तुम कहोगी..

[1]
तुम हुमसकर नज़दीक आओगी, पूछोगी पूछना चाहती हूं कुछ, पूछ सकती हूं. मैं हंसता माथे के पीछे हाथ बांधकर कहूंगा पूछो-पूछो. तुम कहोगी छोड़ो, जाने दो, मेरे मन की बात है, तुम कहोगे कहां-कहां से खोदकर बात लाती है, बेवजह सिर खाती है. मैं चेहरे पर मचलने का बच्चों-सी मासूमियत चढ़ाऊंगा अरे, यह कौन बात हुई, बात उठाकर दबाती हो, उठाया है तो अब निपटा ही डालो, चलो, पता नहीं क्या वहम है अंदर बाहर निकालो. तुम कहोगी खामख़्वाह बुरा मान जाऊंगा, बैठे-बिठाये बेमतलब का झंझट, गुम्मा मुंह फुलाऊंगा. मैं करवट बदलकर बुरा मानने का चेहरा बनाऊंगा कि बकोगी भी कि बस लच्छे बुनती रहोगी. तुम कहोगी ठीक है, नज़दीक आओ, एक बात बताओ.. अब भी तुम्हारे अंतर्तम को मुझसे रोशनी मिलती है? कितनी मिलती है, अब भी बचा है तुम्हारी बेचैनियों में मेरा ‘मिस्टीक’ कितना बचा है, बताओ न! मैं कसमसाकर, तुमसे ज़्यादा खुद से नज़रें बचाकर कहूंगा- क्या?
[2]
कितनी बार कितनी-कितनी बार हम फिर उसी अंधेरे में आकर खड़े होंगे जिससे बाहर निकलने को हम मिले थे इन द फ़र्स्ट प्लेस. तुम हारकर कहोगी इतना अंधेरा क्यों है, मैं जाने किस घिसी बौद्धिकता में दोहराऊंगा कहां जायेगा इसी में तो बड़े हुए हैं, नींद से बाहर और खिडकियों के परदों पर डोलता रहता है, असल बात यह नहीं कि अंधेरा है. असल बात है तुम उस अंधेरे में कैसे अपनी रोशनी तैयार करती हो, कितना समझती हो कहां दबी-छुपी है तुम्हारी ताक़त, अपनी बैटरी चार्ज करती हो. तुम कहोगी थक जाती हूं हर बात में तुम्हारी बुद्धि सुनकर. कभी कुछ और सुना नहीं सकते, मेरे हिस्से की थोड़ी बैटरी जला नहीं सकते? मैं अपनी दुलरायी, जंगखायी बुद्धिमानी में हंसने लगूंगा. तुम्हारी खाली आंखें और अपनी हंसी की बेहुदगी देख किसी दिन क्या मालूम शायद उसी क्षण खुद से डरने भी लगूंगा. अंधेरा कहीं नहीं जायेगा और हम दो कमज़ोर जान आखिर इतने बड़े अंधेरे का क्या बिगाड़ लेंगे. कुछ नहीं बिगाड़ेंगे, कहीं कुछ नहीं बदलेगा, बस धीमे-धीमे अंधेरे में ज़रा आगे तक हम साथ चलेंगे.


16 कमेंट:
आपका लिखा पढ़ने के लिए बहुत दिमाग लगाना होता है गुरुवर
वाह....!!
अद्भुत पीस है प्रमोद भाई- कविता का खमीर।
कुछ अलग सा……
कमाल है भाई साहब. गज़ब है. कहीं पहुँचने क्यों नहीं देते आप ?? अजब सा है .... अद्भुत ....
कहीं कुछ नहीं बदलेगा, बस धीमे-धीमे अंधेरे में ज़रा आगे तक हम साथ चलेंगे....कब छ्टेगा ये अंधेरा?अंधेरे में आखिर कब तक चला जा सकता है? अपनी आवाज़ में ये वाला पोस्ट दाग देते तो शायद और अच्छा लगता ।लेकिन ये प्रयास भी सराहनीय है..बहुत खूब।
वाकई जबरदस्त। इसका कॉमन डिनोमिनेटर काफी बड़ा है।
मैं कसमसाकर, तुमसे ज़्यादा खुद से नज़रें बचाकर कहूंगा- क्या?
waaah
कोई मार्मिक गीत की संगति भी, उसके कहने के साथ साथ...
और उसके बाद , तुम कहोगे... भी
तुम लिखोगे..हम पढ़ेंगे..औंधे मूँह..अधलेटे से झूले पर..हुलर हुलर...मसनद हमारा बोझ ढोती...लूँगी से आधा तन ढांपें...चाय सामने बैठी ठंडा रही है...बिना किसी लागलपेट के..हम मुस्करा देंगे..तुम फिर लिखोगे..हम पड़े हैं अर्धमूर्छावस्था में..मर ही न जायें कहीं..नहीं मुस्कराते, जाओ!!! लिखते रहो...हम पढ़ेंगे मगर मुस्करायेंगे नहीं..पूछो..काहे..हम कहेंगे..खुद ही बूझ लो!!! तुम बूझ न पाओगे..हमें मालूम है..इसीलिये तो!!!!!!!!!!!!!!!!!!
शुक्रिया लुंगी से आधा तन ढांपे, झूला झुलैना खेल रहे, उड़न तश्तरी भैया.. शुक्रिया बकिया के दोस्तो.. तुम चाहे जो कहो, हम कहते रहेंगे.. बाज कहां आयेंगे..
कविता की कांति वाला अनूठा गद्य . गद्य को गूंधते समय जब आप 'मोयन' दे देते हैं तो स्वाद अलौकिक हो जाता है . इस तरल-गरल का अब 'एडिक्शन' हो गया है . कोई मादक द्रव्य मिलाते हैं क्या ? वैसे कविता से ज्यादा मादक और तरल क्या हो सकता है . कहीं पढा था कुरान / इस्लाम में इसीलिए गीत-संगीत की मनाही है . सूफ़ियों से नाराज़गी की यह भी एक वज़ह थी . क्या सच में ?
धन्नबाद, पीरहरंकर भैया, आपका सराहन धन्न है, अऊर हमार उलाहन!
मुक्त गद्य के गल्प !
इस पूरी पोस्ट के लिए जो टैग लगाया है वो भी अद्भुत है। आपकी फोमांचू कट मूँछें और सफेद बाल ग़ज़ब ढा रहे हैं। अब क्या हमसे भी कहवाकर रहेंगे कि आपके लिखे के मुरीद हैं !
परात भकोस के रखे हैं पिलेट-उलेट क्या चीज़ है देखिये न - "...असल बात यह नहीं कि अंधेरा है. असल बात है तुम उस अंधेरे में कैसे अपनी रोशनी तैयार करती हो...." - याने झकाझक - सादर - "जहाज के पंछी"
बहुत सुन्दर...!
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