3/19/08

इराक में अमरीकी घुसपैठ के पांच साल..

आज की रात इराक के अलग-अलग हिस्‍सों में ढेरों कहानियां होंगी.. ढेरों आवाज़ें, तकलीफ़ों के उलझे पुलिंदें होंगे.. जाने कोई उन्‍हें सुननेवाला होगा या नहीं.. मैं भी नहीं सुन रहा.. बस उजाड़ में किसी कहवाघर का एक ऊलजलूल कल्‍पनालोक गढ़ रहा हूं.. बेमौसम की बरसात, बेतुका हारमोनियम और कुछ यूं ही मन के उठते जलज़लों का..

7 कमेंट:

sanjay joshi ने कहा...

Behatareen aur arthpoorna. badhai.

Shiv Kumar Mishra ने कहा...

केवल पाँच साल? हिसाब से तो सत्रह साल हो गए....

इरफ़ान ने कहा...

Ajee saahab aapne to aankhein khol deen! Bus agar aakheer mein kalmaa sahee padh dete to paanch chaand lag jaate. Sachmuch khuda ghaarat kare in naamuraadon ko!

munish ने कहा...

behtareen prustuti hai. hail BLOGARCH!

अनूप शुक्ल ने कहा...

चचा हैदर , पांचै साल में कचुआ गये!

जोशिम ने कहा...

कुछ साथ काम करने वाले हैं - मुंह्जबानी किस्सों में दर्द और भी है - वो फिर कभी - आज होली की शुभ कामनाएं - सादर - मनीष

Ghost Buster ने कहा...

जरा और विस्तार में जाइए. अमरीकी हमले से पहले का पोडकास्ट सुनवाइये. कुवैत पर हमला करते वक्त चचा हैदर और रसूल मियाँ की खुश्फहम रंगीन चर्चाएँ, इतिहास के एक जालिमतम तानाशाह के दरबार में बैठे कठपुतली सैनिक अफसरों की बातचीत, अपने हाथों से अनेकों हत्याएं करने वाले, धोका देकर अपने दामादों का कत्ल करने वाले, माइनोरिटी का दमन करने वाले तानाशाह की शान में कसीदे काढते चचा हैदर. विषय तो बहुत हैं. इंतजार करें क्या?