2/29/08

केत्‍ता मज़ा, केत्‍ता मज़ा..



खड़े, गिरे, ओहो, अरे, बड़ा मज़ा
अब किसको लगा? सूप, चम्‍मच,
कुदाल, खुरपी आगे-आगे,
ऊपर-ऊपर. कोड़ो, गोड़ो,
हल्‍के मोड़ो, तीन का तिरसठ जोड़ो.
अच्‍छा लगा, मीठा लगा?
इन्‍हें खट्टा, उन्‍हें तीता लगा?
जल्‍दी-जल्‍दी, हल्‍दी-हल्‍दी, चूना-चूना.
घेला, दुअन्‍नी और अठन्‍नी
बीना-बीना, लूटे, लिये
इसको मार, उसको पछाड़,
आंगन होंड़, दुमाले से छलंगी मार.
हाय-हाय, हांव-हांव, हुर्र-हुर्र, दुर्र-दुर्र.
अच्‍छा है, अच्‍छा है, गोड़ पे झाड़ा
मुरझाइल आंख में कत्‍था है.
बिलिंग-बिलिंग, टिलिंग-टिलिंग,
घंटी पुरानी है, सबकी सुहानी है.
होय-होय मचल रहे, सब कादो में चल रहे.
कहां चले, होजुर, दोबार नै आइएगा?
मारकिन का बुशर्ट कहीं अऊर बनवाइएगा?
देखिये न, माल केतना चोखा है,
माले नहीं आजू-बाजू सबै अनोखा है.
हें हें हें हो हो हो, पें पें पें पों पों पों.

4 कमेंट:

Mired Mirage ने कहा...

वाह क्या बात है ! कुछ भी समझ ना आया । यह बेसमझों की बेसमझी है !
घुघूती बासूती

Pramod Singh ने कहा...

सही कह रही हैं, घुघूती जी, मैं 'समझदार' हूं, मगर समझ मुझे भी ना आया. लेकिन यही तो है. कुछ समझ में आये, ऐसा महीन है क्‍या?

जोशिम ने कहा...

[खड़े, गिरे, ओहो, अरे, बड़ा मज़ा]
बरस गए यो-हो ये-ही मजा मजा [ :-)] - दू घंटे का दू दिन हुआ -rgds- manish

Sandeep Singh ने कहा...

लग रहा है मनीष जी की कविता पर कमेंट करते और समझाते आप अघा गए थे, इसलिए इस बार खुद ही बानगी पेश कर दी कि गुरू देखो पहले इसे पढ़कर कमेंट करने की मशक्कत झेलो फिर अगली कविता पेलो। लेकिन मनीष जी तो कमेंट भी अपने ही गुदगुदाने वाले अंदाज में कर गए। अब क्या ? क्या ऐगो और बानगी पेश करिएगा ?