Tuesday, February 19, 2008

शायद..

उनके पास गाड़ी है, ये नयी ले रहे हैं. हमने दाढ़ी खरीदी थी अब मूंछ पर जी रहे हैं. इन्‍हीं अदाओं को चहलते हुए खा रहे पी रहे हैं. कड़वाहट होती है तो एक अंधेरे से सरककर दूसरी में चले आते हैं, घबराकर किताब उठाते हैं. माइक डेविस कहते हैं दुनिया की एक तिहाई आबादी झोपड़पट्टि‍यों में रह रही है- आधे जिसमें से बीस से कम की उम्र के हैं- तनी हुई सांसों से इस ख़बर को भी हम अपनी आत्‍मा के दु:ख में सी रहे हैं. लेखक कहता है अच्‍छा होता किताब होता, इतिहास के अंधेरों से पार पा लेता. मैं शब्‍द, भाषा, अभिव्‍यक्तियों के अंधेरों में उलझा झींकता हूं बड़ा दुश्‍वार है, समय-समाज से कहां पार है. क्‍यों उठते हैं एक साथ इतने ख़याल, सब समझ जान लेने की ऐसी जानलेवा मरोड़ती कचोटती भूख और फिर मुंह में कसैला स्‍वाद कि एक जीवन कितनी बड़ी उम्‍मीद है मगर वही जीवन गदहे की लीद भी है. आंख मलते हैं, रोते हुए हंसते हैं कि शायद सब यूं ही व्‍यर्थ नहीं चला जायेगा. शायद ये हाथ ये आंख, खुद का साथ, सस्‍ती मिठाई और सस्‍ता भात अब भी हमें मतलब देगा. समूची सिम्‍फ़नी न सही, एक उखड़े आलाप में हमें उछालेगा. शायद.

5 comments:

  1. समूची सिम्‍फ़नी न सही, एक उखड़े आलाप में हमें उछालेगा. शायद.


    शायद.......

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  2. शायद ... [कितने अंधेरों से कितना सरक पाएंगे ? गप गप गल्पों की डकार तक निगल जायेंगे.. फिर ?]

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  3. शायद !
    घुघूती बासूती

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  4. कुछ हालात सुधरते लगें तो जीवन के लीदवाची संदर्भ में विशेषण गदहे की जगह घोड़ा कर लेंगे न...!

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