Saturday, March 1, 2008

आइए, गंद में मुंह मारें..

बॉलीवुड और दुनिया के अन्‍य मुल्‍कों की फ़ि‍ल्‍मों में एक मूल फ़र्क यह है कि बॉलीवुड की कहानियों में एक हीरो होता है, एक विलेन, बकिया के सब जूनियर आर्टिस्‍ट होते हैं. कैरेक्‍टर आर्टिस्‍ट होते भी हैं तो उनमें कैरेक्‍टर कम, भेड़-बकरीपना ज़्यादा होता है. फ़ि‍ल्‍म के अलग-अलग प्रसंगों में वे रोने, मरने, इसके या उसके पीछे खड़े होकर दांत चियारने के लिए होते हैं. माने करते वे चाहे जो भी हों, होते भकुए ही हैं. लब्‍बोलुआब यह कि चमड़े के भले होते हों, उनका चरित्र नहीं होता..

तो बॉलीवुड सरितसागर के ज्ञानरत्‍न से धन्‍य भये हमारे समाज के ज्ञानपिपासु ब्‍लॉगसमाज में वही भकुआ बयार इस छोर से उस छोर तक बह रही हो, और गुणीजन- माने भकुआ जूनियर आर्टिस्‍ट- फुदक-फुदककर इसने ये कहा, अच्‍छा? के बाद उसने वो कहा तो फिर अच्‍छा?- के वैचारिक पंजीरियों से पौष्टिकता प्राप्‍त कर रहे हों, तो इसमें किसी को ताज्‍जुब नहीं होना चाहिए.. चुटकुले, भंड़ैती, गालियां, दोगलई के विहंगम विशदगानों से हमारी भारतीय आत्‍मा हमेशा पुलकती रही है, और पुलककर जुड़ा जाती है.. हर तरह के मवाद और किड़ि‍यों की अंगूठी व मुकुट की नौटंकियां जीकर हम हंसते हुए घर लौटते हैं.. हाथ-गोड़ धोकर ‘शुद्ध’ होकर जीमते हुए चरमानंद को प्राप्‍त होते हैं.. अभी थोड़ी देर पहले का मवाद और पेशाब याद नहीं रहता! अगले उन कुछेक घंटों तक वह याद भूली रहती है जब फुदक-फुदककर इसने ये कहा, अच्‍छा? तो उसने क्‍या कहा के खेल में दुबारा फिर बालसुलभ उत्‍साह के साथ शिरकत न करने लगें!..

भंड़ैती और ऊबकाई से आपका मन नहीं भिन्‍नाता? उसे बिना क्लिकियाये, बिना गंद में मुंह डाले ब्‍लॉगसमय सार्थक नहीं होता? आज इसने उसे गाली दी और उसने फिर इसे ऐसा नंगा किया के सिवा सुबह से ब्‍लॉग में कुछ और पढ़ा.. किसी और पाठ की याद है? हिंदी के ब्‍लॉग पर फ़ि‍नलैण्‍ड के बच्‍चों की शिक्षा संबंधी एक मज़ेदार रिपोर्ट छपी थी कितने लोगों की नज़र गयी उस पर? नहीं गई होगी.. इतने क्रियेटिव हाथ-पैर फेंके जा रहे हैं, उसे पढ़ते हुए शिक्षा-टिक्षा के बारे में पढ़ने की किसे फ़ुरसत है!

भौं के बाल नोंचते हुए बल्‍गेरियाइ औरतों का एक शोकगीत चढ़ा रहा हूं..

7 comments:

  1. हमरी नज़र गई थी. न सिर्फ़ गई थी बल्कि ठहरी भी थी. कस्सम से ...:-)

    और ये शोक गीत मत चढ़ाया कीजिये....

    ReplyDelete
  2. आइए, गंद में मुंह मारें..
    मारो जी मारो, रोकता कौन है, जिसका-जिसका मुंह खाली हो, मारै इस गंद में।

    ReplyDelete
  3. aapne desh duniya ka jikra chor diya, usme bhi bahut kam logo ki nazar gayi hogi

    ReplyDelete
  4. मन भिन्नाता है। आप गंद आवाहन गीत लिखिये न एक ठो।

    ReplyDelete
  5. न बहस में मुंह मारना और न ही बहसों की बस्ती में जाना। पक्का। नो कमेंट्स ।

    ReplyDelete
  6. ये सब कुछ दिन चलेगा फ़िर कोई दूसरा खेल शुरू हो जाएगा.. कुछ का काम ही यही है..आप अपना काम करें...गंधाते माहौल पर अपनी बातों की कूंची चलाइये ना महाराज....

    ReplyDelete