Friday, February 1, 2008

आइए, ख़ून में डूब जायें..

टूटे तो हम पहले ही से थे, अनामदास ने एक पोस्‍ट चढ़ायी है उसे पढ़कर बिखर गए हैं. बिखरने के बाद बिखरे हुए ही हैं. बगल में कोई भागवान (या अभागी) भी नहीं कि आंचल में सहेजकर सुई-तागा से हमें जोड़ दे. अब यह हो गया है. बिखरकर चिथड़ा-चिथड़ा होने व बने रहने का रोज़ का किस्‍सा. हालांकि वामपथिक विजयशंकर बाबू चिथड़ों में उझराने की जगह वहां यह टटोलने लगे कि शीर्षक निदा फाज़ली से उड़ाकर अनामदास ने उसे गुमनाम क्‍यों रखा है. यह भी उतना ही आम हो गया है कि दुनिया कुछ समूचेपन में हमारे हाथ में आने की बजाय हमारी तात्‍कालिक, तत्‍क्षणिक टटुलनों में हाथ में सिमटती, कुछ आती ज़्यादा गिरती चलती है. यहां किसी का कसूर नहीं गिना रहा.. सिर्फ़ याद करने की कोशिश कर रहा हूं कि ऐसी हवा बन गई है कि टटोला-टटोलन के रोमांच में हम ऐसे गिरफ़्तार रहते हैं कि दिमाग में बड़े परिदृश्‍य की कल्‍पना तक नहीं बनती.

अलग-अलग वक़्तों में विभिन्‍न सरकारों द्वारा स्‍कूल के टेक्‍स्‍टबुकों की छेड़खानी का ही विषय लीजिए. तत्‍काल विपक्ष थाली बजाने लगता है कि देखिए, सत्‍तापक्ष वाले कैसे शिक्षा, संस्‍कृति, समाज से खिलवाड़ कर रहे हैं. वाजिब बात है ऐसे खिलवाड़ी खिलंदड़ी शिक्षा से सवाल किया ही जाना चाहिए.. मगर इसी बीमारी का एक दूसरा, ज़रा व्‍यापक व विहंगम, पहलू देखें. यह टेलीविज़न धारावाहिकों पर जो पिछले पंद्रह-सत्रह वर्षों से कैसे और किन मूल्‍यों की रेलमपेल मची है, उससे सत्‍ता व विपक्ष में किसी का दम फूलता है? क्‍या दिखा रहे हैं, क्‍यों दिखा रहे हैं, आनेवाले समयों में समाज में सोच व मानस का क्‍या पैमाना सजा रहे हैं- इसकी कोई चिन्‍ता होती है? सामाजिक मंचों पर इस सवाल से कोई सार्वजनिक हस्‍ती शर्म से गिर पड़ता है, ढेर होता है?..

इस छोर पर धारावाहिकों के अप्रतिम मानवीय मूल्‍यों वाली दुकान के उस छोर पर ख़बरिया चैनलों की दूसरी चमकती-सुलगती दुकान है. कभी किसी वक़्त भी टीवी खोलिए, वास्‍तविक जीवन में जितना न होगा इन चैनलों के परदों पर हत्‍या, रेप और ख़ून की होली जलती रहती है. “रेवाड़ी की उस हत्‍यारी मां का पत्‍थरदिल क़ारनामा देखिए जिसने अपने नौ महीने के बच्‍चे को ज़िंदा कुएं में फेंककर मार डाला!” फिर कुएं में डोलती वह नौ महीने के बच्‍चे की लाश.. क्लोज़.. और क्‍लोज़.. अरे, इस गंद को दिखाकर आप हमें समय और समाज के बारे में कौन-सी अनोखी बात बता रहे हो? मां ऐसा कर देती है, बाप बेटी को जाकर बेच आता है.. मगर क्‍यों बेच आता है इसका विवेक आपके वेद प्रकाश काम्‍बोज टाइप न्‍यूज़ आइटम को देखकर कोई कितना क्‍या जान पाता है? इसका कोई सवाल समाज में किसी से करता है? नहीं, यह महत्‍वपूर्ण नहीं. महत्‍वपूर्ण है ध्‍यानाकर्षण की होड़ में कैसे ख़ून और गंद से लथपथ एक से बढ़कर एक फुटेज परदे पर गिराकर दर्शक को अटकाये रखा जाये! मज़ेदार है अपने यहां ख़बरों को खोलने पर यही लगता है कि या तो हम क्रिकेट में ऑस्‍ट्रेलिया को धोने निकले हैं, या आर्थिक तरक़्क़ी की ऐसी व वैसी कुंलाचें मारते हुए जल्‍दी ही अमरीका के सिर पर जाके बैठनेवाले हैं, और बकिया के बचे समय में मांएं अपने नवजात बच्‍चे को या तो कुएं में फेंक रही है, या कोई जल्‍लाद बाप है बेटी के साथ अपना मुंह काला कर रहा है! जो मुंह काला नहीं कर रहा उसके मुंह का क्‍या रंग है इसे देखने, जानने, समझने में हर चीज़ को माल बनाकर सजानेवालों को फ़ुरसत नहीं..

