Friday, February 15, 2008

तिलकुट झारा संवाद



- तिलकुट खा लिये?

- हं.

- तब्‍ब?

- ...

- अरे, तब्‍ब अऊर कोची है?

- (घबराकर) झारा फिरे हैं!

- कंहवा? कंहवा फिरे हैं, रे गोबर?

- हेने..

- हेने?

- अऊर होने.

- मइय्या गे मइय्या.. एही सीखने का लिए इस्‍कूली जाता है, रे?

- (कन्‍फ्यूजियाये हुए) नै.. इस्‍कूली में सी यू टी कट अऊर डी यू डी डड्डो त् सीखे..

- फिर झारा काहे ला फिरे? एकरा के ‘अन डू’ के ला करेगा?

- हमरा शिच्‍छन ऐसई हुआ है..

- कइसई हुआ है, बोल न रे मुंहचोर!

- ...

- अब बोलता काहे नहीं है रे, फर्रबक?

- (मुंह चुराते हुए) बोलें?

- बोल नै तोरा मुंह में चार चइली ठेलवतई!

- (लड़ि‍याते हुए) हम कट्टो करेंगे अऊर झारो फिरेंगे..

9 comments:

  1. apni chhoti buddhi mein kuchh nahi aaya.

    ReplyDelete
  2. @प्‍यारे भूपेन,
    जितना आया उतना ही आना था. बुद्धि बड़ी रहती तब भी तिलकुट और झारा तिलकुट-झारा ही रहते.

    ReplyDelete
  3. भूपेन भाई के पीछे छुपे बैठा हूँ. :)

    ReplyDelete
  4. @उड़न तश्‍तरी महाराज,
    आपकी ये उड़ि‍याहटें बहुत मानवीय नहीं हैं. कोई डेढ़ कमेंट पा रहा है कोई साढ़े तीन (नैचुरली, मैं अपनी ही कह रहा हूं)- आपको अच्‍छा लग रहा है? इसी बिना पर लोग (माने मैं) आपकी कविताएं पढ़ें-देखेंगे? हद है, हदाहद है!

    ReplyDelete
  5. पतनशील साहित्य में रोज़ नये बिंब जोड़ रहे हैं...

    कैसे कैसे तो तारीफ करें गुरु !!!

    ReplyDelete
  6. तय है पतन. बेजी, पतनशील बनने के लिए आपको बधाई.

    ReplyDelete
  7. प्रमोद भाई, अपन को कल ही आ गया था समझ में। हालांकि बुद्धि का साईज़ नहीं पता , मगर कल ही समझ गए थे इसका अभिप्राय। तिलकुट झारा संवाद ...आनंदम आनंदम।

    ReplyDelete
  8. ये ठीक नहीं 'गलत बात.. अब कोई क्‍या करे.. शिच्‍छा प्रनाली का दोश नहीं बूझियेगा तो कइसे कमवा होयेगा.. कि खाली आगे चलिये आगे.. कहियेगा ?

    ReplyDelete
  9. 'तिलकुट झारा संवाद' जेम्स थर्बर से आगे की लघुआख्यान परम्परा है . जादुई-यथार्थवादी शैली में इनऐनीमेट को ऐनीमेट करना भला लगा .

    ऐसे ऐसे तारीफ़ करें गुरू !!!

    ReplyDelete