Monday, March 10, 2008

दिन में दिन दिखे ऐसा भी दिन कभी दिखता है, बनवारी?..



- रहते-रहते ऐसी भूख लगती है कि मुंह में गप्‍प कौर न लिये तो बेहोश होके गिर पड़ेंगे ऐसा लगता है.. इत्‍ती भूख क्‍यों लगती है, मां?
बेतरतीब, असुविधाजनक खटिये की गहीर में मंटू सोया रहता है.. बेतरतीब, असुविधाजनक खटिये की गहीर में कोई कैसे सो सकता है का ख़्याल मंटू को नहीं आता.. जैसे आंगन में नाली के गड्ढे पर टिके पटरे पर उकड़ू बैठ दांत मांजने से मंटू को भय नहीं होता.. कि पटरे से छलककर गड्ढे में गिर पड़े तो?.. हालांकि मंटू खेदन चाचा की साइकिल की कैरियर से छलककर सड़क पर गिर सकता है, या ज़्यादा हुआ तो गड्ढे के पानी से छलककर पटरे पर बाहर निकल मेंढक मंटू को डरा सकता है!..

जाने इसकी और उसकी किसकी भरी बोरियां, टिन के कनस्‍तर, बल्‍ली से लगी रेंगनी पर लटके कपड़ों के अंधेरों में मंटू को भय नहीं होता.. घर के निरर्थक निर्जन सूनसान में भी नहीं.. अलबत्‍ता घर से बाहर पैर धरते ही बनवारी के बाद वाली गली में पनचक्‍की की आवाज़, कुएं के मुहाने पर प्‍यासी आवारा घूमती बकरियों का इधर-उधर मुंह मारना मंटू को पता नहीं क्‍यों कभी-कभी एकदम असहज करने लगता है.. जैसे अस्‍पष्‍ट, अजानी आवाज़ों के जादुई संकेतों में कोई उसे लपेट रहा हो और जिसके असर में थोड़ी देर बाद वह खिंचा चला, जाने कहां गायब हो जायेगा और फिर बाबूजी, खेदन चाचा, दीदी और अम्‍मा कितना, किधर-किधर उसे खोजते रहेंगे मगर खोज नहीं पायेंगे.. और मंटू मदद के लिए चीखना चाहेगा लेकिन उसकी हलक से आवाज़ न निकलेगी?..
- कुएं के काले अंधेरे के भीतर क्‍या जादू छिपा है, दीदी?..
कंदील और बत्‍ती की रोशनी में और सूरज के अंधेरे में घर जैसा दिखता है उससे अलग और भी किसी तरह से दिख सकता है का ख़्याल मंटू को नहीं आता.. जैसे बाहर इमली के पेड़ के बाजू पुरानी बड़ी सलेटी इमारत और पाठशाला के रास्‍ते में बांस के जंगल की निर्जनता से अलग बाहर की कोई और दुनिया भी हो सकती है का ख़्याल.. सबकुछ वैसा ही दिखता है जिसे देखने का अभ्‍यास करते बड़े हुए और देखने की आदत बनाये इस दुनिया से विदा होंगे?..

कटहल का पेड़ कटहल के पेड़ जैसा दिखता है और जंगली बेर की झाड़ जंगली बेर की झाड़ की तरह.. सूखे बालों के झोंटे के साथ हेमलता शामलाल की दुकान से दो रुपये का मसाला खरीदकर घर लौटती दिखती है, तेल लगायी बाल संवारे कभी मेले से लौटती नहीं दिखती.. हंसुए पर लाल साग काटती अम्‍मा अचानक कराहकर कमर पर हाथ रख लेती है दिखता है, बिना कराहे लाल साग काट ले कभी ऐसा नहीं दिखता.. बाबूजी बोलते हैं बहुत तमाशा हो गया एक दिन शहर के बड़े अस्‍पताल लेकर चलेंगे दिखता है, सचमुच शहर के बड़े अस्‍पताल लेकर जायें ऐसा नहीं दिखता..
- जो जैसा दिखता है उससे क्‍या, कैसा-कैसा अलग दिख सकता है? दिख सकता है.. तुम जानते हो, संपूरन?..

- रात के बाद दिन दिखता है, दिन में रात दिखती है, दिन में दिन दिखे ऐसा भी दिन कभी दिखता है, बनवारी?..
(विनोद कुमार शुक्‍ल से क्षमायाचना सहित)

4 comments:

  1. उस दिन के तह में छुपे दिन की तलाश कभी खत्म होगी ? दिन में दिन न दिखे वही सही , कूँये के अंदर की रहस्यमय दुनिया महफूज़ रहे .. हमेशा हमेशा..
    लेकिन ये मंटू भी न ..सोया ही रहता , जागा क्यों ? और जागा तो दिन में खोजा क्यों और क्या क्या?

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  2. शुक्ला जी से छमा काहे ला मांगे हैं.. ऊ कोनो कापीराइट धराये हैं जगत की विस्मयसीलता पे! एक्दम मस्त लिखे हैं आप..और अब कुछ ठोस चीज लिखना सुरु कर के अपने साथ न्याय कीजिये..हाँ नहीं तो!

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  3. ब्लोगोत्तर हिन्दी साहित्य को नए आयाम देने के लिए आपकी प्रशंसा करना चाहता हूँ हे ब्लॉग -नंदन , अनुमति है क्या?

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  4. आम आम की तरह मिठाता है संतरा संतरे की तरह सुहाता है ़़़ ऑख खुली हो या बंद असल असल सा महकता है और नकली नकल सा गंधाता है ।

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