इस चिरकुट प्रवृति की थोड़ी हवा ब्‍लॉगजगत में भी है. ऐसे-ऐसे सनसनीखेज़ शीर्षक पेलो कि आपका पोस्‍ट लहलहाता रहे, भले आदमी की सुबह दहल जाये.. ज़रा सोचनेवाली बात है- समाज में सब रियेलिटी शो हो गया है? अटेंशन ग्रेब करने के लिए हम किसी हद तक गिरते रहें? और अपने आजू-बाजू को गिराते? यह सोचने को फिर कब बैठें कि इन गंदों की नुमायशी सजावट से परे सम्‍मान व विवेक का हम समाज कौन-सा बना रहे हैं..

3 comments:

  1. आपने इस पोस्ट के माध्यम से बड़े ज्वलंत और बहुजन समाज की हित से संबंधित मुद्दे को अच्छे ढंग से प्रस्तुत किया है. वास्तव मे स्थिति विचारनीय होती जा रही है.
    और अब
    शिव कुमार मिश्रा जी की पोस्ट पर मेरे बारे मे की गई आपकी टिपण्णी के सन्दर्भ मे:- (आप चाहे इसे पब्लिश करे या ना करें.)

    @ प्रमोद जी
    महाशय हिन्दी सुधारने की जरुरत तो मुझे है. आप तो निश्चय ही मुझसे ज्यादा पढे लिखे है कुछ मदद कर सकते है तो बताये. पर मेरे कमेन्ट पर आपकी ये झल्लाहट किस चीज की तरफ़ इशारा कर रही है ये तो ब्लॉग जगत मे सब समझ सकते हैं.
    और एक बात जो सोचने की है (अगर आप सोचे तो) आख़िर क्योंकर इस लघु किशन की ऐसा कहने/लिखने की हिम्मत हुई ? क्या इसमे आपका कोई दोष या कोई हाथ नहीं है?
    "मुंह आप जब चाहे बिरा सकते हैं. स्वागत है."

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  2. बहुत सी बार कई बातें सिर के ऊपर से निकल जातीं हैं , क्योंकि किसी विचारधारा की ना होकर केवल विचार धाराओं की तरह बस बहते रहते हैं । यह लेख बहुत अच्छा लगा । आपकी बात से सहमत हूँ । आपने बहुत सी सोचने योग्य बातें उठाई हैं । परन्तु ना तो टी वी के समाचार, ना ही धारावाहिक बैन किये जा सकते हैं तो उपाय क्या है ? या तो कोई उनसे बेहतर परन्तु मन को बाँधे रहने वाले कार्यक्रम बनाए या फिर कोई नया माध्यम । पकी पकाई खाने वाले हम लोग अब अपना मनोरंजन स्वयं तो रचने से रहे ।
    घुघूती बासूती

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  3. प्रमोद जी - फ़रवरी की फसल ग़ज़ब फरफरान लहलहा रही है - हर तरह की छुरी / तलवार / बिन्दु बिन्दु विचार / ठीक ठाक समाचार / कन्कईया के कान / कविता-गीत- गान / दस दिन के छूटे पाठ / कुरते के कोने पकड़ लिए अब - सादर - मनीष [ देर इसलिए कि घर से बाहर और इंटरनेट से परे ]

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