Tuesday, March 11, 2008

एक मामूली कविता की किताब..



मामूलीपने का क्‍या महातम? वह रोज़-रोज़ बनती.. रोज़-रोज़ बिगड़ती चलती है.. इसी बुनावट-बसावट को उकेरती चंद पंक्तियां.. पिछले वर्ष अक्‍टूबर में कभी पोस्‍ट पर चढ़ाया था.. सांगीतिक के मोह में उसी दुलरन से फिर लिपटने को.. अबकी वोकल में दोहरा रहा हूं..

9 comments:

  1. कहाँ तक डुबाओगे भाई मेरे...बस्स!!!!!!!


    बस्स्स!!!

    एक कविता खुशी की हो.....

    जो किसी भी क्षण...

    जब हम दुखी हो जायें...

    जीने की नाउम्मीदी पाल लें...

    और तुम मुस्कराते हुये आओ...

    हमें सुनाओ...

    हमें मनाओ...

    एक ऐसी...

    कविता खुशी की हो...


    ---हर बार आप उम्मीद पर खरे उतर रहे हैं..का किहल जाई..तुहार साथ ओ शहरी बाबू..:)

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  2. पॉड्कास्ट पर आपको सुनना अच्छा लग रहा है मित्र..अलग अलग इमेजेज़ से बुनी आपकी मामूली कविता बहुत कुछ कहती है..बहुत से शब्दों को वाकई एक अरसे बाद सुना.. शुक्रिया साथी

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  3. बहुत गै़रमामूली है. बहुत बढ़िया.

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  4. सुन ली, गुन ली
    एक सुंदर कविता
    आपके लिए
    कितना सहज-सरल
    है कहना कविता


    अंतस की नम मिट्टी में
    कैसे उगती है
    बिरवे सी कविता
    कैसे जानें,
    क्यों हमसे दूर
    ठिठकी रहती है कविता

    शब्द ही तो है कविता
    या उससे भी अलग कुछ !
    पर मेरे शब्द
    लगते नहीं
    जैसे हो कविता...

    ( इस भ्रष्ट कविताई को कृपया कविता न मानें। यह आपकी कविता पर मेरी लंबवत प्रतिक्रिया थी। साभार...अजित )

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  5. बहुत अच्छा लगा इसे सुनते हुये।

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  6. शुक्रिया समीर भाई, शुक्रिया मीत, शुक्रिया विमल बाबू, वडनेरकर साहब, शुक्रिया पंडिजी.. हमारे मामूलीपने में हमारी गरिमा बनी रहे की भलमनस कामनाओं के साथ..

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  7. बिल्कुल - ये आपकी शैली का बड़ा मील का पत्थर है - मेरे ख़याल से भी ऐसा कुछ लिखा पढ़ा नहीं गया [जैसा ये "पीस" है] - अब आपने आरंभ कर ही दिया है तो आपको मालूम भी है कि इसके बाद फरमाईश में "दिन बीतते हैं" और "नींद में रात" आ जायेंगे - अपनी पसंद के पहले फलसफे को "सुन" कर आनंद में भी आनंद आया - [ देर यूँ हुई कि अव्वल गम-ऐ- रोज़गार बढ़ गए और दुप्पल हमारे छोटे सिकंदर अपनी बलगम भरी छाती के साथ अस्पताल भर्ती हैं ] - अगले हफ्ते थोड़ा रुक रुक कर पढूंगा / सुनूंगा - पढूंगा/ सुनूंगा ज़रूर - मनीष [ p.s. - maalik- dont be modest on this one at least]

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  8. oh, manish, u r a dear one... अपने सिकंदर की सेवा करें.. उससे कहें मैं घोड़ा लिये बाहर ही मिलूंगा..

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