आबादी और अकाल..
दुनिया की प्रकट, दबी सच्चाइयों के बारे में हम अपनी धारणा कैसे बनाते हैं? अपने पढ़े, सुने-गुने गये अंदाज़, अनुमानों से; अख़बार, मीडिया में सर्कुलेटेड दो कौड़िया सामान्यीकरणों से?.. क्या स्त्रोत होता है हमारी समझ, ऑपिनियन बनाने का? या बाहर का कुछ नहीं, हमारा आंतरिक ज्ञान का आलोक ही हमारी समझ दीप्त करता चलता है? मुझे स्वयं भी नहीं मालूम. बहुत सारे मसले हैं जिन्हें लेकर असमंजस में रहता हूं, काफी बार एक धुरी से दूसरी धुरी तक का चक्कर मार लेता हूं.. फिर भी लगता है बात ठीक से पल्ले नहीं पड़ी.. मसले पर एक राय है लेकिन वह ठीक-ठीक क्या है, अभी वर्कआउट नहीं हुआ..
अब जैसे आबादी का ही मसला लीजिए. बड़ा मसला है. अपने यहां भी अभी एक-डेढ़ जेनरेशन पहले तक घर में छह और सात बच्चों का पैदा होना आम बात थी, अब किसी घर में तीन भी पैदा हो जायें तो उस परिवार को देखकर खौफ़ होता है. एक एंगल उसमें है ही कि बच्चों की जिम्मेदारियों के साथ इतनी पेचिदगियां जुड़ गईं हैं, पूरा सब्जेक्ट आफ़त की रेल लगती है.. मगर बच्चों से अलग आबादी से आमतौर पर हमारी समझ का असोसियेशन भूख, अकाल व बदहाली है. इस विषय पर मुंह खोलते ही समझदार लोग इस नज़रिये से काफी कंविंसिंग लॉजिक ठेलते हैं.. कि आबादी की बहुलता की वजह से भूख का विकराल जिन्न समूची दुनिया को कैसे अपनी गिरफ़्त में ले लेगा.. ले लेगा? भूख और अकाल आबादी से जुड़े हैं या उनके पीछे दूसरे फैक्टर्स काम करते हैं.. यह ऐसा विषय है जिस पर सुसन जॉर्ज पिछले कई दशकों से काम कर रही हैं, ढेरों किताबें लिखी हैं.. क्या कहती हैं सुसन? आइए, आज उन्हीं अवधारणाओं से ज़रा दो-चार होवें..
सुसन का एक मासूम-सा सवाल है आखिर कितनी आबादी ज़्यादा-आबादी है? ज़्यादा किसके कांटेक्स्ट में? किसी उस आदर्श स्तर के कांटेक्स्ट में जहां भूखी रह रही आबादी और खाद्य समेत उपलब्ध स्त्रोतों के बीच एक ‘वाजिब संतुलन’ हो? अहा, ऐसा?.. लेकिन वे कौन लोग हैं जो उपलब्ध स्त्रोतों को सचमुच ‘खा’ रहे हैं? संयुक्त राष्ट्र अमरीका जो दुनिया की आबादी का 6% है, लेकिन उपलब्ध स्त्रोतों का 39% लील रहा है. जितना अमरीका इस्तेमाल करता है, दुनिया के सबसे ज़्यादा गरीब देश उस ऊर्जा का महज 1% इस्तेमाल करते हैं. अमीर मुल्कों की मिली-जुली आबादी (दुनिया का 25%) दुनिया के खाद्य पैदावार की दो-तिहाई सीधे-सीधे खुद हड़प करती है. समूची दुनिया के अनाज का एक तिहाई अकेले इन मुल्कों के जानवरों के पेट में जाता है.
थोड़े और दिलचस्प तथ्य. 1949 के पहले चीन की आबादी लगभग 50 करोड़ थी और संसाधन चंद परिवारों तक सीमित था. अकाल लगभग हर वर्ष की घटना थी. जनवादी क्रांति के उपरांत वह आबादी नाटकीय तरीके से बढ़ी है. खा-खाकर लोग चौड़े भले न हुए हों, भूखों नहीं मर रहे. एक और दिलचस्प बात है. जितनी भारत में है, चीन में महज उसका आधा ही कृषियोग्य भूमि है; कुछ इसी तरह दक्षिणी कोरिया और ताइवान के पास भी इंडोनेशिया या बांग्लादेश की तुलना में आधी ही कृषियोग्य ज़मीन है. तो बांग्लादेश की भूखमरी की और जो भी वजह हो, अधिक आबादी तो कतई नहीं है.
आबादी और भूख के अंतर्संबंध का एक छोटा उदाहरण यह भी: प्रति स्क्वॉयर माइल इंगलैण्ड में आबादी का घनत्व 583 लोग हैं, भारत में 516, हॉलैण्ड में 1117, ब्राजील में 38, बोलीविया में 12, फ्रांस में 251 और चीन में 271.. सोचनेवाली बात है इनमें कौन बहुल और कौन कम आबादी वाले देश हैं.. और क्या वजहें हैं कि बावजूद आबादी की बहुलता के इन ज़्यादा घनत्व वाले मुल्कों में लोग भूखों नहीं मर रहे..
(साभार: फुड फॉर बिगिनर्स, सुसन जार्ज, ऑरियेंट लॉंगमैन प्राइवेट लिमिटेड, 1982)


2 कमेंट:
सचमुच विचारणीय.
ऐसी ही साफ-साफ बातें सामने लाने की ज़रूरत है। वैसे भी गरीबी रेखा से रहनेवाले संसाधन पर कोई बोझ नहीं डालते क्योंकि न तो उन्हें भरपेट खाना मिलता है और न ही सिर के ऊपर छत। बाकी हवा-पानी पर तो कोई पहरा नहीं लगा सकता है। न ही इनसे किसी दूसरे का कुछ घटता है।
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