Thursday, March 6, 2008

एक गिरहत्थिन की रात.. और दिन..

“कौन है, जी, उधर? बाड़े के उधर कौन लुकाइल खड़ा है? को है, जवाब काहे नहीं देते?.. बहरी आते हैं कि हम अभी टार्च बालें?”.. कहां से बालेंगे टार्च, बैटरी है?.. मगर कौन दरकार है बैटरी का, टार्च का? कौनो जीव-प्रानी नहीं है ऐसे ही झुट्ठल शंका में पसीना हो रहे हैं.. मालूम नहीं कैसा मुलुक है, यहां का कुत्‍ता सब बात-बेबात शोर करता रहता है! और एक हम सीरियल बुद्धू हैं कि जरा सा कौनो खड़का हो, बेचैन होने लगते हैं.. कोई नहीं है लेकिन खट् से उठके बहरी भागे आये.. कौन उम्‍मीदी का पीछे? हमदर्द का आस में बहरी आये थे?.. कि दर्द जगानेवाला दुश्‍मन?..

कोई तो नहीं है.. सब सूना.. ओर से छोर तक सूनसान! थोड़ा रात चढ़ जाये तो बुझाता है जैसे आदमी जात का यहां वास ही नहीं.. पापाजी के टाइम में रात को कारखाना के गेट पर जैसे भारी ताला लगता था और उसके बाद आजू-बाजू सब तरफ पिन ड्राप साइलेंस वैसी ही खमोशी इहंवो छा जाती है.. अपलोड-डाऊनलोड सब क्‍लोस.. सारा दोकानदार लोग का शटर डाऊन! हम्‍मों औंजा के सोचते हैं बहुत हुआ, अब बत्‍ती बुताके जायें, सोयें तब तब इनबाक्‍स में खटका होता है.. या पता नहीं होता भी है या बस वहम होता है और फिर आंख से नींद एकदम गायब!.. रोज-रोज वही किस्‍सा!.. पता नहीं कैसा बहकल माथा है कि खाना-रांधना फरिया के, कॉलनी के सब घर की तरह हम भी शट डाऊन काहे नहीं कर लेते.. जाने कौची का उम्‍मीद में अटके बैठे रहते हैं.. और अकेली जान बैठे रहते हैं तो चुप्‍पे-चुप्‍पे बैठना कहां होता है?.. फिर वही विजिट, टेंटलेट, एलिमेंट, एचटीएमएल में आंखफोड़ी.. ढंग से कुच्‍छो सपरता नहीं लेकिन मालूम नहीं कौन जिद में आंख उझराये रहते हैं.. और बैठे-बैठे कब दो घड़ी रात निकल जाती है खबर ही नहीं होता! सुबह भारी-भारी माथा लेके उठते हैं तो चैटबाक्‍स के नल के नीचे जाके पता चलता है काम का पानी आया था, आके निकलो गया.. हम आंख पर आंचल ढांपे सोये रहे, हमको खबरो न हुआ!..

जबसे बिला नगरी में गोड़ धरे हैं रोज का यही किस्‍सा है.. सपना, सलहज, सखी, संदेसा कंहियो मन नहीं अटकता.. बिलाक का जांत में आत्‍मा पिराये रहती है! दीन-दुनिया, लइका-लहंगा सब गोड़ का नीचे दाबे पहिले पोस्टिन बाक्‍स में उलझे रहते हैं, अऊर हुआं से निजात मिलता है तो इनबाक्‍स का अंधारा में जाके भटक जाते हैं! पता नहीं एतना मरद-जनाना है कइसे इतना पोस्टिन, कमेंटिन हैंडलिन करता है.. हम तो इतना थोड़े में दुनिया-जहान, मैका-महेसर सबसे कट गए हैं.. लगता है कौनो माता-देवी का श्राप था कि हमको बिलाग का अंधारा कुआं में ढकेल दिहिस हैं.. अऊर अब हाथ का सहारा देके कोई ऊपरियाये वाला नहीं है!..

