Monday, February 11, 2008

एक पतित पति के नोट्स: दो

घर लौट आया हूं. धूप और सुधा पद्मनाभन के धोखों के बाद लौटने को घर ही होता है. लौट आया हूं और घर में घर लौट आया हूं जैसा खड़े होकर खुद को देख रहा हूं. थोड़ी देर बाद बैठे हुए भी वही देखता रहूंगा. वैसे बाहर भी ऐसा क्‍या ख़ास देख लेता हूं? जो दिखता है बड़े लेबल्‍स के विज्ञापनों का बिलबोर्ड दिखता है. जिसे देखने भर का ही मेरा लेवल है. खरीदने का कहां है? सुधा पद्मनाभन भी बॉस और बॉस के साले के लेवल में अटकी पड़ी है, मेरे लेवल तक कहां उतर रही है? और पत्‍नी के नाम पर जाने जिस तरह की जो जंतु घर में है, उसका जाने कौन-सा तो लेवल है.

इतनी अर्थ-अनर्थ की चिंतायें दिमाग में घूमती हैं (ज़्यादातर अनर्थ की ही) कि कभी-कभी लगता है दिमाग फट जाएगा. जबकि फटता नहीं. खाने के बाद एक छोटी झपकी से तरोताज़ा होकर फिर वही सब ऊटपटांग घूमने लगता है. दौड़ने, उड़ने लगता है जैसा भी कह सकते हैं. ख़ैर, मैं लौट आया हूं. पत्‍नी नहीं लौटी है. वह कहीं जाती ही नहीं तो उसे लौटने की ज़रूरत नहीं रहती. बहुत बार मैं गंभीरता से सोचता हूं यह अपने सोफे से कभी उठती भी है या नहीं. उठती नहीं तो खाना कब बनाती है, फ़ोन पर बात कब करती है (क्‍योंकि घर से सुधा पद्मनाभन को कभी फ़ोन तो मैं करता नहीं, जबकि बिल के पैसे मैं ही भरता हूं!).. क्‍योंकि हमेशा पत्‍नी को- जैसा अभी देख रहा हूं- इसी अवस्‍था में देखता हूं. सामने खुली हुई टीवी, हाथ में रिमोट, और चेहरे पर पुराने ज़माने के त‍पस्वियों जैसी भयानक एकाग्रता!

पत्‍नी को बच्‍चों (मेरे दो बच्‍चे हैं. दोनों मेरे ही हैं) से बहुत प्‍यार है. लेकिन टेलीविज़न के रिमोट से ज़्यादा है. बच्‍चे उसकी गोद में आकर लोटने, लाड़ जताने लगें तो इसका यह मतलब नहीं कि वह रिमोट बगल में फेंककर बच्‍चों के गाल चाटने लगे. नहीं. रिमोट वह उसी तरह से कसकर पकड़ी रहती है जैसे कोई गांववाला कस्‍बे के मेले में हाथ में चप्‍पल चांपे रहता है! पत्‍नी को थाहने के लिए दो-तीन मर्तबे मैंने खेल भी किये हैं. मसलन उससे दो हाथ की दूरी पर पासबुक और चेकबुक खोलकर बैठ गया हूं कि देखूं, अब रिमोट छोड़कर मेरे कंधे से सटी लाड़ जताने आती है कि नहीं. आती हरामख़ोर हर बार है, लेकिन रिमोट उसी तरह चांपे रहती है!

मैं आकर कमरे के बीचों-बीच खड़ा हो गया हूं मगर अब भी उसकी आंखें वहीं हैं जहां मेरे आने के पहले टंगी होंगी! ऐसे में कभी-कभी लगता है अच्‍छा होता बाहर धोखों के धूल में ही धंसा रहता, घर लौटकर क्‍यों चला आया हूं? यह स्‍त्री क्‍या सचमुच मेरी स्‍त्री है. इस घर में दो बच्‍चे हैं, वे मेरे ही हैं? मैंने ही उन्‍हें पैदा किया है? (पैदा तो इसी कमबख़्त ने किया है, मगर उत्‍प्रेरक व सर्विस-प्रोवाइडर मैं ही हूं?).. इस तरह से घर लौटकर अच्‍छा नहीं लगता.. दिमाग में कील गड़ने लगते हैं. और गड़ते रहते हैं..

(फ़ोटो उड़ाना इंस्‍पायर करने के लिए बेजी का आभार)

5 comments:

  1. रब्बा खैर करे……

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  2. अब बस यही एक कमी रह गई थी

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  3. चलिये , फोटो कहाँ से उडाते हैं स्रोत तो पता चला ...

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  4. mere khayal se ye title jyada sahi rehta:

    एक पति के पतित नोट्स: दो

    आती हरामख़ोर हर बार है, लेकिन रिमोट उसी तरह चांपे रहती है
    aapbhi kuch kam nahi lagte

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  5. ये तो वाकई बहुत पतित पति है ! और वाह क्या पतिता पत्नी ..

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