आज की रात इराक के अलग-अलग हिस्‍सों में ढेरों कहानियां होंगी.. ढेरों आवाज़ें, तकलीफ़ों के उलझे पुलिंदें होंगे.. जाने कोई उन्‍हें सुननेवाला होगा या नहीं.. मैं भी नहीं सुन रहा.. बस उजाड़ में किसी कहवाघर का एक ऊलजलूल कल्‍पनालोक गढ़ रहा हूं.. बेमौसम की बरसात, बेतुका हारमोनियम और कुछ यूं ही मन के उठते जलज़लों का..

 
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sanjay joshi - March 20, 2008 9:12 AM

Behatareen aur arthpoorna. badhai.

Shiv Kumar Mishra - March 20, 2008 11:30 AM

केवल पाँच साल? हिसाब से तो सत्रह साल हो गए....

इरफ़ान - March 20, 2008 2:35 PM

Ajee saahab aapne to aankhein khol deen! Bus agar aakheer mein kalmaa sahee padh dete to paanch chaand lag jaate. Sachmuch khuda ghaarat kare in naamuraadon ko!

munish - March 20, 2008 10:59 PM

behtareen prustuti hai. hail BLOGARCH!

अनूप शुक्ल - March 21, 2008 1:46 PM

चचा हैदर , पांचै साल में कचुआ गये!

जोशिम - March 21, 2008 8:16 PM

कुछ साथ काम करने वाले हैं - मुंह्जबानी किस्सों में दर्द और भी है - वो फिर कभी - आज होली की शुभ कामनाएं - सादर - मनीष

Ghost Buster - March 22, 2008 2:11 PM

जरा और विस्तार में जाइए. अमरीकी हमले से पहले का पोडकास्ट सुनवाइये. कुवैत पर हमला करते वक्त चचा हैदर और रसूल मियाँ की खुश्फहम रंगीन चर्चाएँ, इतिहास के एक जालिमतम तानाशाह के दरबार में बैठे कठपुतली सैनिक अफसरों की बातचीत, अपने हाथों से अनेकों हत्याएं करने वाले, धोका देकर अपने दामादों का कत्ल करने वाले, माइनोरिटी का दमन करने वाले तानाशाह की शान में कसीदे काढते चचा हैदर. विषय तो बहुत हैं. इंतजार करें क्या?

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