2/28/08

तारे पता नहीं कहां पर..

पता नहीं रोज़ पोस्‍ट लिखने की ऐसी हड़बड़ क्‍यों लगी रहती है? जबकि टिप्‍पणियों की मत पूछिये, किसी एक लड़की ने अभी तक लव लेटर तक के लिए नहीं पूछा है. लड़की की मां या मौसी ने भी नहीं पूछा! फिर भी रोज़ पोस्‍ट ठेलते रहने का जाने यह कैसा ज़ुनून चढ़ा रहता है. जैसे पोस्‍ट लिखकर हम कुछ उखाड़ लेंगे. जबकि सच्‍चाई है अच्‍छे पोस्‍टों पर चढ़े भी कुछ नहीं उखाड़ पा रहे. ज़्यादा से ज़्यादा हमारा-आपका बिगाड़ रहे हैं. तो उतना तो हम-आप भी कविता और जाने क्‍या-क्‍या सुनाके एक-दूसरे की (ज़्यादा मेरे) नाक में दम किये रहते हैं. लेकिन यही मज़ा है कि बावजूद बेदम होने के रोज़ पोस्‍ट न ठेलो तो मन अकुलाने लगता है. ठिला न जाये तो दोपहर तक आत्‍मा गिड़गिड़ाने लगती है. मानो एलआईसी का इंस्‍टालमेंट देने से रह गया. या बस में चढ़ते ही खिड़की से थूकना. या सिनेमा हॉल में अंधेरा होते ही नाक में उंगली डाल लेने का आह्लादकारी सुख..

नाक में उंगली डाले मन पता नहीं आज कैसा-कैसा तो हो रहा है. माने वही जैसे राहुल गांधी यूपी की सोचके कुछ कांस्टिपेटेड फ़ील करता होगा, मैं हिंदी फ़ि‍ल्‍मों के नामों की सोचकर कर रहा हूं. माने यह ठीक है कि हिंदी फ़ि‍ल्‍मों का कोई तुक नहीं (वैसे भी अपने देश में किस चीज़ का है?) मगर कम से कम फ़ि‍ल्‍मों के नाम का तो हो सकता था? है? अब यही इसी नाम को लीजिए- ‘तारे ज़मीन पर’.. भई, जेनुइनली, क्‍या मतलब है इसका? ज़मीन पर यहां आदमी को रहने, चलने, रेलवे लाइन पर ठीक से बैठकर फारिग होने की जगह नहीं है, आप ऊपर से तारों को डिस्‍प्‍लेस करके ज़मीन पर ठेल रहे हो. अच्‍छा नहीं था तारे वहीं आसमान के स्‍टेटस-को में ठिले-पटाये रहते? कल को आसमान तारों को वापस लेने से मुकर गया तब ससुर, तारे ज़मीन पर, तारे ज़मीन पर करके लड़ि‍या रहे आपके मुंह से हवा छूटेगी? या कहीं और से?.. पता नहीं क्‍या सोचके (या नहीं सोचके) ये हिंदी फ़ि‍ल्‍म वाले रोते-गाते किसी तरह घिसट रहे सिस्‍टम को अपने हाल पर छोड़ते नहीं, उसकी ऐसी-तैसी करते रहते हैं? एक वह फ़ि‍ल्‍म आई थी (आती ही रहती है) क्‍या नाम था- हां, ‘कल हो न हो’! सोचिये ज़रा, कितना प्रोवोकेटिव, स‍वर्सिव शीर्षक है! माने पड़ोस की डिंपल आंटी का रेप करना हो तो पप्‍पू (या मुन्‍ना) आज ही अंजाम दे लें.. कल का कौन जानता है, कल हो न हो?..

या ‘चोर मचाये शोर’!.. अरे, आज तक आपने सुना है कभी कि शोर चोर मचा रहा है? यह सही है कि बाद में सीपीएम बहुत मचाती रही मगर पहले तो नंदीग्राम के दलिद्दर किसान ही थे जो हल्‍ला मचा-मचाके नाम में दम किये हुए थे? या फिर ‘दिलवाले दुल्‍हनिया ले जायेंगे’! व्‍हाट नॉनसेंस? व्‍हाट अ ब्लिस्‍टरिंग बार्नाकल्‍स नॉनसेंस ऑफ अ कैप्‍टेन हैडोकियन प्रोपोर्शन? दिलवाले दुल्‍हनिया लिये जायेंगे तो उंगली भर के कलेजावाले सुधीर भैया या मन्‍नू दादा का व्‍याह घंटा कौन वाली दुलहिन से होगा? बेहद इडियॉटिक और ह्यूजली एंटी सोशल एंड प्रोन टू क्राइम हैं ये फ़ि‍ल्‍मी नाम!

