Saturday, March 8, 2008

जब आता है कैसे आता है.. सुख?..



कैसे आता है सुख? आकर किन नज़रों से देखता है? कि उस ज़रा-सा देखने के छोटे पल के दरमियान ही उसकी टेक बदल जाती है? हमारी संगत में घड़ी भर साथ रहने का ख़्याल सुख को शर्मिंदा करता है? किसी कातर, दुखियारिन बिरहन की तरह हम निहोरा करते हैं इतने दिनों बाद दिखे हो.. आज मन थोड़ा थिर हो जाये तब जाना?.. जवाब में सुख ऐसे देखता है मानो ग़लत पते पर आ गया हो!.. जैसे कभी हमसे दिल लगाया था आज उस दिन की याद से शर्मसार होता हो!.. इच्‍छा होती है सुख के मुंह पर तेजाब फेंककर उसे भूल जायें.. हमेशा-हमेशा के लिए!.. जैसे ग़लती उससे नहीं, हमसे हुई थी कि सुख-से बेग़ैरत से कभी दिल लगाया था! मगर भुलना कहां हो पाता है? और दुष्‍ट सुख भी हमेशा-हमेशा के लिए गायब हो जाऊंगा, ऐसे क़रारनामे पर दस्‍तख़त करके कहां जाता है?.. अचक्‍के में, जब एकदम उम्‍मीद न हो, सपने के भीतर सपना के किसी सूराख से झांकता यकबयक सामने चला ही आता है.. कैसे आता है?..



(ल के लिए)

24 comments:

  1. आवाज़, अंदाज़, अल्फाज़.....बहुत खूबसूरत...ल तो आज बहुत खुश हो जायेगा/गी...

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  2. "मुड़ कर देखना मत ..... ऐसे आता है सुख."
    आह साहब. देखें तो सही .. कैसे कैसे आता है सुख.
    और क्या क्या कह गए आप ? क्या क्या याद दिला दिया ? क्या क्या ? क्या नहीं ? वाह ! लेकिन ये क्या कर गए आप ? मुड़ कर पीछे देखने को मजबूर कर दिया .... सुख ?

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  3. व्हाट ए नायाब पीस...एक्सीलेन्ट, सुपर्ब. तनी गोड़ दिखावा हो!!!! धर लिहिल जाई!!!

    वाह..आपसे ऐसे ही स्मूथ और डीप पीसेस की उम्मीद है...बहुत खूब!!

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  4. शर्मिंदा न करें, समीर भैया..

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  5. kya kahoon sukh dukh kaa alag andaaz ki aapkaa, samajh mein nahin aataa. achha laga dil ko chho gaya.

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  6. अजदक की खिड़की से आती आवाज से
    मन को हराभरा कर जाता है सुख.....
    ...देखिये कैसे-कैसे,कब,कहां भेटा जाता है सुख.

    बहुत अच्छा लगा....

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  7. आता रहता है बीच-बीच में के कहीं आदत न हो ले दुःख की.

    वो कह गए हैं न मियां ग़ालिब:

    रंज से खूगर हुआ इन्सान तो मिट जाता है रंज
    मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी के आसां हो गयीं.

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  8. प्रमोद जी ये इतनी मधुर आवाज आप की है?…:)ये तो डरावनी न लगती…:)इस पोस्ट में तो आप की शैली भी एक्दम अलग है पिछ्ली कई पोस्टों से…सुन कर अच्छा लगा। बहुत ही सुन्दर कविता पाठ है, आप ने लिखी है?

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  9. बाप रे सुख के इतने सारे रास्ते... कमाल है अब मुझे पता चल गया कहां से आता है सुख..भाई बढिया रिसाइट किये हैं..अच्छा लगा

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  10. सुख ऐसे ही आता रहे और हम सब ऐसे ही 'सुखाते' रहे...

    बहुत बढ़िया..

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  11. mun thehraa thaa kahin.. ye yahan kyaa sunaa .......ki bas aankh num ho gayi...

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  12. सुख का ये उदास गीत अच्छा लगा ।

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  13. हमारे कम्प्यूटर में तो साउंड कार्ड ही नहीं है और लैपटाप पर नैट इतना धीरे चलता है कि कुछ सुन ही नहीं सकते हैं। अब हम आपकी गंभीर आवाज कैसी सुनें, सीरियसली

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  14. आप सभी साथियों का ऐसे निजी टुकड़े पर स्‍नेह दिखाने का सचमुच शुक्रिया..

    @अनीताजी, डरावनी आवाज़ ही है पता नहीं आप कैसे मधुरता खोज ले रही हैं. और हां, कविता नहीं है, कुछ इम्‍प्रेशंस हैं..

    @नीलिमा भई, हम यहां मन का ख़ून बहा रहे हैं, और आप कंप्‍यूटर पर साउंडकार्ड के न होने का बहाना बता रही हैं? इस बड़ी दुनिया और जयपुर-से बड़े शहर में आपको चार हाथ की दूरी पर एक साउंडकार्ड वाला कंप्‍यूटर न मिला? ओह..

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  15. वाह !वाह !! वाह !!!
    मुट्ठी भर जिंदगी से फिसल गए सुख के ग़म में चूर हम अब जान पाए कि कैसे कैसे आता है सुख...!

    पूरे समय मराठी एलबम "गारवा" की शुरूआती कविता याद आती रही जो शायद पावस पर थी। विषयवस्तु एकदम भिन्न पर आपका लहजा काफी मिलता जुलता लगा। मराठी कविता की रवानी, लय सब कुछ वैसा ही।
    तुलना नहीं, यूं ही एक एहसास था ...सो बताया।
    ये प्रभाती चलती रहे...

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  16. heard it many times, still am not contented...

    rgds,
    GD

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  17. वाह ! क्या बत है , एक्दम मस्त ।

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  18. ठहरे ठहरे लम्हों में, शब्दों के नाजुक धागों से

    बंधा हुआ ऐसे आता है सुख !

    बहुत खूब !!

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  19. आज सारे पाडकास्ट सुने। अद्भुत आनन्द की प्राप्ति हुयी। बहुत सुख मिला।

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  20. सही में - इसको सुनते सुनते आंसू चल गए- अपने आप - कमाल - मनीष

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  21. अचक्‍के में, जब एकदम उम्‍मीद न हो, सपने के भीतर सपना के किसी सूराख से झांकता यकबयक सामने चला ही आता है.. कैसे आता है?
    ***
    कैसे आता है... कौन जाने?
    शायद एक सीमा के अतिक्रमण के बाद रुदन ही स्वयं हास बन जाता है...!

    Podcast seems missing.

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    1. the podcast got lost in the virtual world.. a new recording is here now.. http://azdak.blogspot.in/2013/09/blog-post_5884.html

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