Wednesday, February 13, 2008

ओ सजनी, कैसे तोहे सेटियाऊं, कैसे अंकवार भरूं..



कैसे यह मझधार भरूं
अज़दक का विस्‍तार करूं
कहां छुपी हो प्रिय पठकिनी
तोरे करेजवा कैसे वार करूं
कैसे यह पुल पार करूं

फीडबर्नर के सब्‍सक्राइबर बढ़ते नहीं
रीडर फीडर पर तनिको उखड़ते नहीं
वही पचीस-पचास का तांता है
वही मुरचाया फटही छाता है
ससुर हंसता है न रुलाता है
छुरी पे कैसे धार धरूं, सजनी
कैसे यह पुलिया पार करूं

ओ हिन्‍दीयुग्‍म के कालाकांकर
ओ छद्मयुग के माताहारी
ओ दीप्‍त तृप्‍त नयनाभिराम
ओ निर्मोही सुप्‍तहृदय व्‍यभिचारी
कित जाऊं कहां अंकवार भरूं
किस कोने पूजूं तोरे मुखमंदिर
किस महफ़ि‍ल तोरे प्रीत बरूं
ओ बालम, कैसे यह गड़ही पार करूं?

12 comments:

  1. अच्छा...ठीक है।

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  2. एतना काहे आतुर हैं पिया
    अइसन जिनगी भी कऊन जिया
    का मिलेगा हमें अंकवार भरके
    पछतायें हम भी सोलह सिंगार करके

    मझधार भरे के जुगत लगाओ सजना
    खाली झम-झम न बाजा बजाओ सजना
    छाता भी अब मुरझाय गवा
    ई सुनके जियरा घबराय गवा

    अरे पचीस पचास तो मिले है तोहके
    जेके एतनौ न मिले तनी सोचा ओनके
    पुलिया काहे के पार करी
    पुलिया त पार करे बकरी

    रऊआ त हा शेर, समुन्दर पार करीं
    सोझा पानी पार वार करीं
    एक बरही ई समस्या का निपटार करीं
    अऊर आके हमके अकवार भरीं

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  3. आखिर आपने भी पतनशील साहित्य का सृजन प्रारंभ कर ही दिया. अच्छा है, बहुतों के लिये आदर्श स्थापित हो जायेगा. ;)

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  4. अद्धभुत……भाव

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  5. @गुमलाम सलम,


    समस्‍या के जबतक निपटार न करीं

    तबले आके तोहके अंकवार न भरीं?..


    पचीस-पचास पठकैया के बीच एत्‍ता दु:ख?

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  6. सजनी सेटियाते अंकवाराकांक्षी हिंद-युग्मोन्मुखी भावाधिराज-कविराज और तुर्की-ब-तुर्की टिपियाते-पैरोडियाते 'गुमलाम सलम' की जुगलबंदी ऐतिहासिक है .

    ऐसे 'गुमलाम सलम' को तो मंच पर होना चाहिए,नेपथ्य में नहीं .

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  7. क्या गुरू, ऊपर से नीचे देखते रहे पोस्ट नही दिखी। हम सोच ही रहे थे कि बकिया पब्लिक टिप्पयाई कैसे तभी बायें तरफ साईड बार नजर आया जहाँ जाकर पोस्ट लटकी हुई थी।

    अब ये बतायें ये नया स्टाईल है या नया फीचर

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  8. कैसे यह गड़ही पार करूं?

    आह्ह्ह!!!! वेदना के स्वर!!!अद्भुत!!!!!

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  9. @तरुण प्रियवर
    पोस्‍ट वहीं लटकाया था जहां हाथ अब आदतन लटकाय आते हैं. साइड पर हो सकता है घबरा के.. या आपकी छेड़छाड़ से सहम के बेचारी चढ़ गई हो?

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  10. बहुतेही काम का गीत ! सीवन उघडी जा रही है और हमार सभकी बेदना उघरी जा रही है परमोस दा !!कहां हैं सब सजना सजनी लोग ??

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  11. सबै क दर्द अइसनै चोकड़ रहा है।

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  12. वीर तुम बढे चलो
    धीर तुम बढे चलो
    पतनशील साहित्य की
    गडही मे गिरे चलो..:)
    पुल पार भी हो जायेगा
    बस जरा वजन कम करो अपना
    खुद को बकरॊ पे सवार करो..:)

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