ओ माताजी, बंदगी करूं, ई बिलाग-प्रेत से मुक्ति दिलाओ, देबीजी?
.. खौरियाये मन झाड़ू लेके जंगला, दुआरी साफ करते हैं.. इच्‍छा होती है बिलाग बिलाक कर दें, एर्गीगेटर से अपने को डिलीट करके मेटा दें कि न रहेगा बांस न बांसरी बजावे का मोह रहेगा.. लेकिन बरतन, झाड़ू, पोंछा, नहाना, माताजी का अगरबत्‍ती जलाके, चूल्‍हा पर दाल का पानी रखते ही मन जाने कैसा तो चंचल होने लगता है.. खुद को समझाये का लाख जतन करें, फयदा कहां होता है? भागके एर्गीगेटर पर तांक-झांक करते हैं, दीवारी का दूसरा बाजू मंजु दीदी को अवाज लगाके आंगन में बुलाते हैं.. दीदी का चेहरा पे मुस्‍की हुआ तो वैसे ही हमारा दिन खराब हो जाता है.. मगर दीदी तो हैं ही इस बास्‍ते कि हरमेशा मुस्‍कराती रहें.. तो आज भी छींट का ब्‍लू साड़ी में मुस्‍की काटती हमको काट रही मिलती हैं.. हम लब खोलें, ओके पहले खुदै जवाब देती हैं कि मालूम है, लवली, आज इनबाक्‍स में केतना कमेंट आया है?..

हमको नहीं जानना है केतना कमेंट आया है! क्‍या करेंगे जानके? मंजु दीदी के कमेंट से हमरे घर का बक्‍सा तो नहीं खनकेगा न? मगर मंजु दीदी को या किसी को हमरी चिंता थोड़े है?.. अपना लदर-बदर में लीन हैं.. मन करता है उसी क्षन दीवारी से हटके भाग जायें, कि मंजु दीदी का भी रोज-रोज का हमको इंजेस्‍सन देने का टार्चर का एगो सबक मिले.. सन्‍न होके पूछे पे मजबूर हो जायें कि कौन बात है, लवली? कौन बात से तोका एत्‍ता हर्टिन कै दिये?.. मगर हम बुरबक अइसा महीन नाटक फैला सकें, इतना सिच्छित कपार कहंवा है हमरे पास!.. मंजु दीदी की मुस्‍की के जवाब में सकुचाये सवाल करते हैं- आप ही सजेसन कीजिये, दीदी.. आज कौन बिसय का पोस्टिन चढ़ायें?..

(ऊपर का चित्र: सुबोध गुप्‍ता का इंस्‍टालेशन)

8 comments:

  1. "जे वोई टर्चवा है जो प्रमोदवा देई गवा था कहत रहा चीन से लाया हू,ससुरी एन टाईम पे धोखा देती है.जे नही हुआ की हुआ से कोई चुम्बक वाला सोने का कोई पट्टा फ़टटा ले आये,जे बिलाग से बचे खातिर कितनी बार बोले है बाबा फ़रीदी के आश्रम मे बिला नागा दूई हफ़्ते झाडू से झडवाय लाओ,मुआ सुनतै नाही है," ये वो लाईन है जो प्रमोद जी छोड कर पोस्ट कर गये ,इन्हे शामिल कर पढे..:)

    ReplyDelete
  2. फिर मंजु दीदी कौनो सजेशन दिहली कि नाही...??न दी हों तो हमारे सामने मुस्कियाये के सकुचाईये..,सकुचाईये-सकुचाईये!! हमहि कौनो सजेसन दे डालेंगे कि कौन बिषय पर लिखना है.

    वैसे, ऐसे मुगालते न पालिये कि न रहेगा बांस न बांसरी बजावे का मोह रहेगा बहुत से दिग्ग्ज यहाँ दूसरों के बांस से बांसरी बजा रहे हैं :) अब एकर फिकर तो आप करिये कि सुर में बजी कि नहीं..उ तो बजा के निकल लिये..कह गये हैं कि कल फिर आऊँगा. झेल पायेंगे कि बांसुरी भी तोड़ने लगेंगे..!! तोड़िये तोड़िये...वो तो दूसरकी ढ़ूंढ़ ही लेंगे.. :)

    बड़ी बिकट दुनिया है भाई इ बिलाग जगत तो!!

