Tuesday, February 26, 2008

ल और द

जिसे नाक तक पानी चला आना कहते हैं इस समय ल की शायद वैसी ही स्थिति है. आईने के बगल से गुज़रते हुए अचानक यक़ीन नहीं होता खुद को ही देख रही है. सिर थामे सोफ़े में निढाल धंस जाती है. इस तरह कब तक चलेगा? उससे नहीं चलेगा! पिछले तीन हफ़्ते से ऑफिस से भाग-भागकर प्रॉपर्टी एजेंट के साथ घर देख रही है. किस उम्‍मीद में देख रही है? किसके लिए देख रही है? वह जो भी करेगी, द उसमें नुक़्स निकालेगा. मगर खुद कुछ नहीं करेगा! घर देखने के लिए उसके पास समय नहीं. जब से नौकरी छुटी है, मुंह लटकाये इस और उस कोने बैठा मिलता है. या गली के बार में पीता. लेकिन घर खोजने के लिए टाइम नहीं है. ल किसी घर को शॉर्टलिस्‍ट करके फ़ैसला लेना चाहे तो उसे रिजेक्‍ट करने के लिए है. दो कमरों के मकान में वे कैसे रहेंगे. मकान जैसा भी हो बिना स्‍टडी वाले घर में द नहीं रह सकता. चिट्ठी-सिट्ठी ही सही, कुछ तो लिखने की आदत बनाये रहे! इस उम्र में अपने लिए एक स्‍टडी मांगना बहुत ज़्यादा मांगना है?..

पिछली दफे ल झल्‍ला के चीख़ी थी- क्‍यों चाहिए स्‍टडी? क्‍या करना है उसे स्‍टडी का? इसलिए कि उसके पिता वाले घर में है? पिता की नकल में उसे ज़िंदगी जीनी है? आखिरी दफे कब उसने कुछ लिखा था? एक चिट्ठी लिखे कितना ज़माना हुआ उसे?..

ऐसे सवालों का द के पास जवाब नहीं होता. नाराज़ होकर फटी आंखों ल को तकता है. या लाल सोफ़े पर पैर पसारे अलबलायी आवाज़ में बुदबुदाता है- क्‍या?..

द के बतख की तरह- क्‍या? क्‍या? क्‍या? सुन-सुनके वह थक गई है. या हर सवाल के जवाब में दारु पीकर घर लौटने की उसकी आदत से. हर चीज़ से, अपने थकने से भी ल इन दिनों थकी हुई है. द के पीने से इतना चिढ़ती है मगर आज अपनी इसी घबराहट की वजह से घर लौटी है- भूख लगी थी कुछ खाया नहीं, लेकिन अकेले बैठे-बैठे रेड वाईन की पूरी बोतल खाली कर दी है.. मन के भीतर बना हुआ मगर गुस्‍सा खाली नहीं हुआ!..

बाहर दरवाज़े पर आवाज़ हुई, फिर द का बेवकूफ़ों सा चेहरा झांकता अंदर दाखिल हुआ- तुम अभी सोयी नहीं? मुझे लगा सो गई होंगी..

ल ने सोचा था आज आग उगलेगी, कुछ बावेला करेगी.. लेकिन तोड़फोड़ का सारा उत्‍साह जाने कहां गायब हो गया.. चुपचाप दीवार तकती रही..

- क्‍या हुआ नींद नहीं आयी?..

- हां, नींद नहीं आयी, द..

- क्‍या?

‘क्‍या?’ सुनते ही ल की इच्‍छा हुई उठकर इस आदमी को तमाचा जड़ दे.. लेकिन तमाचों से अब उनके बीच क्‍या ठीक हो सकता था? माथे पर हाथ फेरते हुए ल ने कहा- सुनो, द.. तुम सुन रहे हो कि एकदम होश नहीं है?

- क्‍यों होश नहीं है? पूरा नहीं है.. लेकिन है.. होश है.. अरे, तुम बैठके वाईन पी रही थी?..

इस बात का क्‍या जवाब हो सकता है? इस आदमी का? जिसके साथ इतने वर्ष गुज़ारे.. कैसे गुज़ारे? जो इतनी अच्‍छी चिट्ठि‍यां लिखता था.. और अब सिर्फ़ शराब पीता और बहकी-बहकी बातें करता है? ल की छाती में एक नंगा ख़ंज़र उतर गया.. और वहीं बना रहा- कुछ तो तुम्‍हारी संगत का असर पड़ेगा.. तुम रोज़ पीते हो, मैं एक दिन नहीं पी सकती?

द हाथ में खाली बोतल लेकर खेलता हंसने लगा- हो हो हो, मैं वहां और तुम यहां..

बैठे-बैठे ल की कनपटी में एकदम से ख़ून दौड़ गया.. और आत्‍मा में गहरे पराजय का भाव. फुसफुसाकर बोली- हम कहां जा रहे हैं, भगवान.. हमारा क्‍या हो रहा है, द?

- क्‍या?

- मेरी बात सुनो.. प्‍लीज़.. तुम यहां सामने बैठो, द और मेरी बात सुनो!..

- इतनी जोर से क्‍यों बोल रही हो?.. मैं सब सुन रहा हूं.. मैं होश में हूं, ल, माई लव..

ल ने गला साफ़ किया, हिम्‍मत करके पूरी मजबूती से बोली- आज मैंने कुछ फ़ैसला किया है.. तुम्‍हारे बारे में.. अपने बारे में..

(एलें रेनें की फ़ि‍ल्‍म 'प्राइवेट फीयर्स इन पब्लिक प्‍लेसेस' देखकर)

6 comments:

  1. इस कहानी के चरित्रों की रेंज बहुत बड़ी है। बहुत सामयिक और दिल को अंदर से छूने का अंदाज़।

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  2. अचानक हाथ से गिलास छूटा और सीढियों से झनझनाता हुआ गिरने लगा...कुछ ऐसा ही महसूस हुआ पढ़कर...!

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  3. अच्छा पीस है लेकिन द के साथ नाइंसाफी सी की गई लगती है। यह कैसी रोशनी है जिसमें एक जगह बिल्कुल ही अंधेरी छूट जाती है? कैमरे की मजबूरी हो तो हो, कलम के साथ ऐसी कौन सी मजबूरी है?

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  4. @चंदू,

    पॉयंट टेकेन, डियर.. बट द माइट ऑलरेडी बी सीइंग अनादर वुमन.. ही माइट बी जेनुइनली अ लोस्‍ट सोल.. अलग-अलग स्थितियों में हम सब होते हैं, नहीं?

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  5. लगता है ल और द के एक दल में रहने के दिन लद गए ।
    घुघूती बासूती

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  6. क्या फ़ैसला लिया? बताया जाये।

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