अब इसी नाम को लीजिए- ‘दिल लगाके देखो’. मैं देख रहा था. देख क्‍या रहा था पड़ोस में नर्सरी की टीचर है, देखनेवाली चीज़ है तो उसके साथ बाक़ायदा एक्‍सपेरिमेंट करने लगा था. पहले नर्सरी के बाहर खड़ा होकर सिर्फ़ मुस्‍कराते हुए कर रहा था. एक दो बार गलती से वह भी मुस्‍करा गई तो गरीब का हौसला बढ़ा और मैं नज़दीक पहुंचकर दिल लगाके देखो, दिल लगाके देखो करने लगा! नतीजा वही हुआ जो चिरकुट हिंदी फ़ि‍ल्‍मी नामों के चक्‍कर में पड़कर जीवन खींचने, या फींचने का हो सकता है.. लोकल थाने से एक फ़ोन चला आया. मैंने घबराके पूछा लेकिन बात क्‍या है, सर? तो उधर से जवाब मिला- थाने में आके देखो?

हड़बड़ी में ऐसी ही गड़बड़ी होती है. इसीलिए कहता हूं पोस्‍ट से ज़्यादा कट एंड पेस्‍ट वाले रास्‍ते पर चलो. लेटर्स पर चलना ही है तो मन मारके चलो, मगर लव वाले लेटर पर मत चलो (ये मेरा प्रेमपत्र पढ़के कि तुम नाराज़ न होना, कि तुम मेरी ज़िंदगी हो, कि तुम मेरी बंदगी हो..). अब ये सीधे-सीधे चप्‍पल खानेवाला काम है या नहीं? मैं कहता हूं है.. थाने में पहुंचते ही अभी सब ज़िंदगी और बंदगी पता चल जायेगा! आपमें से कोई आ रहा है मेरे साथ? या आ रही है?..

7 कमेंट:

सुजाता ने कहा...

हा हा हा हा ! मज़ा आया । वैसे चप्पल खाने तो आप अकेले ही जाइये । गाने तो न जाने क्या क्या कहते हैं , अमल करने लगेंगे तो मारे जायेंगे । आप दिल न लगा कर दिमाग ही लगाइये बस!

Shiv Kumar Mishra ने कहा...

बहुत बढ़िया.

लेकिन था ना ना ना ना ......:-)

Tarun ने कहा...

Apni javani ke dino me aap "chand chura ke laya hoon..." gaate rahe, bechar Taare ab tak wait karte rahe lekin jab dekha ye buraoo ab bhi chand nahi lautane wala to aa gaye jameen per.....

bahut khoob

Udan Tashtari ने कहा...

:) हम साथ आ भी जायें तो बहुत भरोसे पर मत रहियेगा.. :)

जोशिम ने कहा...

"चोर मचाए शोर" से "दिलवाले दुल्हनियाँ ले जाएँगे" पर जम्प इज नोटेड - एक अगली आने वाली फ़िल्म का नाम हो सकता है - "तुझे देखा तो ये जाना सनम" [ क्या कहते हैं ?] - बचा थाना, आप आगे चलिए हम पीछे-पीछे हैं, बस मुड़के न देखियेगा [ :-)] - मनीष - [ सलाह - एइसा भद्रलोक फोटुआ लगाएंगे तो LOVE LETTER कवि केशव की इस्थिति में न आएँगे? ]

अजित वडनेरकर ने कहा...

सुबह सुबह घंटाध्वनि से भरी यह पोस्ट बड़ी सुहानी लग रही है।
बाबा मार्क्स गाय करते थे कि - आदमी हूं आदमी से प्यार करता हूं। अब भोपालियों ने उसका रिश्ता नवाबी शौक से जोड़ दिया । कमबख्त होठो पर आते ही पिंपनी तूरुरुरु... तो बजती है पर बोल नहीं निकल पाते ....पता नहीं कौन मामू बाल की खाल निकाल ले....

अनूप शुक्ल ने कहा...

शानदार!