    एतन समय और बुद्धि कबहु और कहीं लगाये होते तो हम किसी शहर के कट्ट्लर होते आज... :)

    ReplyDelete
  3. अरे सर, ई बिलाग का बजह से तो अवस्था बहुते ख़राब हो गया है...कौनो रास्ता निकले तो एक पोस्ट ऊ का लिए भी...इनबॉक्स से और लोग का भी दिकतदारी है...:-)

    ReplyDelete
  4. pramod jee ,
    aap bhee holiyaate jaa rahe hain.

    ReplyDelete
  5. हमेशा की तरह बढ़िया पोस्ट है.

    आपकी इस पोस्ट के माध्यम से अपने एक दुःख को व्यक्त करना चाहता हूँ.

    कुछ bloggers की comment moderation की policy से परेशान हूँ. अब कल ही श्री क्रिशन लाल 'क्रिशन' जी की कविता नुमा पोस्ट अब नया हम गीत लिखेंगे पर अपनी टिप्पणी दी थी. पर उन्होंने उसे पोस्ट पर जाने लायक नहीं समझा. आप ही देखिये, क्या कुछ ग़लत कहा था मैंने:

    "कोई पन्द्रह वर्ष पूर्व मेरे दस वर्षीय भतीजे महोदय को अचानक कविता लिखने का शौक़ चर्राया था. आपकी कविता पढ़कर बरबस ही उन कविताओं की याद आ गई. आप भी थोड़ा और प्रयास करें तो उस स्तर को छू सकते हैं."

    हाँ महक जी की प्रशंसा और समीर लाल जी के व्यंग्य को सधन्यवाद प्रकाशित किया है. मैं बड़ा क्षुब्ध हूँ इस घटना से.

    ReplyDelete
  6. @बाबू घोस्‍ट ब्‍लस्‍टरजी,

    मत क्षुब्‍ध रहिये, क्षोभी हो तो हम पर उतार लीजिए, बाबू क्रिशन लाल की बाल-क्रीड़ा गड़बड़ाइये नहीं, वो आपका भात हौंड़ने गए थे? ब्‍लाग पर आदमी बाल-लाल टाइप कविता नहीं लिखेगा तो अरुंधति राय टाइप विचार लिखेगा? और लिखेगा तो उसे पढ़ेगा कौन? दुखी मत होइये, कुंदनलाल सहगल वाला गाना सुन लीजिए, या तलत महमूद वाला.. हम पॉडकास्‍ट पर गाके सुना दें?

    ReplyDelete
  7. आप कहते हैं लोगजन आता नहीं है . इहां तो बहुतै काव्य-प्रेमी /कोबिता रसिक/समीक्षक-आस्वादक 'घोस्ट बस्टर' अउर 'दीवाल पलस्तर' टाइप लोगजन आ रहा है . रंगत बढाएगा कि बसाएगा ?

    बेबिया कुमारी कैमोन हाय ?

    ReplyDelete
  8. यह बिलाग लिखना तो हम जैसे वेल्ले (खाली बैठे, खाली दिमाग ) बंदों का काम है। दाल रोटी कमाना और बिलागिंग भी करना जरा टेढ़ी खीर है. फिर भी लोग पका रहे हैं, स्वादिष्ट पका रहे हैं, बिन जलाए पका रहे हैं। धन्य हैं !
    हमें तो 'टॉर्च बालने' से बचपन कि सुनी हरियाणवी की 'लेटाँ बाल लूँ' याद आ गई।
    इनबॉक्स में जो इन हुआ वह हमारे आउट किये बिन कहीं जाने नहीं वाला। पानी आया था , टपका फिर चला गया तो फिर टपकेगा ही आज नहीं तो कल । पर इन बिलागरों को कौन समझाए !
    घुघूती बासूती

    ReplyDelete