करने के पशचात दाईं तरफ करवट लेकर आठ सांस लें, बाईं तरफ करवट लेकर 16 बार श्वसा लें फिर सीधे लेटकर 32 श्वास लें। इससे भोजन ठीक तरह से पचेगा और आपका शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य ठीक रहेगा। खाना खाने के बाद इतना तो नहीं ही पकाएंगे।

    क्या प्रमोद जी आप भी अच्छे भले पतित पति के पाप सुनाते-सुनाते क्या सभी की +*#$%^&& लेने लगते हैं।

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  4. भरे पेट और अलसाए हुए भी इतना गरिष्ठ चिन्तन . का खाया था -- खिचड़ी .

    नहीं ! सच में कई विचारणीय बिंदु हैं जिन पर गम्भीर सोच-विचार बहुत ज़रूरी है . अज़दकीय भाषा में 'गंभीर सवालों से जुत्तम-पैजार' .

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  5. अपनी सहज नागरिकता में हम प्रोटेक्‍टेड व सहेजे नहीं जायेंगे? बेटियों का ब्‍लॉग, बेटों व बहिनों का ब्‍लॉग का यूनियनिस्टिक स्‍वर ही हमें कवच व सुरक्षाभाव मुहय्या करवायेगा?..

    बहुत वाजिब प्रश्न हैं । जवाब जो भी हों आधे अधूरे ही रहेंगे । बेटियों का ब्ळॉग फिलहाल पिताओं का ब्ळॉग ज़्यादा दिखता है । बहन की याद भी कंसर्न का शिफ्ट हो जाना है । ऐसे में जब स्पेस केन्द्रीय स्थिति वाले लोगों में बँट और फैल रहा है वहाँ उनकी नीयत पर लगातार सवाल उठाना और उनकी भाषा को डीकोड करना निहायत ज़रूरी है ।
    आपके सवाल बेशक व्यापक समुदाय को लेकर हैं । ऐसे ब्लॉग और ऐसे समाज ऐसे साहित्य की क्या सामाजिकता सामुदायिकता जिसमे एक वर्ग विशेष के प्रति अनुदारता और कपटता हो ?

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  6. मुझको अपने गले लगा लो, ऐ मेरे हमराही
    हमको खुद से है प्‍यार कितना ये कैसे बतलाएं
    तुम चले जाओगे तो मगर याद बहुत आओगे?
    कहीं दीप जले कहीं दिल
    कहीं मोड़-मोड़ पर सांप के बिल
    तुम नेवला बनकर आओगे नहीं, प्रिये
    मुझको बचाओगे नहीं, प्रिये?

    अद्भुत कविता उविता रच दिए हैं आप....

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  7. गहन सवाल...
    ये चिंतन सब तक पहुंचे!

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