Monday, March 3, 2008

फ़ोन का चुप रहने की कुछ भावुक पंक्तियां..




[1]

सब चकाचक है, गुरु!’ के बहले मन की खुशहाली, गोड़ पसारे की ऐंठ और नहाये चेहरे की लाली नहीं है फ़ोन का चुप रहना. उमंग की तरंग में दौड़ते बच्‍चे को अधबीच लोप अंकवार में उछाल लेना नहीं है फ़ोन का चुप रहना. घर से ताज़ा-ताज़ा विदा हुई बेटी के बाद के उजाड़ घर के खालीपन-सा खाली-खाली होता है फ़ोन का चुप रहना. सूने आंगन की सूनी, आवारा हवाओं में किवाड़ों का रह-रहकर हिलना, फिर सूने अचकचाये तने रहना. जाने कैसी काम की बात होंठों पर आते-आते रह जाये जैसे, तकिये में मुंह धंसाये फिर उसे सबके आगे कहने के ख़याल तक से लाज आये और न कहके खटका बना रहे आगे बाट में जाने कौन गड़बड़ आये की तरह सांस में अटका-अटकता रहता है फ़ोन का चुप रहना..

[2]
ऐन ज़रूरत के वक़्त उत्‍साह में हिलगते सवारी गाड़ी रुकवाकर उछलते बैंक पहुंचना औ’ नोटिस पढ़कर ‘वी आर क्‍लोज़्ड टुडे’ चौंक जाने जैसा घबराया होता है फ़ोन का चुप रहना. या उस लड़की की चुप्‍पी की तरह जो मुंह पर चुन्‍नी ढांपे किसी के कंधों पर उंगलियों से अपना नाम लिखती रही, मन ही मन मिस्त्री की डली बनी गलती, हंसती, बहकती और महकती रही. और जिस गुमान के गालीचे पर थिरकती रही वह एक दिन जो गायब हो जाये और वापस दुबारा लौटकर न आये और लड़की की गरदन में कितनी सारी हिचकियां अटकती रहें और फ़ोन अपनी चुप्‍पी में चुप्‍पा थरथराता रहे. बजता तो यह दुनिया कितनी अलहदा होती लेकिन नहीं बज रहा हूं और यह भी दुनिया है के भाव में बिन बजे डसता रहे.. या किसी हंसमुख-सी लड़की का घर से भागकर किसी अजनबी शहर पहुंचना और सब आसरा लुटाकर सन्‍न रह जाना है फ़ोन का चुप रहना.

[3]
फ़ोन चुप होता है तो ढेरों सपने खेत की बालियों, छत के खपड़ों और कुएं की घास में जाकर चुप-दुबक-छुप जाते हैं. मां बार-बार झोला बाहर करती है चप्‍पल निकालती है और अमरूद के पेड़ तक जाकर वापस लौट आती है. धूप में डाली रजाई को सूंघता है कोई आवारा कुत्‍ता और इधर-उधर डगरता गरदन उठाये पेशाब करता है, घर से दौड़कर उसे हांक लगाने नहीं आता कोई जब फ़ोन चुप होता है. फ़ोन के चुप रहने पर बड़की काकी हंसते-हंसते ठहर जाती है, सिर झुकाये धीमे बुदबुदाती है- हम भी कैसी बुद्धू हूं!

[4]
फ़ोन चुप रहता है तो बहुत बार घबराकर फ़ोन के भीतर झांकता हूं कि खराब है क्‍या है इस क़दर चुप क्‍यों है. काम करता है फिर बजता क्‍यों नहीं. या मेरे बजने में वह संगीत नहीं कि ठोढ़ी पर हाथ धरे चार लोगों का नेह जगाये नज़दीक लाये ओह, किसी तरह इस बेग़ैरत की घंटी बजाये. या समाज का घिसा पुराना जोड़-घटाव है कि जो चढ़ नहीं रहे चढ़ा नहीं रहे उनकी घंटी घटती घिसटती चली जाती है, घुट-घुटकर किसी तरह सांस लेती, ज़िंदगी का दाम असफलता का ईनाम लेती है? बाज वक़्त लगता है बस बजेगा अब्‍भी बजेगा मगर खामख़याली साबित होती है, मेरा तना रहना फ़ोन का चुप बने रहना बना रहता है..

6 comments:

  1. वाह !!

    बहुत दिनों बाद ....पहले की तरह ....बेहतरीन!!

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  2. सही है..हम भी फोन को लेके हैरान है...मुआ बोलता क्यों नहीं.

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  3. बहुत सही। अभी बजाते हैं फोन!

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  4. azdak jee,
    aapko padhna hamesha achha lagtaa hai jansatta mein bhee aur yahan bhee magar khushi is baat kee hotee hai ki yahan main ye aapko bataa bhee sakta hoon.

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  5. @झा जी,

    हम 'जनसट्टा' वाला नहीं हूं, ऊ पिचौरी जी हैं, हम सिंघ जी हूं.. कंन्‍फ़ूज़न 'सोर्टियाइल'?

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  6. inspiring - नतमस्तक - इसी का इंतज़ार रहा - दिन फ़िर बीतने लगे ? hello darkness my old friend .. - सादर मनीष [ p.s. - देखिये कमेन्टए में हड़बड़इयाए गए (:-) ]

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